हिंदू ही नहीं, मुस्लिम और ईसाई परिवारों को भी मिली अस्थियों की अनूठी सेवा : अशोक गोयल

आगरा। विगत 40 वर्षों से लावारिस अस्थियों की सेवा के अनोखे सेवा प्रकल्प को संचालित कर रही श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी का सफर नवम अस्थि विसर्जन यात्रा तक आ पहुँचा है।
सेवा की इस अनूठी यात्रा में पहले ही कदम से जुड़े श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी के संरक्षक व प्रमुख समाजसेवी श्री अशोक गोयल के पास इस यात्रा से जुड़े कई अनूठे अनुभव और संस्मरण हैं।
जन जागरूकता की दृष्टि से उन्होंने बताया कि लावारिस अस्थियों की इस सेवा से हिंदू ही नहीं, मुस्लिम और इसाई परिवार भी लाभान्वित हुए हैं। समाज में सर्वधर्म समभाव का संदेश गया है। कई बार सामाजिक समस्याओं का निदान भी हुआ है।
लावारिस अस्थियों में पेसमेकर देखकर अपने पिता के प्रति हुई आश्वस्ति
अशोक गोयल बताते हैं कि लावारिस अस्थियों के विषय में कार्य करते समय अनेक मार्मिक और प्रेरणादायक घटनाएँ हमारे समक्ष आईं। इनमें से एक घटना तो हृदय को गहराई तक छूने वाली थी।
शहर के एक प्रसिद्ध ज्वेलर्स (बलराज संस) की मृत्यु आगरा में ही उनके निवास के निकट एक रेल दुर्घटना में हो गई। पुलिस द्वारा अज्ञात के रूप में उनका दाह संस्कार कर दिया गया। दुखी और परेशान परिवारीजनों को श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी ने अस्थियाँ सुरक्षित होने की जानकारी दी। उनको विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब उनकी अस्थियाँ उन्हें सौंपी गईं और उन अस्थियों में उन्हें जब पेसमेकर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया तो यह देखकर परिवारीजन आश्वस्त हो गये और भावविभोर होकर बोले- “हमारे पिताजी ने कुछ समय पूर्व ही पेसमेकर लगवाया था। हमें पूरा विश्वास नहीं था कि ये उन्हीं की अस्थियाँ हैं, परंतु आज आपने जो व्यवस्था की, उसे देखकर हम रोमांचित हैं।”
यह क्षण केवल सेवा का नहीं, बल्कि किसी परिवार को आत्मिक शांति प्रदान करने का था।
जब मुस्लिम युवक का विद्युत शवदाह गृह में किया अंतिम संस्कार..
अशोक गोयल ने बताया कि इस सेवा प्रकल्प को संचालित करते हुए एक बार एक मुस्लिम युवक की मृत्यु के उपरांत उसका अंतिम संस्कार विद्युत शवदाह गृह में कर दिया गया। इस पर मुस्लिम समुदाय में गहरी नाराज़गी फैल गई और उन्होंने प्रशासन के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया। प्रशासन के हाथ पैर फूले हुए थे।
हमने तत्परता से जिलाधिकारी महोदय से संपर्क कर यह प्रस्ताव रखा कि यदि अस्थियाँ मुस्लिम समुदाय को ससम्मान सौंप दी जाएँ, तो वे उन्हें अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार कब्रिस्तान में दफना सकते हैं।
यह बात मुस्लिम समाज के नेताओं तक पहुँची। वे स्वयं हमारी व्यवस्था को देखने आए। जब उन्हें यह पूर्ण विश्वास हो गया कि जो अस्थियाँ दी जाएँगी, वे वास्तव में उसी युवक की हैं — तब उन्होंने यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी ने एक छोटे ताबूत में रखकर अस्थियाँ उनको प्रदत्त कीं।
इस प्रकार, हमने श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी के माध्यम से एक संवेदनशील सामाजिक एवं धार्मिक मुद्दे का सौहार्दपूर्ण समाधान कर, विश्वास, समरसता और सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
एक ईसाई प्रधानाचार्य की अंतिम इच्छा के अनुरूप किया अंतिम संस्कार..
इसी क्रम में एक ईसाई विद्यालय के प्रधानाचार्य की घटना भी उल्लेखनीय है। उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा से विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार की व्यवस्था करवाई। इस निर्णय ने समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरूकता एवं सामाजिक सरोकार के प्रति एक नई सोच को जन्म दिया। उनके परिवरीजनों ने भी छोटे ताबूत में अस्थियाँ रखकर अपने धर्म के अनुसार व्यवस्थाएँ पूरी कीं।
अज्ञात शव की पहचान के वक्त ही सौंप दीं अस्थियाँ
अशोक गोयल ने बताया कि हमने इस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया की भी शुरुआत की थी कि जब भी किसी अज्ञात शव की पहचान के लिए थाने में कपड़े आदि परिजनों को दिखाए जाएँ, उसी समय उस व्यक्ति की अस्थियाँ भी परिवार को सौंप दी जाएँ, जिससे परिजनों को मानसिक संतोष और धार्मिक परंपराओं के निर्वहन में सुविधा रहे।
हमें गर्व है कि 40 वर्ष पूर्व शुरू की गई यह प्रक्रिया आज भी संस्था के माध्यम से पूरी आस्था, श्रद्धा और संवेदनशीलता के साथ निरंतर संचालित हो रही है। गंगा में अस्थियों का विसर्जन वर्ष 1997 से प्रारंभ हुआ है।