
भुवनेश्नर नाम में सनातन आस्था की अभिव्यक्ति है। भुवन के ईश्वर। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ यहां स्वयंभू प्रकट हुए था। भुवनेश्वर और इसके निकटवर्ती क्षेत्र में भव्य मंदिरों की श्रृंखला है। इनमें से अनेक मंदिरों का निर्माण मध्यकाल में हुआ। इनकी भव्यता देख कर गौरव की अनुभूति होती है। उस कालखंड में विश्व के किसी भी देश में निर्माण कार्यों का ऐसा विकसित ज्ञान नहीं था। अनेक मंदिरों में तो खगोल और नक्षत्र विज्ञान के सूत्र भी समाहित है। उस समय भारत की वास्तुकला अत्यंत विकसित थी। मंदिरों की कलाकृति आज भी आश्चर्यचकित करती है। भुवनेश्वर को
एकम्र क्षेत्र माना जाता है। यहां की सांस्कृतिक धरोहर तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ही अस्तित्व में रही हैं। यह भारत का प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है। लिंगराज मंदिर, परशुरामेश्वर मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर भुवनेश्वर के सनातन आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। संग्रहालयों में भी भारतीय विरासत और धरोहर संरक्षित है। इनका आकर्षण विदेशों तक है। प्राकृतिक दृष्टि से भी भुवनेश्वर समृद्ध है। नंदनकानन चिड़ियाघर और टिकारपाड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य भी पर्यटकों को आकृषित करता है। लिंगराज मंदिर की भव्यता विश्वप्रसिद्ध है। इसके विशाल परिसर में मुख्य मंदिर के साथ ही एक सौ आठ मंदिरों की श्रृंखला है।
परशुरामेश्वर मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में हुआ था। नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ जैसा ही इसका स्वरूप है। इसके निकट अनेक अन्य शिवमन्दिर हैं।
शिव जी के साथ ही भगवान गणेश और माता पार्वती की भी भव्य मूर्तियाँ हैं।
राजा रानी मंदिर में भगवान शिव और माँ पार्वती की कलाकृतियां हैं।
भुवनेश्वर में वनवासी कला और कलाकृति म्यूज़ियम का भी है।
इसके अलावा खंडगिरी गुफ़ाएँ भी पर्यटन की दृष्टि में आकर्षक हैं। दूसरी शताब्दी में यहाँ मंदिर और मूर्तियों का निर्माण करते थे। गुफाओं को देखकर इसका अनुमान लगाया जा सकता है। डारस बाँध सहित अनेक प्राकृतिक स्थल भी हैं।



