आगराउत्तर प्रदेश

आगरा के सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अजय वीर जैन ने – समाज का न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बढ़ाने वाला मुकदमा लड़कर न्याय दिलाया.

आगरा। भागचंद पहलवान हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 19 दोषियों को उम्रकैद –प्रख्यात अधिवक्ता अजय वीर सिंह जैन ने की सक्रिय पैराकारी अपराध करने वाले योजनाबद्ध तरीके से घटना को अंजाम देकर बच जाने समाज को घोर निराशा होती है,लेकिन कुछ मामलों में निचली अदालतों के फैसले बदलते है और दोषियों को अंतत:अपने कृत्य की सजा भुगतनी पड़ती है।समाज का न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बढ़ाने वाला एक ऐसा ही अपने समय का चर्चित वाद भग्गू कुचबंदिया उर्फ भागचंद पहलवान हत्याकांड का है,जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए निचली अदालत के द्वारा दिये गये फैसले को बरकरार रखा। 11 जुलाई 2003 को घटी हत्या की घटना में अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।मार्च 2026 अदालत ने 24 आरोपियों में जीवित बचे 19 दोषियों को सजा सुनायी।

भागचंद पहलवान, अपने समय के विख्यात थे,उनकी उपलब्धियों के लिये म प्र शासन ने ‘मध्य प्रदेश केसरी’ का खिताब विभूषित किया था। यह हत्या उस समय हुई थी जबकि पहलवान नर्मदा नदी में स्नान करके लौट रहे थे।वाद की पैरवी प्रख्यात अजय वीर सिंह एडवोकेट ने की है।

मूल रूप से आगरा निवासी श्री सिंह कहा कि निश्चित रूप से यह मामला कई पेचीदगियों से भरा हुआ था साथ ही बीस साल से अधिक पुरानी घटना का है।उन्होंने कहा कि सवाल भागचंद पहलवान की हत्या करने वालों को सजा दिलवाने भर का नहीं न्याय व्यवस्था के प्रति समाज का विश्वास और मजबूत करने का है।

उल्लेखनीय है कि म प्र के बहुचर्चित भागचंद पहलवान हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सभी 19 आरोपियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा बरकरार रखी । इस मामले में पीड़ित भागचंद के भाई सीताराम कुचबेदिया द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की प्रधान पीठ के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई थी।
वादकारी पक्ष के अधिवक्ता अजय वीर सिंह ने बताया कि जुलाई 2003 में भगचंद पहलवान की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस संबंध में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 147, 148, 149, 323, 325 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने सभी 19 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलटते हुए आरोपियों की सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (भाग-2) में परिवर्तित कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह अपील सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुई। सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को पुनः बहाल कर दिया और सभी 19 आरोपियों को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही अदालत ने सभी दोषियों को 8 सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश भी दिया है। इस फैसले को पीड़ित परिवार के लिए न्याय की बड़ी जीत माना जा रहा है। अजय वीर सिंह आगरा के मूल निवासी हैं तथा में सैंट पीटर्स कॉलेज और सेंट जॉन्स कॉलेज से पढ़ाई कर चुके है ।

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