
भारत में कभी जाट क़ौम को उस समाज के रूप में देखा जाता था जो राजशाही हो या लोकशाही, हर दौर में सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों को तर्क की कसौटी पर परखकर नकारता था। जाट मतलब तर्क, साहस, सुधार। जो बुराई दिखी, उखाड़ फेंकी। जो अच्छाई मिली, गले लगाई। इसलिए पूरी दुनिया कहती थी “जाट क़ौम सबसे विवेकवान है।” इसलिए जो बुराई दिखी, उसे खत्म किया; जो अच्छी प्रथा दिखी, चाहे अपनी हो या पराई, उसे अपनाया। इसी सुधारात्मक साहस के कारण अन्य समाज हमें तार्किक और विवेकवान कहकर सम्मान देते थे।
लेकिन आज वही जाट क़ौम अंधविश्वास, पाखंड, आडंबर और खोखली परंपराओं को सीने से लगाए, उस पर गर्व महसूस कर रही है। जाट आज अंधविश्वास, पाखंड, आडंबर और खोखली परंपरा पर गर्व कर रहा है जो कभी कुरीतियों को तोड़ता था, आज उन्हें सिर पर बैठाकर नाच रहा है। हैरानी और शर्म की बात यह है कि जाटों का यही पतन “गौरव” के नाम पर बेचा जा रहा है। जो जाट कौम और संस्कृति के लिए गहरा दुर्भाग्य है।
दरअसल आज समाज में कई फर्जी संगठन बने हुए हैं जो समाज को भ्रमित कर लूटने और बरगलाने का काम कर रहे हैं इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी जाट समाज के उत्थान के नाम पर सैकड़ों ग्रुप और संगठन चल रहे हैं। लेकिन जागरूकता के नाम पर उनके पास सिर्फ़ नारे लगाना और नेताओं के लिए भीड़ जुटाना है। अगर समाज के आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से सक्षम लोग एक व्यवस्था के अंधभक्त बन जाएँ, तो न तो कौम तार्किक रह पाएगी, न वैज्ञानिक। बस व्यक्तिगत लाभ के लिए नैतिक पतन कर हासिल ताकत को बचाने में लगे रहेंगे, और नस्ल की खुद्दारी को सत्ताधीशों के चरणों में गिरवी रख देंगे। हमें यह समझना होगा कि समाज के उत्थान के लिए जागरूकता का असली अर्थ है क्या है?
मेरे विचार से जागरूकता के सही मायने यह है कि समाज को हक़ीक़त और सच्चाई का आईना दिखाना, अच्छाई अपनाना, बुराई छोड़ना, विज्ञान, तर्क और मानवता को आधार बनाना। अपने और पराए दोनों की व्यवस्थाओं की खूबियाँ-खामियाँ गिनाना। तर्क के आधार पर तय करना कि “ये अपनाना है, ये ठुकराना है”। और खुद अपने जीवन में उसका पालन करना। वरना याद रखिए जो खुद को “समाज के रहनुमा” बताते हैं, वे असल में अपने पेट और पद के सौदागर, अमीर, ताक़तवर और सत्ता के गुलाम बनकर, अपने स्वार्थ के लिए नस्ल की खुद्दारी को नेताओं के चरणों में गिरवी रख कर राज दरबारी कर रहे हैं। यही कारण है कि कौम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से दिखावटी ताकत बनकर रह गई है। यही कारण है कि आज कई प्रभावशाली लोग, सत्ता और दरबारी राजनीति में भाग लेकर, अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं।
मेरी स्पष्ट राय है कि कौम के जिम्मेदार लोग अपनी और विरोधियों, दोनों की व्यवस्थाओं की खूबियाँ-खामियाँ खुलकर समाज में साझा करें। फिर उन्हें तर्क और प्रमाण की कसौटी पर घिस कर तय करें कि क्या अपनाना है और क्या नहीं। और सबसे जरूरी यह भी है कि खुद अपने व्यवहार में उन सिद्धांतों का पालन करके नमूना पेश करें। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते तो याद रखिए, जो लोग खुद को समाज के नेता और ठेकेदार बताते हैं, वे असल में अपने निजी स्वार्थों के लिए मीठी बातें करके कौम को अंधेरे में रखेंगे और यह पतन, जाट नस्ल की आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा धोखा होगा। इसलिए कहता हूं जागो जाटों! नहीं तो आने वाली पीढ़ियां तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगी।
– के. पी. मलिक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक, सामाजिक विश्लेषक हैं