राजनीतिसम्पादकीय

राजनीति में पारदर्शिता के प्रयास

राकेश कुमार मिश्र लेखक विद्यांत हिंदू पीजी कालेज लखनऊ के पूर्व उप प्राचार्य हैं

हमारे देश में राजनैतिक दलों के अधिकांश नेता दुहाई तो इस बात की देते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है और वोट पाने की ख़ातिर जनमानस को भगवान का दर्जा देने की बात कहते हुए सुने जा सकते हैं विशेष तौर पर चुनाव के वक्त। वे अपने को सामान्य जनता का सेवक एवं एकमात्र हितैषी साबित करने के लिए बड़े से भी बड़ा त्याग करने की बात बार बार दुहराते हैं। हकीकत यह है कि अधिकांश नेता अपने को शहंशाह से कम नहीं समझते और अपने को हर कानून से ऊपर मानते हैं। सभी नेता अपने लिए एक विशेषाधिकार चाहते हैं और उनका तर्क रहता है कि जनता ही उनके सही या गलत होने पर मोहर लगा सकती है और सजा या ईनाम दे सकती है। राजनीति में पारदर्शिता लाने के लिए उठाए गए किसी भी कदम का ये नेता पुरजोर विरोध करते हैं तो इसी सोच के कारण कि वे सामान्य जनता से ऊपर हैं। राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को आर टी आई के दायरे में लाने की बात हो या उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच एवं उस पर कार्यवाही करने की बात हो, आपको इनका एक ही सुर सुनाई देगा कि इससे सत्तापक्ष को विपक्षी नेताओं को फंसाने एवं उनका उत्पीड़न करने का अवसर मिलता है जो अन्यायपूर्ण एवं दमनकारी है ।
राजनैतिक दलों में सत्तापक्ष एवं विपक्ष का खेल तो जीत या हार के आधार पर चलता ही रहता है। ऐसे में नेता आखिर चाहते क्या हैं कि उन पर नेता होने के कारण कभी कोई कानूनी कार्रवाई न की जा सके चाहे उन पर कितने ही गंभीर आरोप हों और जेल जाने पर भी उनके पद पर कोई आंच न आए। किसी भी राजनैतिक दल के नेता आखिरकार लोक सेवक ही हैं और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह होना ही होगा। सामान्य जनता भी यही चाहती है कि यदि उनके चुने गए प्रतिनिधि जनकल्याण का रास्ता भूलकर भ्रष्टाचार या किसी अन्य संगीन अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो उन पर सामान्य नागरिक की ही भांति कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। आखिर इस बात का क्या औचित्य है कि एक सरकारी कर्मचारी यदि 48 घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसका स्वतः निलम्बन हो जाता है परन्तु नेताओं के लिए कोई ऐसा कानून नहीं है कि वो नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र न दें तो उन्हें पद से हटाया जा सके या उन्हें त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया जा सके। देश का उच्चतम न्यायालय भी केजरीवाल के जेल से सरकार चलाने एवं मुख्यमंत्री बने रहने पर ऐसे किसी भी कानूनी प्रावधान के अभाव में उन पर पद त्यागने के लिए किसी भी आदेश दिए जाने पर अपनी मजबूरी व्यक्त कर चुका है। जहाँ तक इस विषय पर कानून न होने की बात है, मेरा मानना है कि संविधान निर्माताओं ने उस समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि जनता का एक चुना हुआ प्रतिनिधि इस सीमा तक बेशर्म एवं सत्तालोलुप हो जाएगा कि वह सभी नैतिक मर्यादाओं को धता बताकर जेल जाने की भी स्थिति में भी अपने पद से चिपका रहेगा और राजनैतिक षड़यंत्र या साजिश के बहाने पद त्यागने से इनकार करेगा।
अपने देश में ही जयललिता, येदुरप्पा, लालू प्रसाद यादव से लेकर हाल ही में हेमंत सोरेन तक अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब राजनेताओं ने जेल जाने से पूर्व अपना त्यागपत्र दिया और जमानत मिलने या दोषमुक्त होने पर पुनः मुख्यमंत्री या मंत्री पद संभाल। ऐसी स्थिति में कुछ नेताओं की हठधर्मिता एवं उनके अराजक रवैये के कारण देश में लोकतंत्र को अपमानित नहीं किया जा सकता। यह भी हास्यास्पद एवं महत्वपूर्ण है कि देश में राजनीति की दिशा बदलने की दुहाई देने वाली एवं आम आदमी की सरकार बनाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ही इस अनैतिक आचरण को बढ़ावा देने में सबसे आगे रही। देश के लोकतंत्र को इस अराजक एवं अनैतिक परिस्थिति से भविष्य में बचाने के लिए ही ऐसे कानून लाने के लिए सरकार को कदम बढ़ाना पड़ा। ऐसे में विपक्षी दलों एवं उनके नेताओं द्वारा इस कानून का विरोध उनकी राजनीति में शुचिता एवं पारदर्शिता के प्रति झूठे आडंबर का ही एक उदाहरण है। विपक्षी दलों की यह आशंका निराधार नहीं है कि इस कानून का दुरूपयोग सत्ताधारी दल विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए कर सकता है परन्तु इसका निदान एक नेक नियत से लाए गए लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कानून का विरोध नहीं हो सकता। विरोध के स्थान पर विपक्ष को इस बात पर रचनात्मक सुझावों के साथ आगे आना चाहिए कि कोई भी भविष्य में इस कानून का दुरूपयोग न कर सके।
हमने एक लम्बा सफर तय किया है और समय समय पर लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाने वाले दौर भी देखे हैं चाहे वह लोकतंत्र को कुचलने वाले आपातकाल का दौर हो या धारा 356 का मनचाहा इस्तेमाल करके चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों को गिराना। इसके बावजूद देश का लोकतंत्र मजबूती के साथ खड़ा रहा। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने एक समय संविधान में 39वां संशोधन करके राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री को भी किसी न्यायिक समीक्षा या कार्यवाही से प्रथक कर लिया था जब पूरा विपक्ष जेल में था। आज सरकार इस बात के लिए कानून लाई है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक यदि कोई भी 30 दिन से अधिक जेल में रहता है तो उसको पदमुक्त समझा जाएगा। विपक्षी नेताओं द्वारा ऐसे समावेशी कानून का भी आशंकाओं के आधार पर विरोध समझ से परे है।

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