
भारत का सपना जब “विकसित राष्ट्र” बनने का है, तो इस यात्रा में सबसे बड़ा आधार सामाजिक एकता और समानता ही हो सकता है। एक ऐसा भारत, जहाँ हर नागरिक को उसकी जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, प्रतिभा और मेहनत के आधार पर पहचान मिले। लेकिन आज भी हमारे समाज में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था ऐसी दीवार खड़ी करती है, जो हिंदू समाज को भीतर ही भीतर विभाजित रखती है। भारत के विकसित राष्ट्र बनने का स्वप्न केवल आर्थिक उन्नति, तकनीकी प्रगति या अवसंरचना के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, समानता और न्याय की मजबूत नींव पर ही संभव है। जब तक समाज के भीतर कृत्रिम विभाजन और भेदभाव कायम हैं, तब तक सच्चे अर्थों में विकास अधूरा रहेगा। वर्तमान समय में हिंदू समाज के भीतर जातिगत आरक्षण एक ऐसा विषय है, जिसने समानता के सिद्धांत को चुनौती दी है। हिंदू धर्म अपने मूल स्वरूप में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे सार्वभौमिक संदेश देता है, जहाँ सभी को एक ही दृष्टि से देखा जाता है। फिर भी, आज SC, ST, OBC और सवर्ण जैसी जातिगत पहचानें राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलगाव पैदा कर रही हैं। आरक्षण, जो कभी सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने का साधन था, अब कई मामलों में स्थायी विशेषाधिकार का रूप ले चुका है। इससे समाज के भीतर अविश्वास, असंतोष और प्रतिस्पर्धा में असमानता पनप रही है।
विकसित भारत के लक्ष्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि हम जातिगत आरक्षण से मुक्त होकर एक ऐसे “समान अवसर आधारित” हिंदू समाज का निर्माण करें, जहाँ सभी को शिक्षा, रोजगार और सम्मान पाने का समान हक हो, चाहे वह किसी भी जाति में जन्मा हो। योग्यता, परिश्रम और नैतिकता ही प्रगति के वास्तविक मानक हों। जातिगत आरक्षण का अंत केवल एक नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक होगा, जो हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोकर विकसित भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएगा। हिंदू धर्म का मूल संदेश “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” समानता, करुणा और भाईचारे पर आधारित है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आरक्षण के नाम पर SC, ST, OBC और अन्य जातीय समूहों के बीच एक स्थायी भेदभाव खड़ा कर दिया गया है। यह भेदभाव आज के समय में सामाजिक एकता के बजाय राजनीतिक लाभ का साधन बन गया है।
निम्न बिंदुओं को ध्यानकेंद्रित करते हुए विकसित राष्ट्र की परिकल्पना को पूर्ण करने के लिए हम सभी भारतीयों को एक जुट होकर संघर्षशील रहना होगा तभी ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार होगा।
* विकसित भारत लक्ष्य और जातिगत आरक्षणमुक्त राष्ट्र की अवधारणा
* SC/ST/OBC सहित सभी हिंदुओं के लिए समान अधिकार की आवश्यकता
* हिंदू धर्म में समानता का आदर्श और वास्तविकता में भेदभाव का विरोध
* आरक्षण के ऐतिहासिक कारण और वर्तमान परिप्रेक्ष्य
* विकसित भारत के लिए समान अवसर आधारित नीति का प्रस्ताव
1. विकसित भारत का लक्ष्य और सामाजिक समानता की अनिवार्यता
विकसित भारत 2047 का सपना केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक विकास पर भी निर्भर है। यदि समाज के भीतर ही गहरी खाई बनी रहेगी, तो आर्थिक प्रगति भी अधूरी रहेगी। जातिगत आरक्षण से उपजे असंतुलन ने हिंदू समाज के भीतर विश्वास की कमी पैदा की है, जो एकता की राह में बाधा बन रहा है।
आर्थिक विकास तभी संभव है जब सभी को समान अवसर मिले।
सामाजिक एकता तभी संभव है जब जातिगत विभाजन समाप्त हो।
राजनीतिक स्थिरता तभी संभव है जब जाति के नाम पर वोट बैंक की राजनीति खत्म हो।
2. जातिगत आरक्षण: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संदर्भ
आरक्षण की व्यवस्था का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान अवसर दिलाना था। यह व्यवस्था असमानताओं को खत्म करने के लिए एक अस्थायी उपाय के रूप में लाई गई थी।
लेकिन समस्या यह हुई कि यह अस्थायी उपाय स्थायी राजनीतिक हथियार बन गया।
प्रारंभ में 10 वर्षों के लिए बनाई गई नीति आज 70+ वर्षों से लागू है।
इससे वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों की मदद के बजाय कई बार सक्षम वर्ग भी इसका लाभ लेने लगा।
जातिगत पहचान को स्थायी कर दिया गया, जिससे सामाजिक एकता कमजोर हुई।
3. हिंदू धर्म का समानता का सिद्धांत
हिंदू धर्म वेदों, उपनिषदों और गीता के माध्यम से स्पष्ट करता है कि सभी जीवों में ईश्वर का अंश है।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – “विद्या विनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि, शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” — ज्ञानीजन सबको समान दृष्टि से देखते हैं।
वेद में “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्” — यह मेरा है, वह तेरा है, यह सोचना संकीर्ण मन वालों का काम है।
मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य कर्म आधारित विभाजन था, जन्म आधारित नहीं।
इस प्रकार, यदि हिंदू धर्म के वास्तविक सिद्धांतों का पालन किया जाए तो जातिगत आरक्षण की कोई जगह नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि यह खुद एक प्रकार का भेदभाव है।
4. आरक्षण के दुष्परिणाम
1. प्रतिभा का पलायन – योग्य और मेहनती व्यक्ति अवसरों से वंचित होकर विदेश चले जाते हैं।
2. सामाजिक विभाजन – समाज में “हम” और “वे” का भाव बढ़ता है।
3. आर्थिक असंतुलन – कई बार आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग भी जातिगत लाभ लेता है, जबकि गरीब सवर्ण को कोई सहायता नहीं मिलती।
4. राजनीतिक दुरुपयोग – चुनावी घोषणाओं में आरक्षण का इस्तेमाल वोट बैंक बनाने के लिए किया जाता है।
5. विकसित भारत के लिए समाधान: समान अवसर आधारित नीति
जाति नहीं, आर्थिक स्थिति आधार बने – सहायता केवल आर्थिक रूप से कमजोर को मिले, चाहे वह किसी भी जाति का हो।
स्कूल से ही समान शिक्षा – सरकारी और निजी शिक्षा की गुणवत्ता समान हो, ताकि प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो।
कौशल विकास को प्राथमिकता – रोजगार पाने के लिए क्षमता और कौशल ही असली मापदंड हों।
राजनीतिक इच्छाशक्ति – जातिगत राजनीति करने वाले नेताओं को जनता अस्वीकार करे।
6. आरक्षणमुक्त हिंदू समाज: एकता और प्रगति का मार्ग
यदि SC, ST, OBC और सवर्ण – सभी हिंदू समान अवसर के साथ आगे बढ़ें, तो:
सामाजिक अविश्वास समाप्त होगा।
योग्यता और मेहनत का महत्व बढ़ेगा।
राजनीतिक दलों को जाति के बजाय विकास पर ध्यान देना पड़ेगा।
हिंदू समाज की आंतरिक शक्ति और एकता बढ़ेगी, जिससे भारत का वैश्विक नेतृत्व मजबूत होगा।
7. सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जाति का अंत
भारतीय संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य विविधता में एकता है। यदि हम जातिगत भेदभाव छोड़कर एक “हिंदू पहचान” को अपनाते हैं, तो:
धार्मिक उत्सवों में सबकी समान भागीदारी होगी।
सामाजिक मेल-जोल में कोई भेदभाव नहीं रहेगा।
विवाह, शिक्षा और व्यवसाय में केवल योग्यता और पारस्परिक सम्मान ही मापदंड होंगे।
‘विकसित भारत’ का सपना तभी साकार होगा जब समाज की नींव मजबूत और एकजुट होगी। जातिगत आरक्षण का अंत और समान अवसर आधारित व्यवस्था एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करेगी जहाँ कोई भी हिंदू, चाहे वह किसी भी जाति का हो, अपने सपनों को साकार कर सके। विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है, जब समाज की संरचना में समानता और एकता का भाव गहराई से स्थापित हो। जातिगत आरक्षण, जो कभी सामाजिक न्याय का साधन था, अब समय के साथ राजनीतिक लाभ और सामाजिक विभाजन का माध्यम बन गया है। यह व्यवस्था हिंदू समाज को SC, ST, OBC और सवर्ण जैसी श्रेणियों में बांटकर योग्यता और परिश्रम के सिद्धांत को कमजोर करती है।
हिंदू धर्म का मूल संदेश स्पष्ट है—सभी मनुष्य एक ही सृष्टिकर्ता की संतान हैं, और सभी को समान सम्मान व अवसर मिलना चाहिए। यदि हम अपने ही धार्मिक और सांस्कृतिक सिद्धांतों का पालन करें, तो जातिगत भेदभाव और आरक्षण दोनों अप्रासंगिक हो जाते हैं। आज आवश्यकता है कि हम “जाति के आधार पर विशेषाधिकार” के स्थान पर “आर्थिक और शैक्षिक आवश्यकता के आधार पर सहायता” की नीति अपनाएं, ताकि वास्तव में जरूरतमंद को ही सहयोग मिले और समाज में स्थायी समानता स्थापित हो। आरक्षणमुक्त हिंदू समाज केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक दृष्टिकोण में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक होगा। यह वह परिवर्तन होगा जो राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देगा, और सभी को एकजुट करेगा।
जब हर हिंदू, चाहे वह किसी भी जाति में जन्मा हो, समान अवसर के साथ अपने सपनों को पूरा कर सकेगा, तब ही विकसित भारत की संकल्पना वास्तविक रूप लेगी। यह समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान पर आधारित समाज भारत को न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि से भी विश्व के सर्वोच्च पायदान पर स्थापित करेगा। आरक्षण की जगह अवसर की समानता, जाति की जगह योग्यता और भेदभाव की जगह भाईचारा — यही विकसित भारत का मूलमंत्र होना चाहिए। तभी भारत राष्ट्र एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और विकसित भारत, अखण्ड भारत के रूप में सर्वविद्मान होगा।
डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा