लेख

“माँ की विरासत”

डॉ प्रमोद कुमार

माँ केवल वह नहीं
जो जन्म देकर हमें इस संसार में लाती है,
माँ वह भी है
जो जीवन के हर मोड़ पर
अपने अस्तित्व से हमें सँभालती है।
जन्म देने वाली माँ
अपने आँचल में पूरा आकाश समेट लेती है,
खुद भूखी रहकर भी
बच्चे की थाली में सपने परोस देती है।
उसकी हथेलियों की रेखाओं में
हमारा भविष्य लिखा होता है,
उसकी लोरियों में
दुनिया का सबसे मधुर संगीत बसता है।
वह रातों की अधूरी नींद है,
सुबह की पहली प्रार्थना है,
गिरने पर सहारा है,
और जीतने पर सबसे सच्ची मुस्कान है।
उसके त्याग का कोई मूल्य नहीं,
उसके प्रेम का कोई अंत नहीं।
फिर जीवन में एक और माँ मिलती है,
पति या पत्नी की माँ के रूप में।
जो धीरे-धीरे परायेपन की दीवारें तोड़कर
अपनापन बोना सीख जाती है।
वह केवल रिश्तों की औपचारिकता नहीं,
दो परिवारों के बीच
विश्वास का पुल होती है।
कभी सास बनकर अनुशासन सिखाती है,
कभी माँ बनकर चुपचाप दुख समझ जाती है।
उसकी डाँट में भी चिंता छिपी होती है,
उसकी सलाह में अनुभव का प्रकाश।
यदि प्रेम और सम्मान का जल मिले,
तो यह रिश्ता भी
ममता के वृक्ष सा फलने लगता है।
और एक माँ है—
हमारी मातृभूमि।
जिसकी मिट्टी से शरीर बना,
जिसकी नदियों से जीवन बहा,
जिसकी हवाओं ने
हमारे फेफड़ों में पहली साँस भरी।
यह धरती माँ
सिर्फ खेत और सीमाएँ नहीं,
यह हमारे इतिहास, संस्कृति, संघर्ष
और असंख्य बलिदानों की धड़कन है।
जब सैनिक सीमा पर खड़ा होता है,
तो वह केवल जमीन नहीं बचाता,
अपनी माँ की अस्मिता की रक्षा करता है।
इस मिट्टी में
पूर्वजों की स्मृतियाँ बसती हैं,
हर कण में
असंख्य तप, त्याग और प्रेम की गाथाएँ हैं।
मातृभूमि हमें पहचान देती है,
जड़ें देती है,
और जीने का स्वाभिमान देती है।
फिर आती है
मातृभाषा की माँ।
जिसके शब्दों में
हम पहली बार “माँ” कहना सीखते हैं।
जिस भाषा में रोना सहज लगता है,
हँसी सबसे सच्ची लगती है,
और भाव बिना डर के बहते हैं।
मातृभाषा
केवल संवाद का माध्यम नहीं,
वह हमारी आत्मा का संगीत है।
उसमें लोकगीतों की मिठास है,
दादी-नानी की कहानियों की गर्माहट है,
और संस्कृति की अनमोल विरासत है।
जब कोई अपनी मातृभाषा भूलता है,
तो वह केवल शब्द नहीं खोता,
वह अपनी जड़ों का एक हिस्सा खो देता है।
भाषा हमें हमारी पहचान से जोड़ती है,
हमारे इतिहास और भविष्य के बीच
एक जीवित सेतु बनती है।
माँ के ये सभी रूप
जीवन को पूर्ण बनाते हैं।
जन्म देने वाली माँ जीवन देती है,
रिश्तों वाली माँ अपनापन देती है,
मातृभूमि अस्तित्व देती है,
और मातृभाषा अभिव्यक्ति देती है।


डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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