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"ओ सजन"

डाॅ किरण मिश्रा

शारदीय रात्रि
ले रहा मधु चुबंन 
विधु मृदुल चाँदनी गात।

चंचल-चपला यामिनी 
पुलकित मधुर सुहावनी
नृत्यांगना, नक्षत्र तारों की बारात ।

गीत गाती मनभावनी ,
अद्भुत प्रत्यंग लुभावनी
मदिर-मदिर रागिनी 
छेड़ रही मलयानिल बयार।

सुगन्धिनी ,सुवासिनी,
स्वेद वस्त्रधारिणी, 
उत्तानमुखी कुमुदिनी,
भीनी-भीनी सुहासिनी, उन्मादिनी
उन्मत्त भ्रमर डोले, पंक-अंक ताल।

कंपित अधरावली,
बिखरती अलकावली
आस डूबते दृगताल,
कामिनी,अर्धान्गिनी, 
ह्रद मंदिर दीपक जला
बाट जोहती सुहागिनी,
आ रही चौथ करवा रात।

आ आ भी जा, अब ओ सजन ....
दे दे मुझे बैठती, इन साँसों की सौगात!!

शारदीय रात्रि
ले रहा मधु चुबंन, विधु मृदुल चाँदनी गात।

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