
यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि जितना राष्ट्रहित को समर्पित, बेहद ईमानदार एवं लोकप्रिय प्रधानमंत्री पिछले ग्यारह वर्षों से हमें मिला है, उतना ही नकारात्मक एवं जनविरोधी विपक्ष भी अपने ही देश में है। विपक्षी नेताओं के पास पिछले ग्यारह वर्षों से मोदी विरोध के अलावा कोई दूसरा एजेंडा ही नहीं है और इसके लिए वे जनहित एवं राष्ट्रहित से भी खिलवाड़ करने में भी संकोच नहीं करते। देश की एकता एवं अखण्डता को सुदृढ़ करने के लिए जम्मू और कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति एवं जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन का भी विपक्ष ने विरोध किया तो जीएसटी जैसे बहुप्रतीक्षित कर सुधार का भी विरोध कर इसे गब्बर सिंह टैक्स कहा गया तथा इसे कारोबार विरोधी एवं विकास विरोधी तक करार दिया गया। धारा 370 की समाप्ति को मुस्लिम विरोधी एवं समाज के एक वर्ग की भावनाओं से खिलवाड़ कहते हुए देश की एकता एवं भाईचारे के लिए खतरा बताने का दुष्प्रचार किया गया। यह बताने की जरूरत नहीं कि देश एवं जम्मू कश्मीर की जनता मोदी जी के साथ खड़ी रही एवं विपक्ष को झूठा साबित करने में कोई कोताही नहीं बरती। नोटबंदी हो या तीन तलाक के खिलाफ कानून, आतंकवाद के प्रति जीरो टालरेन्स की नीति के तहत उठाए गए कदम हों या चीन एवं पाकिस्तान को करारा जवाब देना, हर समय विपक्ष देश के साथ खड़े होने एवं सरकार को सकारात्मक सहयोग देने के बजाय मात्र मोदी विरोध के एजेंडे पर ही चलता दिखा।
अभी संसद के मानसून सत्र के समापन के पूर्व सरकार तीन बिल लेकर आई जिन्हें लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह जी ने पेश किया। इन बिलों में यह प्रावधान है कि प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्य सरकार एवं केन्द्र शासित प्रदेश में मंत्री यदि किसी ऐसे आरोप में जेल जाता है जिसमें पांच वर्ष से अधिक की सजा हो सकती है तो 30 दिनों के बाद भी जेल में रहने पर उसे पद छोड़ना होगा और आरोप मुक्त होने पर ही वह दोबारा पद गृहण कर सकेगा। विपक्ष इन बिलों का विरोध इस आधार पर कर रहा है कि सरकार ऐसे कानून इसलिए ला रही है जिससे इन कानूनों के सहारे वह विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर कर सके। विपक्षी नेताओं ने एकसुर से सरकार की नियत पर सवाल खड़े किए और बेशर्मी के साथ इन बिलों का सदन में विरोध किया। बेहतर होता कि विपक्षी नेता अपनी नियत, नैतिकता एवं करतूतों पर भी कुछ बोलते जिससे मजबूर होकर सरकार को ऐसे कानून लाने के लिए सोंचना पड़ा। यह कितना शर्मनाक है कि यदि सरकार राजनीति में शुचिता लाने के लिए कोई कानून ला रही है तो उसका भी विरोध देश के सत्तालोलुप नेता एवं दल कर रहे हैं। विपक्ष आखिर क्या चाहता है कि कोई भी नेता चाहे कितने भी गंभीर आरोप में कितने भी दिनों से जेल में हो, उसको जनता के प्रति जवाबदेही से दूर रखा जाय। यह बिल समावेशी है और प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तथा सभी मंत्री इसके दायरे में हैं तो फिर विरोध क्यों? हकीकत यह है कि विपक्षी नेताओं विशेष रूप से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एवं दिल्ली सरकार में उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन तथा कुछ अन्य विपक्षी नेताओं की हठधर्मिता एवं अपने को कानून से भी ऊपर मानते हुए राजनीति में नैतिकता को मोदी के षड़यंत्र के बहाने ताक पर रखने की प्रवृत्ति ने ही जनभावनाओं का आदर करते हुए वर्तमान सरकार को ऐसे कानूनी प्रावधान लाने के लिए विवश किया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब अरविंद केजरीवाल लम्बे समय तक जेल में रहते मुख्यमंत्री पद पर बने रहे तो न्यायालय ने उन पर कुछ प्रतिबन्ध तो लगाए परन्तु उन्हें इस्तीफा देने के लिए कोई आदेश देने में यह कहकर अपनी विवशता जताई कि वह किसी भी कानून के तहत उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। यह कानून के अनुसार पूरी तरह से मुख्यमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल के विशेषाधिकार का मामला है और राजनैतिक शुचिता एवं नैतिकता के तहत उन्हें ही इस पर निर्णय लेना होगा। यह वही अरविंद केजरीवाल हैं जो दिल्ली में सत्ता में आने के पूर्व देश के सभी नेताओं को भ्रष्ट कहते नहीं थकते थे और यह वादा करते थे कि मेरी सरकार आने पर आरोप लगते ही मंत्री हो या मुख्यमंत्री, उसे अपने पद से इस्तीफा देना होगा। बाद में तो वो अपने वादों से ऐसा पलटे कि गिरगिट भी शर्मा जाए। मोदी के विरोध में केजरीवाल ने उन सभी से हाथ मिला लिया जो भ्रष्टाचार के ही मामले में सजायाफ्ता हैं या जमानत पर हैं। इन बिलों के विरोधी अधिकतर दलों के नेता भ्रष्टाचार के मामले में ही या तो जमानत पर हैं या जांच प्रकिया का सामना कर रहे हैं। राहुल गांधी हों या सोनिया गांधी, तेजस्वी यादव हों या लालू यादव का पूरा परिवार, सबके इन बिलों के विरोध का एक ही कारण है भय। जहाँ तक कानूनों के दुरूपयोग का सवाल है, इसे नकारा नहीं जा सकता और संयुक्त संसदीय समिति को ऐसे प्रावधान करने पर विचार करना होगा कि भविष्य में इन कानूनों का दुरूपयोग कोई भी राजनीतिक दल विपक्ष के नेताओं के प्रति न कर सके। कानून के दुरुपयोग की आशंका किसी भी कानून की उपादेयता पर सवाल नहीं खड़े करती। देश में अनेकों ऐसे कानून हैं जिनके दुरूपयोग की खबरें समय समय पर आती रहती हैं परन्तु इसका यह मतलब तो नहीं कि कानून बनाने वालों की नियत पर शक किया जाए। सत्तापक्ष द्वारा सबसे अधिक दुरुपयोग अगर विपक्ष की सरकारों को गिराने के लिए किसी भी कानूनी प्रावधान का कांग्रेस की सरकारों ने किया तो वह धारा 356 का प्रयोग कर चुनी हुई सरकार बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू करना। यह कानून आज भी कायम है। अतः मेरा मानना है कि सभी राजनीतिक दलों को राजनीति में शुचिता लाने एवं नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए इन कानूनों का समर्थन करना चाहिए और संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष अपने सकारात्मक सुझावों से एक मजबूत एवं पारदर्शी कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।