
सन 2008 की बात है। जिला मुजफ्फरनगर में एक ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने पूरे देश को जाटों की एकजुटता और ताकत का एहसास कराया। मुजफ्फरनगर के सांसद हरेन्द्र मलिक के पुत्र पंकज मलिक और एक अधिकारी के बीच मामला तूल पकड़ गया था। मायावती सरकार ने इस मामले में पंकज मलिक और उनके चार साथियों पर कई संगीन धाराएँ लगा दीं।
जनवरी की कड़ाके की ठंड में किसानों ने ऐलान कर दिया कि पंकज मलिक की गिरफ्तारी किसी भी कीमत पर नहीं होने दी जाएगी। प्रशासन ने उनके तीन साथियों को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद सर छोटूराम जाट डिग्री कॉलेज के मैदान में विशाल पंचायत बुलाई गई। उस दिन जितनी भीड़ मैदान में उमड़ी, वैसी शायद पहले किसी रैली में नहीं देखी गई थी। मंच पर चौधरी अजित सिंह, चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत, चौधरी हरेन्द्र मलिक समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम बड़े जाट नेता मौजूद थे।
पंचायत के दौरान चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने प्रशासन को खुली चेतावनी देते हुए कहा, “टैम देख कर ठीक 10 मिनट में म्हारे बालकां नै यहाँ म्हारे धोरे ला दो, नहीं तो 11वीं मिनट में सारे किसान जेल तोड़ के खुद ले आवेंगे।” बाबा टिकैत की इस हुंकार से पूरा मैदान गूंज उठा। किसानों का गुस्सा देखकर मुजफ्फरनगर में सन्नाटा छा गया और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए नतीजा बाबा की चेतावनी के मात्र 6 मिनट के भीतर सभी लड़कों को छोड़ दिया गया। यह केवल एक घटना नहीं थी, बल्कि उस दौर में जाट समाज की एकता, प्रभाव और नेतृत्व की ताकत का प्रतीक थी।
आज ऐसी घटनाएँ सुनने में भले असंभव लगती हों, लेकिन बाबा टिकैत की पंचायत में कई बार ऐसे फैसले हुए, जिन्होंने सत्ता और प्रशासन दोनों को झुकने पर मजबूर किया। लेकिन आज के तथाकथित किसान नेता, सियासी नेताओं, विधायकों और मंत्रियों की चौखट पर अपनी नाक रगने के लिए दिल्ली और लखनऊ के बीच चक्कर काटते रहते हैं फिर भी मंत्री उनकी नहीं सुनते और वहीं दूसरी ओर बाबा टिकैत थे जिनको मिलने के लिए मुख्यमत्रियों और प्रधानमंत्री को अपना हेलीकॉप्टर गन्ने के खेत में उतरना पड़ता था।
बहरहाल, अगर उस परम्परा को जीवित रखा गया होता तो शायद किसानों की हालत इतनी बदतर न होती और न ही बेगुनाह नौजवानों को जेलों में सड़ना पड़ता। समाज को फिर से अपनी एकता और ताकत पहचाननी होगी, वरना शोषण की यह राजनीति आने वाली पीढ़ियों को कमजोर करती रहेगी।


