धर्म और शासन की जद्दोजहद के बीच

आप जानते हैं गुरुवर कि कितनी कठिनाई से इस आयु में मुझे चार पुत्रों की प्राप्ति हुई है। इन सुकुमार बालकों को वन में राक्षसों के संहार हेतु कैसे भेज दूं? मैं स्वयं अपनी सेना के साथ जाकर कौशिक मुनि के यज्ञ की रक्षा करूंगा।’
‘नहीं राजन। विश्वामित्र जी की आज्ञा का अक्षरशः पालन होना चाहिए।’
कुलगुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा का तत्काल पालन हुआ और अयोध्या के राजकुमार श्रीराम अनुज सहित वन को गए।
भारतीय जनमानस में अत्यंत गहरी पैठ रखने वाली यह कथा हजारों वर्ष बाद भी प्रत्येक सनातनी मन को आह्लादित करती है। प्रतिक्षण गुरु के आदेश का पालन करते अयोध्यापति दशरथ, गुरु आज्ञा को तत्पर श्रीराम- लक्ष्मण, गुरु आज्ञा से पिता का अंतिम संस्कार करते और राज्य को चलाते भरत। हां, यही है भारतीय समाज के मूल ‘राम राज्य’ की परिकल्पना।
देखा जाए तो आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। नया आजमाने की मुट्ठी भर लोगों की चाहत अब राष्ट्र के पटल पर एक नवीन चिंतन लेकर आई है। जी हां, भारत में धर्म सत्ता और शासन के एकीकरण का विचार यूं तो अभी मुट्ठी भर लोगों के बीच में है पर इसकी आहट मात्र से ही समाज के बुद्धिजीवी वर्ग विशेषकर समाजशास्त्री और इतिहास के विशेषज्ञों की पेशानी पर बल पड़ रहे हैं। वह जानते हैं कि धर्म और शासन का एकीकरण भारत में खलीफा युग की शुरुआत है।
यूं तो सन् 1924 में ऑटोमन साम्राज्य के साथ ही विश्व भर में खलीफा शासन का औपचारिक अंत हो गया था किंतु ईरान और सीरिया जैसे देश इस्लामिक राज्य की स्थापना की चाहत में आज भी इस शासन को जीवित रखे हैं। उस कट्टरपंथी शासन की एक छोटी सी बानगी की याद आज भी सुशिक्षित एवं सभ्य लोगों को चिंता में डाल देती है। जब सन 1978 में तेहरान विश्वविद्यालय पर कट्टरपंथियों ने ताला लगा दिया था तब पूरे विश्व में कट्टरपंथ के हाथों में जा रही शासन सत्ता पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। इतने प्राचीन और विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय को अकस्मात बंद कर दिया गया। शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के साथ हुई बर्बरता के चित्र पूरे विश्व में छा गए थे। यह कट्टर धर्मांध शासन का एक क्रूर पक्ष था जो यह बताने के लिए पर्याप्त था कि धर्म और सत्ता का एकीकरण किसी शिक्षित समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक होता है।
दुख की बात यह है कि आज शिक्षा, मानवता और धर्म के लिए हानिकारक इसी कट्टरपंथी शासन की इच्छा भारत में की जा रही है। संपूर्ण विश्व को सदैव ज्ञान के नए अध्याय देने वाले देश में कुछ मूर्ख सत्ता और शासन के उसी ऐक्य की बात कर रहे हैं, जो हर युग में अंधकार, क्रूरता और पाशविकता का पर्याय रहा है।
सत्य तो यह है कि एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति की पद लोलुपता, चंद मूर्खों की चाटुकारिता के साथ मिलकर इतिहास बदलने के कुत्सित प्रयास कर रही है और यह भूल गई है कि यह भारत है, यहाँ साहस और मेधा का सूर्यास्त कभी नहीं होता। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समतुल्य समझने वाला देश ‘पानी पीजै छान और गुरु कीजै जान’ में विश्वास रखता है। धूल भरी आंधियों के कारण थोड़ी देर को नेत्र बंद हो भी जाएं तो गुरुकृपा की वर्षा धूल को धरती सुंघा देती है और नेत्रों को निर्मल कर देती है। कुछ अतिवादी मूर्खों का भारत में खलीफा युग लाने का सपना सपना ही रहेगा क्योंकि यह धरती राम और कृष्ण की ही नहीं, गुरु परशुराम और वशिष्ठ की है, चाणक्य की है और समर्थ गुरु रामदास की है और उन शंकराचार्य की भी है जिनकी अविच्छिन्न परंपरा पिछले ढाई हजार वर्षों से अनवरत शिष्यों के रक्त में ज्वाला भर्ती आ रही है। धर्म के छद्म वेश में घूम रहे अधर्म का अंत अब समीप ही है क्योंकि वर्तमान समय में बात भारत की अस्मिता, सनातनी संस्कृति और हमारे धार्मिक संस्कारों पर आ गई है।
डाॅ दीपिका उपाध्याय, आगरा।
(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


