
खेत में खड़ी फसल किसान की होती है, लेकिन उसकी कीमत तय करने का अधिकार आज भी किसान के हाथ में नहीं, सरकार, उसके बाबुओं और बाजार की सांठगांठ के हाथ में है। यही भारतीय कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। किसान पूरे साल कर्ज लेकर, मौसम की मार झेलकर, दिन-रात खेत में पसीना बहाकर गन्ने जैसी क़ीमती फसल उगाता है, लेकिन जब उसकी मेहनत की कीमत तय करने का समय आता है, तो वही किसान सबसे कमजोर कड़ी बना दिया जाता है।
दरअसल गन्ने की फसल का उदाहरण इस बात का प्रमाण है। चीनी मिलों और सरकारी तंत्र के बीच बैठकों में तय होने वाले दाम अक्सर लागत और महंगाई की वास्तविकता से मेल ही नहीं खाते। डीजल, खाद, कीटनाशक, बिजली, मजदूरी और सिंचाई का खर्च लगातार बढ़ता जाता है, लेकिन गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने में सरकार महीनों तक चुप्पी साधे रहती है। हालत यह है कि शहरों में चीनी, मिठाई और कोल्ड ड्रिंक के दाम तुरंत बढ़ जाते हैं, मगर उस चीनी के लिए खेत में खून-पसीना बहाने वाले किसान को भुगतान के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है।
दरअसल किसान अपनी उपज का मालिक होकर भी उसकी कीमत तय नहीं कर पाता, जबकि एक समोसे वाला भी अपने समोसे के दाम ख़ुद तय करता है, उद्योगपति अपने उत्पाद का दाम बाजार के हिसाब से तय करते हैं। यही असमानता किसानों के भीतर सबसे बड़ा आक्रोश पैदा करती है कि आखिर खेती अगर देश की रीढ़ है, तो फिर सबसे ज्यादा आर्थिक अपमान भी किसान ही क्यों झेले?



