
आगरा में ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की जीवनी ‘देदीप्यमान द्विपीठाधीश्वर का भावपूर्ण विमोचन हुआ। अपनी 81 दिवसीय गविष्ठि यात्रा के दौरान आगरा पहुंचे ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने पुस्तक का विमोचन किया।
इस अवसर पर जीवनी लेखिका डॉ दीपिका उपाध्याय ने कहा कि ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर के विराट व्यक्तित्व को इतने कम पृष्ठों में समेटना संभव न था। उन्होंने कहा संन्यासी अपने लिए नहीं जीता, उसका जीवन धर्म की स्थापना के लिए, समाज के कल्याण के लिए होता है। संन्यासी के त्याग में उसकी माता का छिपा त्याग किसी को नहीं दिखता कि वह किस प्रकार अपने हृदय पर पत्थर रखकर अपने प्राणप्रिय पुत्र को उस मार्ग पर भेजती है जहां ना भोजन का ठिकाना है, ना रहने का। ऐसी ही माताओं के भावों के अभिव्यक्ति है ‘देदीप्यमान द्विपीठाधीश्वर’।
लेखिका ने आगे कहा कि जो धर्म आज हमारी पहचान है, हमारे संस्कारों का मूल है, उस धर्म की रक्षा इन्हीं शंकराचार्यों ने की है। यदि आज हम अपने धार्मिक रीति रिवाजों, धर्म ग्रंथों तथा संस्कृति से जुड़े हैं तो वह शंकराचार्य तथा उस परंपरा के संन्यासियों के कारण ही संभव हो सका है।
लेखिका ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना का इतिहास सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार दक्षिण भारत के वारंगल राज्य पर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने आक्रमण कर दिया था, राजा के वीरगति प्राप्त करने पर आक्रांताओं ने उनके दो किशोर पुत्रों को बंदी बनाया और उनका जबरन धर्म परिवर्तन करा दिया। वर्षों बाद जब उस आक्रांता का राज्य नष्ट हुआ तो वे प्रौढ़ राजपुत्र अपने पिता के राज्य को देखने की इच्छा से दक्षिण की ओर गये। मार्ग में तत्कालीन श्रंगेरी शंकराचार्य महास्वामी विद्यारण्य जी महाराज मिले। उन्होंने राजपुत्रों की व्यथा सुनकर उन्हें पुनः सनातन धर्म में दीक्षित किया तथा कहा कि विवशता में किया गया धर्म परिवर्तन मान्य नहीं होता और उन्हें विजयनगर साम्राज्य स्थापित करने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने उपस्थित जन समूह को आशीर्वाद दिया तथा अपनी आगामी यात्रा के लिए सिकंदरा की ओर रवाना हो गए।



