
वीर सावरकर उन लोगों मे थे जो भारत को स्वतंत्र कराने के साथ ही शक्तिशाली और स्वाभिमान राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे । उनको देश की दशा विचलित करती थी। भारत कभी विश्वगुरु के रूप में सम्मानित था। उनका कहना था कि व्यक्ति में एक दैवीय तत्व होता है। इसके लिए उसे धर्म के अनुरूप आचरण की स्वतंत्रता होनी चाहिए। विदेशी दासता में यह संभव नहीं है। अतः उनसे मुक्ति पहली आवश्यकता है। उन्होंने द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ लिखी। इसमें उन्होंनें देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रमाणित किया। अंग्रेजों ने इसे मात्र विद्रोह बताया था।
वीर सावरकर में राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना थी।
वह 1911 से 1921 तक अंडमान जेल में रहे। इसके बाद उन्हें फिर तीन वर्ष की सजा मिली। अंग्रेज उनसे घबराते थे। सावरकर एक मात्र ऐसे भारतीय थे जिन्हें एक ही जीवन में दो बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। काला पानी की कठोर सजा के दौरान उनको अनेक यातनाएं दी गईं। अंडमान जेल में उन्हें छह महीने तक अंधेरी कोठरी में रखा गया। सावरकर की दृष्टि सम्पूर्ण भारत की थी। वे कभी अपने मूल्यों और आदर्शाें से डिगे नहीं। वीर सावरकर वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने हिन्दुत्व शब्द दिया। वीर सावरकर की हिन्दुत्व की विचारधारा के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान दृष्टि एवं व्यवहार होना चाहिए तथा देश के संसाधनों पर सबका हक है। सावरकर के विचारों, आदर्शाें एवं मूल्यों की प्रासंगिकता वर्तमान में पहले से और भी ज्यादा है। देश एक भारत-श्रेष्ठ भारत की ओर अग्रसर है। सच्चाई यह है कि क्षमा याचिका उन्होंने स्वयं को माफ किये जाने के लिए नहीं दी थी। महात्मा गांधी ने उनसे कहा था कि दया याचिका दायर कीजिये । महात्मा गांधी के कहने पर उन्होंने याचिका दी थी। वह विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। वीर सावरकर समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में तैर कर फ्रांस पहुंच गए। उनका मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला। उनको बंदी बनाकर भारत लाया गया। वीर सावरकर को अंग्रेजी हुकूमत ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकड़ और कोयले से कविता लिखी।



