लेखसम्पादकीय

राजधानी की सड़कों पर डर ने याद दिलाया 2012 का निर्भया कांड

के. पी. मलिक

दिल्ली एक बार फिर शर्मसार है। 14 मई 2026 को सामने आई चलती प्राइवेट बस में कथित गैंगरेप की घटना ने केवल एक महिला की अस्मिता को नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है जो वर्षों से महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े विज्ञापन और वादे करता रहा है। दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज कर दो आरोपियों को गिरफ्तार जरूर कर लिया है, लेकिन हर बार घटना के बाद गिरफ्तारी और जांच की औपचारिकता आखिर कब तक “न्याय” कहलाती रहेगी?
2012 की निर्भया घटना के बाद देश ने मोमबत्तियां जलाईं, कानून बदले गए, बसों में CCTV और मार्शल की घोषणाएं हुईं, लेकिन आज भी एक महिला सार्वजनिक परिवहन में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही। इसका मतलब साफ है कि समस्या सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन, जवाबदेही और सामाजिक संवेदनहीनता की है।
सवाल केवल अपराधियों का नहीं, उस व्यवस्था का भी है जिसने सुरक्षा को वास्तविक सुधार की जगह राजनीतिक नारे में बदल दिया। दिल्ली जैसे शहर में यदि चलती बस के भीतर ऐसी वारदात संभव है, तो यह निगरानी तंत्र, परमिट व्यवस्था, पुलिस पेट्रोलिंग और परिवहन विभाग की गंभीर विफलता है। अब जरूरत केवल बयानबाजी की नहीं, बल्कि कठोर और दिखने वाले सुधारों की है। हर प्राइवेट बस में रियल-टाइम जीपीएस निगरानी, अनिवार्य पैनिक बटन, चालक और स्टाफ का सख्त पुलिस सत्यापन, रात के समय विशेष मोबाइल पेट्रोलिंग और महिला सुरक्षा मामलों में फास्ट-ट्रैक सुनवाई को जमीन पर उतारना होगा।
इसके साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि महिला सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता का सवाल है। जब तक महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही को “जोखिम” की तरह देखा जाएगा, तब तक कोई शहर सचमुच सुरक्षित नहीं बन सकता।

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