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भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले सत्यजीत रे की जयंती पर विशेष

इंडिया समाचार 24
नवीन शर्मा

भारतीय सिनेमा की नींव रखने काम दादा साहेब फाल्के ने किया था। वहीं उसे अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाने वाले शख्स सत्यजीत रे थे। सीमित संसाधनों का उपयोग कर उन्होंने ऐसी स्तरीय फिल्मों का निर्माण किया की उन्हें देखकर यकीन करना मुश्किल होता है।
फिल्मकार के अलावा वे कहानीकार, चित्रकार और फिल्म आलोचक भी थे. बच्चों की पत्रिकाओं और किताबों के लिए बनाए गए रे के रेखाचित्रों को समीक्षक उत्कृष्ट कला की श्रेणी में रखते हैं.

सत्यजीत रे फिल्म निर्माण से जुड़े हर काम में माहिर थे. इनमें पटकथा, कास्टिंग, पार्श्व संगीत, कला निर्देशन, संपादन आदि शामिल हैं. यानी वे एक तरह से चलता-फिरता फिल्म संस्थान थे. फिल्मकार के अलावा वे कहानीकार, चित्रकार और फिल्म आलोचक भी थे. बच्चों की पत्रिकाओं और किताबों के लिए बनाए गए रे के रेखाचित्रों को समीक्षक उत्कृष्ट कला की श्रेणी में रखते हैं. सत्यजीत रे की बाल मनोविज्ञान पर जबरदस्त पकड़ थी और यह उनकी फेलूदा सीरिज में दिखता है जो बच्चों के लिए जासूसी कहानियों की श्रंखला है. कैलीग्राफी में भी सत्यजीत रे बहुत कुशल थे. बंगाली और अंग्रेजी उन्होंने कई टाइपफेस डिजाइन किए थे. रे रोमन और रे बिजार नाम के उनके दो अंग्रेजी टाइपफेसों ने तो 1971 में एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता था।

बचपन में ही पिता का निधन हो गया

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कलकत्ता में हुआ था। महज तीन साल के ही थे जब उनके पिता सुकमार रे का निधन हो गया. मां सुप्रभा रे ने बहुत मुश्किलों से उन्हें पाला. प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र पढ़ने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए रे शांति निकेतन गए और अगले पांच साल वहीं रहे।

नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया का कवर डिजाइन किया

इसके बाद 1943 वे फिर कलकत्ता आ गए और बतौर ग्राफिक डिजाइनर काम करने लगे. इस दौरान उन्होंने कई मशहूर किताबों के आवरण यानी कवर डिजाइन किए जिनमें जिम कॉर्बेट की ‘मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं’ और जवाहर लाल नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ शामिल है।

पाथेर पांचाली का बाल संस्करण में मदद की

1928 में छपे विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के मशहूर उपन्यास पाथेर पांचाली का बाल संस्करण तैयार करने में सत्यजीत रे ने अहम भूमिका निभाई थी. इसका नाम था अम अंतिर भेपू (आम के बीज की सीटी). रे इस किताब से बहुत प्रभावित भी हुए थे. उन्होंने इस किताब का कवर तो बनाया ही इसके लिए कई रेखाचित्र भी तैयार किए जो बाद में उनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के खूबसूरत और मशहूर शॉट्स बने।

विजया से किया प्रेम विवाह

सत्यजीत रे और विजया का प्रेम संबंध आठ साल तक चला। इसके बाद दोनों ने गुप्त रूप से शादी कर ली और उसके बाद अपने अपने परिवारों को मनाने के लिए योजना बनाई। इसके बाद दोनों ने मुंबई में राय के परिवार वालों को बताए बिना रजिस्ट्री मैरिज करने की योजना बनाई. विजया की मां ने उनकी योजना खारिज कर दी. लेकिन प्रेमी युगल ने विजया की मां के रुख को दरकिनार करते हुए 20 अक्टूबर, 1949 को विजया की बहन के घर पर शादी कर ली। इसके बाद एक छोटे प्रीतिभोज का आयोजन किया गया जिसमें गुजरे जमाने के प्रसिद्ध थियेटर और फिल्म अभिनेता पृथ्वी राज कपूर अपनी पत्नी समेत आए थे।

फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से प्रेरित होकर फिल्मों में काम शुरू किया

1949 में सत्यजीत रे की मुलाकात फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से हुई जो उन दिनों अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए लोकेशन की तलाश में कलकत्ता आए थे. रे ने लोकेशन तलाशने में रेनोआ की मदद की. इसी दौरान रेनोआ को लगा कि रे में बढ़िया फिल्मकार बनने की भी प्रतिभा है. उन्होंने यह बात कही भी. यहीं से रे के मन में फिल्म निर्माण का विचार उमड़ना-घुमड़ना शुरू हुआ।

बाइसकिल थीव्स’ से प्रभावित हुए

1950 में रे को अपनी कंपनी के काम से लंदन जाने का मौका मिला. यहां उन्होंने ताबड़तोड़ फिल्में देखीं. इनमें एक अंग्रेजी फिल्म ‘बाइसकिल थीव्स’ भी थी जिसकी कहानी से सत्यजीत रे काफी प्रभावित हुए. भारत वापस लौटते हुए सफर के दौरान ही उनके दिमाग में पाथेर पांचाली का खाका खिंच चुका था।

बड़ी मुश्किल से बनाई पाथेर पंचाली

एक नौसिखिया टीम लेकर 1952 में सत्यजीत रे ने फिल्म की शूटिंग शुरू की. एक नए फिल्मकार पर कोई दांव लगाने को तैयार नहीं था तो पैसा उन्हें अपने पल्ले से ही लगाना पड़ा. लेकिन यह जल्द ही खत्म हो गया और शूटिंग रुक गई. रे ने कुछ लोगों से मदद लेने की कोशिश की. लेकिन वे फिल्म में अपने हिसाब से कुछ बदलाव चाहते थे जिसके लिए रे तैयार नहीं थे. आखिर में पश्चिम बंगाल सरकार ने उनकी मदद की और 1955 में पाथेर पांचाली परदे पर आई. इस फिल्म ने समीक्षकों और दर्शकों, दोनों का दिल खुश कर दिया. कोलकाता में कई हफ्ते हाउसफुल चली इस फिल्म को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. इनमें फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में मिला विशेष पुरस्कार बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट भी शामिल है।
इसके बाद तीन दशक से भी लंबे समय के दौरान सत्यजीत रे ने करीब तीन दर्जन फिल्मों का निर्देशन किया. इनमें पारस पत्थर, कंचनजंघा, महापुरुष, अपूर संसार, महानगर, चारूलता, अपराजितो, गूपी गायन-बाघा बायन शामिल हैं. 1977 में उनकी एकमात्र फिल्म शतरंज के खिलाड़ी आई. 199। में प्रदर्शित आंगतुक सत्यजीत रे के सिने करियर की अंतिम फिल्म थी.

1992 में भारत रत्न मिला, स्पेशल आस्कर भी

फिल्मों में अतुलनीय योगदान के लिए सत्यजीत रे को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले. 1978 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल की संचालक समिति ने उन्हें विश्व के तीन सर्वकालिक निर्देशकों में से एक के रूप में सम्मानित किया. भारत सरकार की ओर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं के लिए उन्हें 32 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. सत्यजीत रे दूसरे फिल्मकार थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया. 1985 में उन्हें हिंदी फिल्म उद्योग के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1992 में उन्हें भारत रत्न भी मिला और ऑस्कर (ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) भी. हालांकि काफी बीमार होने की वजह से वे इसे लेने खुद नहीं जा सके थे. इसके करीब एक महीने के भीतर ही 23 अप्रैल 1992 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनका निधन हो गया.

सा‍हित्यिक रचनाओं पर बनी फिल्मों पर आलोचकों की ज्यादा तीखी नजर रहती है. अक्सर रचनाओं का फिल्मी रूपांतरण आलोचना का सबब बनता है. लेकिन पाथेर पांचाली हो या प्रेमचंद की कहानी पर बनी शतंरज के खिलाड़ी, सत्यजीत रे की फिल्में इस चलन की अपवाद रहीं. शतरंज के खिलाड़ी के बारे में उनका कहना था कि अगर उनकी हिंदी भाषा पर पकड़ होती तो यह फिल्म दस गुना बेहतर होती.
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उनके द्वारा निर्देशित 5 बड़ी फिल्में

1- अपू ट्रायोलॉजी- इस फिल्म को तीन भागो में बनाया गया था. पहला भाग पत्थर पंचली दूसरा भाग अपराजितो और तीसरा भाग द वर्ल्ड ऑफ अपू था. फिल्म के तीनों भागों को देशभर में काफी पसंद किया गया था. इस फिल्म से भारतीय सिनेमा के लिए अंतराष्ट्रीय कला क्षेत्र के भी दरवाजे खुल गए थे.

2- महानगर- इस फिल्म में सत्यजीत रे ने बड़ी खूबसूरती से बड़े शहरों की में रहने वाले लोगों के लिये गुजर-बसर करना कितना मुश्किल होता है. साथ ही ये फिल्म ये भी बताती है कि किस तरह से बड़े शहर में रहने वाली महिलाएं ऑफिस में काम करने के साथ घर के काम भी बड़ी सहजता से करने में सक्षम होती हैं.

चारूलता- इस फिल्म को अपने समय के आगे की फिल्म माना जाता है. फिल्म में महिला के व्यभिचार और अकेलेपन को बहुत सहजता से बताती है. फिल्म में एक महिला के अकेलेपन को दिकाया गया है. फिल्म की कहानी ये है कि एक महिला अपने मेंटर से प्रेम में पड़ जाती है और मेंटर उनके पति का चचेरा भाई होता है.

4- शतरंज के खिलाड़ी- ये फिल्म हिंदी भाषा में बनाई गई सत्यजीत दा की एकलौती फिल्म थी. फिल्म की कहानी अवध के आखरी मुगल वाजिद अली शाह और उनके शासन के पतन पर फिल्माई गई थी. फिल्म का केंद्र संवेदनशील ना रख कर हल्के-फुल्के अंदाज में रखा गया. फिल्म में उनके मंत्रियों की कहानी बताई गई जिनको शतरंज खेलने की जिद रहती है और वो इसे आनंदित हो कर खेलने के लिए महफूज जगाहों की तलाश करते रहते हैं. फिल्म में मुख्य किरदार अमजद खान, संजीव कुमार और सईद जाफरी ने निभाया था.

5- आगुंतक – ये फिल्म सत्यजीत दा कि आखरी फीचर फिल्म थी. फिल्म में उत्पल दत्त ने अभिनय किया था. फिल्म की स्क्रिप्ट, डायलॉग और सीन्स बहुत ही शानदार थे. अपने बेहतरीन अभिनय से उत्पल दत्त ने भी फिल्म में चार चांद लगा दिए थे।

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