
लखनऊ। प्राचीन भारत के ऋषि युगदृष्टा थे। उन्होंने प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का जो वैज्ञानिक विचार दिया, वह आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः
अर्थात यह पृथ्वी हमारी माता है और हम सब इसके पुत्र हैं। इसका संरक्षण हम सभी का कर्तव्य है। दुनिया में जब सभ्यता का विकास नहीं हुआ था,तब हमारे ऋषि पृथ्वी सूक्त की रचना कर चुके थे। पर्यावरण चेतना का ऐसा वैज्ञानिक विश्लेषण अन्यत्र दुर्लभ है। भारत के नदी व पर्वत तट ही प्राचीन भारत के अनुसंधान केंद्र थे। सैंतीस करोड़ पौधों के रोपण का अभियान भारतीय विरासत के अनुरूप है