
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो दिन पूर्व हैदराबाद में एक सभा में देशवासियों से वैश्विक भू-राजनीतिक संकट के चलते देश के समक्ष उभरती आर्थिक चुनौतियों का कुशलतापूर्वक सामना करने के लिए आर्थिक अनुशासन का पालन कड़ाई से करने की अपील की। इसके लिए प्रधानमंत्री ने लोगों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने और पेट्रोल के उपयोग में कटौती करने के लिए कदम उठाए जाने पर जोर दिया।इसके लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग अधिक करने, कारपूल में चलने, वर्क फ्राम होम को लागू करने, शिक्षण संस्थानों में आन लाइन कक्षाएं चलाने और सरकारी तथा निजी संस्थानों में वर्चुअल मीटिंग करने जैसे कदम उठाए जाने की बात कही। प्रधानमंत्री ने विदेश यात्राओं पर भी एक वर्ष तक न जाने की सलाह दी जो मुख्य रूप से उन देशवासियों से थी जो परिवार के साथ छुट्टियां मनाने या डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए विदेश जाते हैं और करोड़ों में विदेशी मुद्रा खर्च करते हैं। इसके अतिरिक्त किसानों से भी रासायनिक खाद की खपत घटाने और जैविक खेती को अपनाने की गुजारिश की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पुरानी अपील वोकल फार लोकल पर पुनः जोर देते हुए देश के लोगों से विदेशी ब्रांड के उत्पादों को न खरीदकर स्वदेशी अपनाने पर जोर दिया। इसके साथ ही लोगों से खाद्य तेल के उपयोग में भी 10- 20 प्रतिशत कटौती करने की अपील की गई क्योंकि इसके आयात में भी विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण भाग खर्च होता है। प्रधानमंत्री की इस अपील की गंभीरता का अनुमान इस बात से ही लग जाता है कि अगले ही दिन उन्होंने बड़ोदरा में एक आम जनसभा में पुनः अपनी बात दोहराई और लोगों से सहयोग की अपील की।
यह समझने वाली बात है कि प्रधानमंत्री ने किन हालात और परिस्थिति के अन्तर्गत देशवासियों से यह अपील की और इसके निहितार्थ क्या हैं? जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जब कुछ बोलते हैं तो देश के लोग ही नहीं पूरा विश्व उसे ध्यान से सुनता ही नहीं वरन उसे गंभीरतापूर्वक लेता है और उस पर अमल भी करता है। गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ने से लेकर करोना के समय जनता कर्फ्यू और अन्य अपीलों कों मिले जन समर्थन ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रति जनता के विश्वास की बार बार पुष्टि की है। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक भू-राजनीतिक संकट से देश की अर्थव्यवस्था पर निरंतर बढ़ रहे दबावों का सामना करने के लिए लोगों से आर्थिक अनुशासन का पालन करने की अपील की है। इस अपील में यह संदेश भी छिपा हुआ है कि यदि वैश्विक भू-राजनीतिक संकट लंबा चलता है तो देश के लोगों को भविष्य में कुछ कठोर कदमों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। ऐसा नहीं है कि देश की अर्थव्यव्स्था किसी संकट में है और हालात नियंत्रण के बाहर हो गए हैं जैसा विपक्ष के द्वारा लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा है। यह मानने में किसी को संकोच भी नहीं करना चाहिए कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध दोनों देशों की हठधर्मिता और परस्पर अविश्वास के चलते शीघ्र समाप्त होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। इसके कारण होर्मुज जलडमरूमध्य की बंदी और नाकेबंदी ने भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की खनिज तेल की आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। सभी मध्य पूर्व के देशों के इसकी चपेट में आने के कारण विश्व की 20% और भारत की लगभग 40% खनिज तेल की आपूर्ति बाधित हुई है। यही नहीं भारत की लगभग 50% गैस की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती थी और 25% रासायनिक खाद का आयात भी इसी क्षेत्र से होता है।ऐसे में देश के मुखिया के नाते प्रधानमंत्री का यह दायित्व बन जाता है कि वह देश के लोगों को भविष्य की चुनौतियों का कुशलतापूर्वक सामना करने के लिए आम जनमानस को स्व-अनुशासन की नीति पर चलने के लिए कहें। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि इन संकटकालीन परिस्थितियों के लिए वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया संकट जिम्मेदार है, मोदी या भाजपा सरकार नहीं। इस परिस्थिति में विपक्ष का देश और सरकार के साथ खड़े होने के स्थान पर इस संकट के लिए सरकार को जिम्मेदार बताना और प्रधानमंत्री की अपील या नसीहत को उनकी नाकामी बताना विपक्ष की गैर जिम्मेदार, नकारात्मक एवं क्षुद्र राजनीति की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है।अखिलेश यादव का यह कहना कि संकट और कुछ नहीं,भाजपा ही संकट है, उनकी हताशा और निराशा का ही द्योतक है।
प्रधानमंत्री की अपील पर गौर किया जाए तो यह समझा जा सकता है कि उनकी चिंता की मुख्य वजह तीन हैं। कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधाएं और अन्तरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में तीव्र वृद्धि, डालर के मुकाबले भारतीय रूपए में तीव्र गिरावट और बढ़ता चालू खाते का घाटा तथा विदेशी मुद्रा कोष में आने वाली कमी। प्रधानमंत्री की अपील में देश की जनता से जिस आर्थिक अनुशासन के रास्ते पर चलने की अपेक्षा की गई है, सभी का लक्ष्य यही है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के समय में विदेशी मुद्रा डालर की देश में मांग को कम किया जाए और इसके लिए जनता दिखावे और प्रदर्शन पर खर्च की जाने वाली डालर की मांग में कटौती करे। इससे डालर के मुकाबले रूपए में तेजी से आ रही गिरावट को रोकने में मदद मिलेगी और चालू खाते में घाटे को भी सुरक्षित सीमा में रख सकना सम्भव होगा। इन नसीहतों पर जनता के अमल करने से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले ढाई माह में आई कमी को भी रोका जा सकेगा। अमेरिका ईरान के बीच युद्ध शुरू होने की तिथि 28 फरवरी के बाद से कच्चे तेल की कीमत में 50% से अधिक की वृद्धि अन्तरराष्ट्रीय बाजार में हुई है। विश्व के अधिकांश देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 20% से 50% तक इस अवधि में बढी हैं। इस बात का श्रेय मोदी सरकार को दिया जाना चाहिए कि अभी तक अपने देश में पेट्रोल और डीजल कीमत यथास्थिर हैं। केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी जी ने बताया कि इस दौरान तेल कंपनियों को प्रतिदिन एक हजार करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकार ने भी उत्पादन शुल्क में मार्च माह में कटौती करके तेल कंपनियों को हो रहे घाटे की भरपाई करने का प्रयास किया। विपक्ष का आरोप है कि तेल कीमतों में सरकार के द्वारा वृद्धि नहीं किए जाने का कारण पांच राज्यों में चुनाव का होना था। यह काफी हद तक सही है क्योंकि कोई भी लोकप्रिय सरकार चुनाव के दौरान ऐसे सामान्य जनता के ऊपर बोझ डालने वाले कठोर निर्णय लेने से बचती है जिसका इस्तेमाल विपक्ष जनता को उद्वेलित करने और गुमराह करने के लिए कर सके। पश्चिम बंगाल के चुनाव भाजपा के लिए केवल एक राज्य की जीत का विषय नहीं था। यह एक ऐसा अवसर था जब चुनाव आयोग की सख्ती और ममता बनर्जी के विरूद्ध लहर का फायदा उठाकर न केवल भाजपा प्रदेश में पहली बार सरकार बना सकती थी वरन पश्चिम बंगाल के लोगों को एक भ्रष्ट, तानाशाह और मुस्लिम परस्त आततायी सरकार से निजात दिला सकती थी। ऐसे में भाजपा सरकार तेल कीमतें बढ़ाकर ममता सरकार को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहती थी जिससे वह भाजपा के पक्ष में बने माहौल के विरूद्ध उसका इस्तेमाल कर सके। आखिर विपक्ष जनता को मिली राहत से परेशान क्यों है? मोदी जी ने विपक्ष के इस दावे की भी हवा निकाल दी कि 29 अप्रैल को मतदान खत्म होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी जाएगी क्योंकि कीमतों में आज 15 दिनों के बाद भी कोई वृद्धि नहीं हुई है। मेरी राय में तेल की कीमतों में वृद्धि अपरिहार्य है और सरकार चाहकर भी अब इस निर्णय से बहुत दिनों तक बच नहीं सकती।जनता को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार करने हेतु ही मोदी जी ने जनता से अपील की है।मोदी सरकार इस बात के लिए बधाई की पात्र है कि तेल की आपूर्ति बाधित होने पर भी देश मे पेट्रोल और डीजल की कोई कमी सरकार ने नहीं होने दी। घरेलू उत्पादन बढ़ाकर और रिजर्व स्टाक के उपयोग के साथ साथ सरकार ने तेल आयात के नए वैकल्पिक स्त्रोत तलाशने पर भी युद्ध स्तर पर काम किया है।हम सभी जानते हैं कि भारत कच्चे तेल के लिए आयात पर 85% तक निर्भर है। अन्तरराष्ट्रीय बाजार में तेल की लगातार बढ़ती कीमतें और रूपए में तेज गिरावट के कारण भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है।ऐसे में मोदी जी का पेट्रोल और डीजल की खपत में जनता से कटौती की अपील समय की मांग है जिससे देश और जनता को भविष्य में अति विषम परिस्तिथियों का सामना करने से बचाया जा सके। यह स्वागत योग्य कदम है कि प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों सहित अनेक भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस दिशा में पहल कर जनता के समक्ष नजीर पेशकर विपक्ष के एक और आरोप की भी हवा निकाल दी है जिसका सार यह था कि क्या सरकार में बैठे लोग और अधिकारी भी इस अपील का अनुपालन करेंगे।
सोना देश के आयात बिल की दूसरी सबसे बड़ी मद है।देश सोने की घरेलू मांग का 95% से अधिक आयात करता है।सोने के लिए सामान्य लोगों में आकर्षण और सुरक्षित निवेश समझे जाने के कारण समय-समय पर सरकारों के आह्वान के बावजूद देश में सोने की मांग निरन्तर बढ़ती रही है जिस पर आज 6 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक डालर खर्च करने होते हैं। मोदी जी ने इसी कारण एक वर्ष तक सोना अपरिहार्य स्थितियों को छोड़कर न खरीदने की अपील की है।इससे डालर में रूपए के मुकाबले हो रही अप्रत्याशित वृद्धि को रोकने में मदद मिलेगी और चालू खाते के घाटे में भी कमी आएगी।इसी तरह छुट्टियां मनाने सपरिवार विदेश घूमने जाने वाले और डेस्टिनेशन वेडिंग की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण भी एक वर्ष में अरबों डॉलर खर्च किये जाते हैं।एक अनुमान के अनुसार विदेश यात्रा पर जाने वाले लोगों में ऐसे लोगों की भागीदारी 43% तक है। प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसे वर्ग से एक वर्ष तक विदेश यात्रा से बचने की अपील की है जिससे देश में डालर की मांग में कमी लाई जा सके और रूपए को मजबूत करने के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार में आने वाली कमी को रोका जा सके। यहां यह बताना अनिवार्य हो जाता है कि भारत सरकार के पास आज भी 680 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। 28 फरवरी के बाद से इसमें 36 बिलियन डॉलर की कमी आई है जो प्रधानमंत्री की चिन्ता का कारण है।इसी तरह 28 फरवरी के बाद से रूपए की तुलना में डालर लगभग 13 रूपए मजबूत होकर 82 से बढ़कर 95 रूपए से अधिक पहुंच गया है जो बड़ी परेशानी का सबब है। प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि इस चुनौतीपूर्ण स्थित में डालर की अनावश्यक और ऊलजलूल दिखावे के लिए की जाने वाली मांग पर अंकुश लगाया जाना बहुत जरूरी है ।इसी कारण जनता से स्वतः आगे बढ़कर देशहित में ऐसे कदम उठाकर सरकार को सहयोग देने की अपील की गई है। आज ही सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सोने के आयात पर कस्टम ड्यूटी 6% से बढ़ाकर 15% कर दी है। किसानों से भी रासायनिक खाद की खपत में कटौती की बात इसलिए कही गई है क्योंकि खाद के आयात पर भी लगभग 170000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा खर्च की जाती है।
अन्त में यही कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की अपील समय की मांग है और देश तथा अर्थव्यवस्था को भविष्य की चुनौतीपूर्ण स्थितियों का बखूबी सामना करने के लिए देशवासियों से सकारात्मक एवं सक्रिय सहयोग प्राप्त करने हेतु उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।हमें भी यह समझना चाहिए कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव एवं अनिश्चितता के इस दौर में भविष्य में निर्यात एवं अन्य स्त्रोतों से विदेशी मुद्रा प्राप्तियों में गिरावट आने की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है।इस स्थिति में हमारे पास ऊलजलूल और अनावश्यक खर्चों में कटौती करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।विपक्ष को भी इस नाजुक और चुनौतीपूर्ण समय में अंध मोदी विरोध की नीति को छोड़कर प्रधानमंत्री की अपील को गम्भीरता से लेने और उस पर ईमानदारी से अमल करने की कोशिश करनी चाहिए।


