
लखनऊ। योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली और आत्मिक उन्नति का माध्यम है। श्री गोरक्ष पीठ योग के क्षेत्र में प्रारंभ से ही अपना बड़ा योगदान दे रही है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में श्री गोरखनाथ मंदिर परिसर में महायोगी गुरु गोरखनाथ योग संस्थान एवं महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में साप्ताहिक योग शिविर एवं शैक्षिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें योग, प्राणायाम,ध्यान एवं योग दर्शन के विभिन्न आयामों पर विशेषज्ञों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान किया गया। यहां व्यक्त किए विचारों की जानकारी सभी को होनी चाहिए।
योग व आयुष दुनिया के भारत की सौगात है। प्राचीन भारत के ऋषियों आचार्यों ने गहन व विलक्षण शोध के बाद इसका सृजन किया था। इसी के साथ उन्होंने सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना की थी। यह उदार चिंतन था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता मिली। इसी के साथ वर्तमान सरकार ने आयुष मिशन को एक अभियान का रूप दिया। आयुष मंत्रालय का गठन किया गया। आयुष विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। भारतीय योग पद्धति को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। उनके प्रयासों से प्रत्येक वर्ष इक्कीस जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह आंतरिक चेतना, मानसिक शांति और सुशासन का भी आधार है। जब व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुलित होता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज और राष्ट्र-निर्माण पर पड़ता है। प्राचीन भारतीय जीवन मूल्यों, नैतिक शिक्षा और योग को दैनिक जीवन में उतारकर ही मानव कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति में राष्ट्रीय विरासत और स्वाभिमान का सहज समावेश झलकता है। उन्होंने दुनिया के अनेक नेताओं को प्राचीन भारत के वांग्मय से परिचित कराया। योग पूरी दुनिया में पहुँच चुका है। करीब दो सौ देशों में अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन होता है। योग तन,मन तथा आत्मा को स्वस्थ रखता है। यह शरीर के सभी अंगों को एकाग्र करके हमें निरोगी तथा चिरायु बनाता है।
योग का मूल मंत्र है अनुशासन। शरीर, इंद्रियों तथा मन को अनुशासित करके ही हम अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।शिवावतारी महायोगी गुरु श्री गोरखनाथ जी द्वारा प्रतिपादित हठयोग शरीर के माध्यम से ऊर्जा को जागृत और नियंत्रित करने का एक गहन विज्ञान है। शरीर और मन अलग न होकर एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं। जहां मन सूक्ष्म ऊर्जा है वहीं शरीर स्थूल ऊर्जा, इसलिए शरीर को माध्यम बनाकर की जाने वाली साधना का नाम हठयोग तथा मन को माध्यम बनाकर की जाने वाली साधना का नाम राजयोग है।
मन एवं प्राण अत्यंत चंचल हैं, उनके नियंत्रण के बिना साधक अपनी साधना में सफल नहीं हो सकता है, इसलिए ‘मुद्रा एवं बंध’ का ज्ञान आवश्यक है। मुद्रा के द्वारा हमारा मन नियंत्रित होता है और बंध के द्वारा प्राण का नियंत्रण होता है। जिस चक्र का जहां स्थान होता है वहां की विशेष क्रियाओं से उसका विशेष संबंध होता है। मन एवं प्राण अत्यंत चंचल हैं, उनके नियंत्रण के बिना साधक अपनी साधना में सफल नहीं हो सकता है, इसलिए ‘मुद्रा एवं बंध’ का ज्ञान आवश्यक है। मुद्रा के द्वारा हमारा मन नियंत्रित होता है और बंध के द्वारा प्राण का नियंत्रण होता है। शरीर, मन और आत्मा का समन्वय करने के लिए ‘मुद्रा एवं बंध’ एक वैज्ञानिक विधि है। मुद्रा के द्वारा हम आनंद की प्राप्ति करते हैं। ‘मुद्रा एवं बंध’ के सही अभ्यास से अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। इससे देवताओं को भी प्रसन्न किया जाता है। यदि मणिपूरक चक्र का ध्यान कर उसको जागृत करें तो पेट संबंधी सभी रोगों से बचा जा सकता है। कुण्डलिनी में स्थित चक्रों का जागरण करने पर हमारे अंदर असीमित ऊर्जा का संचार होता है जिससे हमारा नर्वस सिस्टम सही रहता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अच्छी रहती है। प्राणायाम के द्वारा ध्यान की क्रिया से प्राणवायु को सुषुम्ना में प्रवेश कराते हैं तो सुषुम्ना में विद्यमान लिक्विड का ब्रह्मरन्ध्र से स्राव होता है, जो कि आज्ञा चक्र से होते हुए सभी चक्रों तक पहुंच कर मूलाधार चक्र में स्थित होता है, जिससे कुंडलिनी का जागरण होता है:
कुंडली जागरण का प्रभाव हमारे शरीर की सभी ग्रंथियों तथा सभी प्रकार के हार्मोंस पर पड़ता है। योगाभ्यास से जब हमारा हार्मोंस संयमित होता है तो हमारे अंदर आध्यात्मिक भाव पैदा होता है जो सार्वभौमिकता की अवस्था होती है। इसी अवस्था में पहुंचकर संत-महात्मा जन स्वार्थ से परार्थ की तरफ बढ़ते हैं और विश्वकल्याण की कामना करते हैं:
योग और आयुर्वेद ऋषियों द्वारा दी हुई अनुपम भेंट है।
योग से शरीर की शुद्धि और आयुर्वेद से निरोगी काया बनती है। प्राणायाम शरीर के अंदर ऑक्सीजन लेवल को संतुलित करता है। शरीर की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है। इससे मस्तिष्क का विकास तो होता ही है, साथ में तनाव से भी मुक्ति मिलती है। मन को प्रसन्न रखने के लिए कुंभक प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायाम हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, इसीलिए हमारे पूर्वजों ने हमारी दिनचर्या में जो भी संध्या-वंदन आदि नित्यकर्म अथवा धार्मिक अनुष्ठान बताए हैं, उन सभी में सबसे पहले प्राणायाम करने का विधान किया है।
प्राणायाम से शरीर शुद्धि के साथ-साथ मन भी शुद्ध हो जाता है और हम किसी भी कर्म अथवा उपासना के लिए पूर्ण तैयार हो जाते हैं। प्राणायाम जीवनी शक्ति का आधार है। प्राण शरीर की सभी इन्द्रियों का स्वामी है, यदि हम उस इन्द्रियों के स्वामी को आयाम देते हैं, अर्थात शरीर के अन्दर जाने वाली प्राण वायु को सही दिशा देते हैं, तो हमारी सभी इन्द्रियां भी सही दिशा में कार्य करती हैं।शरीर में विद्यमान दस तत्वों में अग्नि, वायु तथा जल तत्व की ऊर्जा असंतुलित होने पर शरीर में अनेक रोग पैदा होते हैं। शरीर के अंदर दस द्रव्यों की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए हमारे हाथों की उंगलियों के तीनों जोड़ो को दबाया जाता है। यह तीनों जोड़ ऊपर से नीचे क्रमशः वात, पित्त और कफ के लिए बताए गए हैं। योग द्वारा विकारों का निवारण होता है।



