
हावड़ा ब्रिज विश्व प्रसिद्ध है। हुगली नदी के ऊपर बना यह पुल बहुत व्यस्त रहता है। सेतु के बगल में पैदल पथ भी है। पर्यटक यहां से सेतु का अवलोकन करते हैं। एक छोर पर हावड़ा रेल मंडल का विशाल भवन है। यह भी आकर्षक है। ब्रिज से ही यह भवन दिखाई देता है। यह कैंटिलीवर ब्रिज है। यह संयोग है कि जिस वर्ष भारत छोड़ो आंदोलन चला उसी वर्ष यह बन कर तैयार हुआ था। यह दो सौ अस्सी फीट ऊंचे दो खंभों पर टिका है। इसमें नट बोल्ट का प्रयोग नहीं किया गया। इसको बनाने में वेल्डिंग और रिवेट का प्रयोग किया गया। इस पर जंग ना लगे इसकी भी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए प्रतिवर्ष छब्बीस हजार लीटर से अधिक एल्युमीनियम पेंट और प्राइमर की आवश्यकता होती है। इसको बनाने में छब्बीस हजार टन से अधिक स्टील का उपयोग हुआ था। यह टाटा स्टील कंपनी ने उपलब्ध कराई थी। इसलिए इसके निर्माण का श्रेय टाटा स्टील और क्लैंड ब्रिज एंड इंजीनियरिंग कंपनी के कामगारों को दिया जाता है।
यह सात सौ पांच मीटर लंबा
कैंटिलीवर ट्रस ब्रिज है। स्वतंत्रता के करीब बीस वर्षों बाद इसका नाम रवींद्र सेतु किया गया। यह नामकरण प्रसिद्ध कवि रविन्द्र नाथ टैगोर के प्रति समर्पित था। लेकिन प्रचलित नाम हावड़ा ब्रिज ही है। इसे गेटवे ऑफ कोलकाता भी कहा जाता है।



