उत्तराखंड

शिक्षा में संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

आधुनिक युग में तकनीक व भौतिक सुविधाओं का खूब विकास हुआ। लेकिन विकास की दौड़ में सामाजिक व मानवीय संवेदनाओं का महत्व कम हुआ है। उपभोगवादी सभ्यता ने अनेक प्रकार की अन्य समस्याओं को भी जन्म दिया है। प्रकृति व पर्यावरण संबंधी संकट भी बढ़ रहा है। ऐसे में संतुलित विकास पर ध्यान देना अपरिहार्य हो गया है। यह कार्य पाश्चात्य सभ्यता के माध्यम से नहीं हो सकता। उन्हें तो अपनी समस्याओं का समाधान दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि उनका चिंतन इसके अनुरूप नहीं है। जबकि भारत के प्राचीन ऋषियों मनीषियों का चिंतन शाश्वत है। यह आज भी प्रासंगिक है। नई शिक्षा नीति बनाई थी, उस पर अमल चल रहा है। इसमें सांस्कृतिक चेतना के साथ आधुनिक विकास को महत्व दिया गया।
भारत में तो जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष बताया गया। उसी के अनुरूप सभी कार्यों का संदेश दिया गया। आधुनिक युग में होने वाले सकारात्मक बदलाव को स्वीकार करना अनुचित नहीं। लेकिन यह सब अपनी महान विरासत के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए। हरिद्वार स्थित
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में यह तथ्य रेखांकित हुए। इसमें मुख्य अतिथि जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी थे। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार ने बीते दशकों में युग चेतना को जगाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। समारोह के अध्यक्ष प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि आज की शिक्षा का लक्ष्य केवल बाहर की चुनौतियों से जूझना नहीं, बल्कि भीतर की सुप्त चेतना को जगाना है। बाहर की आग को बुझाना और अंदर की आग-सेवा, सद्भाव और राष्ट्रभाव को प्रज्वलित करना ही सच्ची दीक्षा है। युवा अपनी शिक्षा को सेवा,संस्कार और साधना से जोड़े। इससे उनका जीवन को सार्थक होगा। राष्ट्र और मानवता के उत्थान में भी वह निर्णायक भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम होंगे। जब चिंतन,चरित्र और व्यक्तित्व ऊपर की ओर उठना प्रारंभ करते हैं, तभी व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा देने में सक्षम होता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मानवीय चेतना का विकास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराना है।

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