उत्तराखंड

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास आवश्यक : डॉ चिन्मय पण्ड्या

हरिद्वार। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में धार्मिक अध्ययन के विकास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी का शुभारंभ प्रज्ञागीत से हुआ।
इस अवसर पर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद, सहयोग और पारस्परिक समझ आज के वैश्विक समाज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित अखिल विश्व गायत्री परिवार के आदर्शों से भी पूर्णत: साम्य रखती है। आचार्यश्री ने मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए धर्मों के समन्वय, वैश्विक सद्भाव तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन-दृष्टि का प्रतिपादन किया। उनका प्रतिपादित दर्शन एकता, समता, ममता, सुचिता विश्व की विविध आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद, सहयोग और सहअस्तित्व की भावना को सुदृढ़ करता है। इसी भावना के अनुरूप देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवाद आयोजित किए जा रहे हैं, जो वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक एकता, सांस्कृतिक समन्वय और मानव कल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जॉन पॉल द्वितीय कैथोलिक विश्वविद्यालय, ल्यूब्लिन, पोलैंड में मूलभूत मसीह-विज्ञान तथा कलीसिया-विज्ञान विभाग के रेव. डॉ. फिलिप जोजेफ क्राउजे ने जॉन पॉल द्वितीय कैथोलिक विश्वविद्यालय, ल्यूब्लिन में एक शताब्दी से अधिक समय में विकसित धार्मिक अध्ययन की परंपरा का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के संस्थापक इद्ज़ी राद्ज़िशेव्स्की की मूल भावना का उल्लेख किया जिसमें आस्था और तर्क को सत्य के एक ही क्षितिज का अंग माना गया है। उन्होंने बताया कि 1918 में स्थापना के प्रारंभिक काल से ही वहाँ बाइबिल भाषाओं के साथ-साथ भारतविद्या जैसे विषयों को भी पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया, जिससे यूरोप के बाहर की धार्मिक परंपराओं को समझने की शैक्षणिक दृष्टि विकसित हुई। साम्यवादी काल में भी यह विश्वविद्यालय सोवियत क्षेत्र का एकमात्र स्वतंत्र कैथोलिक विश्वविद्यालय बना रहा और यहाँ धार्मिक अध्ययन को दर्शन, धर्मशास्त्र तथा मानवशास्त्र के साथ संवाद के रूप में विकसित किया गया। उन्होंने कहा कि धार्मिक अध्ययन का उद्देश्य किसी एक वैश्विक धर्म की स्थापना करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि विभिन्न संस्कृतियाँ मानव के पारलौकिक तथा आध्यात्मिक अनुभवों को किस प्रकार अभिव्यक्त करती हैं।
इस अवसर पर विवि के साथ अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग के संदर्भ में सार्थक संवाद संपन्न हुआ। इस दौरान ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जर्मनी, कनाडा, सीरिया, यूक्रेन, उज़्बेकिस्तान, जापान, रोमानिया, ईरान सहित 37 देशों के प्रतिभागी एवं विवि के अनेक विद्यार्थी आदि मौजूद रहे।

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