
“नेपोटिज़्म की गहराई: सफलता की बैसाखी बने–मां बाप” विषय भारतीय समाज की उस हकीकत को उजागर करता है, जहाँ अवसरों और सफलताओं का बड़ा हिस्सा केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि पर टिका हुआ है। नेता हों या अभिनेता, राजनेता हों या नौकरशाह, उद्योगपति हों या उद्यमी—हर क्षेत्र में यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि मां-बाप अपने बच्चों के लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। बच्चों की योग्यता या प्रतिभा चाहे जैसी भी हो, उनकी पहचान और अवसरों का आधार प्रायः माता-पिता की स्थिति और उपलब्धियां बन जाती हैं। राजनीति में बड़े नेताओं के उत्तराधिकारी चुनावी टिकट और नेतृत्व की कुर्सी पर आसानी से विराजमान हो जाते हैं। फिल्मी दुनिया में स्टार किड्स बिना किसी विशेष संघर्ष के बड़े प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में नजर आते हैं, जबकि प्रतिभाशाली कलाकार संघर्षरत रह जाते हैं। नौकरशाही और प्रशासनिक क्षेत्र में भी बड़े अफसरों के बच्चे संसाधन, नेटवर्किंग और मार्गदर्शन की बदौलत आगे निकल जाते हैं। इसी तरह उद्योग जगत में बड़े उद्योगपतियों के उत्तराधिकारी तैयार साम्राज्य संभाल लेते हैं, जबकि नए उद्यमियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
मानव समाज में परिवार हमेशा से शक्ति और संसाधनों का केंद्र रहा है। जब किसी व्यक्ति ने अपनी मेहनत, संघर्ष और कौशल से सफलता पाई, तो उसके उत्तराधिकारी उस सफलता की छाया में नए अवसर पाने लगे। यही स्थिति कला, राजनीति, नौकरशाही, व्यवसाय और मनोरंजन जगत में भी दिखाई देती है। नेपोटिज़्म (Nepotism) यानी वंशवाद या पक्षपात, वह प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति को केवल उसके रिश्तों या पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण विशेष अवसर दिए जाते हैं। भारतीय संदर्भ में, यह प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि यहां नेता, अभिनेता, राजनेता, नौकरशाह और उद्यमी—सबके बच्चों को समाज में विशेष दर्जा मिल जाता है। वे अपने माता-पिता की मेहनत और पहचान को बैसाखी बनाकर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। नेपोटिज़्म का यह चेहरा समाज में समान अवसर और योग्यता-आधारित प्रतिस्पर्धा की अवधारणा को कमजोर करता है। यद्यपि कुछ बच्चे अपनी मेहनत और कौशल से भी अपनी पहचान बना पाते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में मां-बाप की हैसियत ही उनकी सफलता की बैसाखी बन जाती है। यही सच्चाई यह प्रश्न खड़ा करती है कि क्या भारत में अवसर और सफलता वास्तव में प्रतिभा पर निर्भर हैं, या अब भी पारिवारिक वंश और प्रभाव ही इसका असली निर्धारक है।
1. नेपोटिज़्म का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
“नेपोटिज़्म” शब्द लैटिन भाषा के Nepos (अर्थात भतीजा/वंशज) से निकला है। यूरोप में मध्यकालीन काल के दौरान पोप और चर्च के उच्च अधिकारी अपने भतीजों और रिश्तेदारों को पद व अधिकार देने के लिए जाने जाते थे। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति हर पेशे में फैल गई। भारत में भी वंशवाद कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल में राजा के पुत्र स्वतः ही उत्तराधिकारी बन जाते थे। इसी वंशानुगत संस्कृति ने राजनीति, कला, व्यापार और समाज के हर हिस्से में गहरी जड़ें जमा ली हैं।
2. भारतीय समाज में नेपोटिज़्म की गहराई
भारत जैसे विविधतापूर्ण और जनसंख्या-बहुल देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन अवसरों का वितरण समान रूप से नहीं होता। यहाँ माता-पिता की हैसियत ही बच्चों की पहचान और अवसरों की गारंटी बन जाती है।
राजनीति में चुनावी टिकट अधिकतर परिवारवाद पर बंटते हैं।
फिल्म उद्योग में स्टार किड्स को लॉन्चिंग के लिए लाखों खर्च कर दिए जाते हैं, जबकि सामान्य प्रतिभाशाली कलाकार संघर्ष करते रहते हैं।
नौकरशाही में बड़े अफसरों के बच्चे आसानी से संसाधन, मार्गदर्शन और नेटवर्किंग पाते हैं।
व्यवसाय और उद्योग में उद्योगपतियों के बच्चे पिता की साम्राज्यशाही विरासत पर कब्जा कर लेते हैं।
3. नेता और राजनेताओं के बच्चों में नेपोटिज़्म
भारतीय राजनीति शायद नेपोटिज़्म का सबसे बड़ा अड्डा है।
कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व लंबे समय तक नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द रहा। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी तक सत्ता का हस्तांतरण वंशानुगत परंपरा का उदाहरण है।
वर्तमान में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी भी अब लगभग उसी राह की और अग्रसर है जिसमें आज 70% सांसद/विधायक के बच्चे व सगे/संबंधियों को ही आसानी से टिकट वितरण से लेकर मंत्रालय या किसी उच्च/कमाई/मलाई वाले पद पर बिना योग्यता व अनुभव के ही दे दिया जाता है जबकि उनसे लाख गुने प्रतिभाशाली, अनुभवी व कर्मठ लोग लाइन में लगे रह जाते है। भारतीय जनता पार्टी में एक बड़ा उदाहरण गृहमंत्री, भारत सरकार आदरणीय श्री अमितशाह जी के बेटे श्री जयशाह जो बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर आसीन है और पूर्व-मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, पूर्व-गृहमंत्री भारत सरकार व वर्तमान रक्षामंत्री भारत सरकार आदरणीय श्री राजनाथ सिंह जी के सुपुत्र विधायकों, नोएडा उत्तर प्रदेश, श्री पंकज सिंह जैसे अनगिनत उदाहरण है जो उच्य पद पर आसीन है जबकि योग्यता/ अनुभव जैसा कुछ नहीं सिवाय नेपोटिज़्म के। आने वाले समय में भी पार्टी का नेतृत्व व कमान भी इन्हीं लाडले शहजादों के हाथ होगी।
क्षेत्रीय दलों में भी यही परंपरा जारी है—जैसे समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव, आरजेडी में लालू यादव से तेजस्वी यादव, शिवसेना में बाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे और फिर आदित्य ठाकरे तक और बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती जी के भतीजे श्री आनंद जी जिनमें ना तो अनुभव है और ना ही राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समझ फिर भी पार्टी में नंबर दो की पोजीशन पर है। इसी तरह दक्षिण भारत में करुणानिधि, एम.के. स्टालिन, एन.टी. रामाराव, चंद्रबाबू नायडू, करुणानिधि के बेटे आदि उदाहरण स्पष्ट हैं।
अतः यह स्पष्ट है कि यहां नेतृत्व का अधिकार केवल परिवार तक सीमित हो जाता है। ये सभी शहजादे/ शहजादियों किसी राजकुमार/राजकुमारी से कम नहीं है। ये तो चांदी की चम्मच मुंह में पैदा लेकर हुए है जो मां बाप रूपी वैशाखी पर जिंदा है और इसी वैशाखी के दम पर प्रतिभाशाली, अनुभवी व कर्मठ लोगों का हक मारकर बैठे है।
4. अभिनेता और फिल्मी स्टार किड्स में नेपोटिज़्म
भारतीय फिल्म उद्योग जगत में नेपोटिज़्म सबसे चर्चित बहस का मुद्दा रहा है।
करण जौहर और यशराज फिल्म्स जैसे बड़े निर्माता अक्सर स्टार किड्स को लॉन्च करने के लिए तैयार रहते हैं।
कपूर खानदान, भट्ट परिवार, चोपड़ा परिवार, खान परिवार और देवगन परिवार लंबे समय से अपने बच्चों को फिल्म जगत में स्थापित कर रहे हैं।
आलिया भट्ट, वरुण धवन, अर्जुन कपूर, टाइगर श्रॉफ, जान्हवी कपूर, सारा अली खान, अनन्या पांडे जैसे नाम इस चर्चा के केंद्र हैं।
दूसरी ओर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, इरफ़ान खान, मनोज बाजपेयी, राजकुमार राव जैसे कलाकारों को सालों संघर्ष करना पड़ा क्योंकि उनके पीछे कोई पारिवारिक बैकअप नहीं था।
5. नौकरशाही और अधिकारी परिवारों में नेपोटिज़्म
नौकरशाही को भारत की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन यहाँ भी पारिवारिक प्रभाव की छाया दिखती है।
बड़े अफसरों के बच्चों को बचपन से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए श्रेष्ठ संसाधन, ट्यूशन और वातावरण मिलता है।
कई बार उनकी नेटवर्किंग और रिश्ते परीक्षा या चयन प्रक्रिया को आसान बना देते हैं।
नौकरशाही में पारिवारिक परंपरा बन जाती है—पिता आईएएस तो बेटा भी आईएएस। यह प्रवृत्ति प्रतिभाशाली लेकिन संसाधन-विहीन छात्रों को पीछे धकेल देती है।
6. उद्यमियों और उद्योगपतियों के बच्चों में नेपोटिज़्म
भारतीय उद्योग जगत में भी वंशवाद गहराई से स्थापित है।
अंबानी, अडानी, बिड़ला, टाटा, जिंदल, बजाज और गोदरेज जैसे परिवारों में अगली पीढ़ी स्वतः ही साम्राज्य की बागडोर संभाल लेती है।
मुकेश अंबानी के बच्चे ईशा, आकाश और अनंत अंबानी व्यापारिक मंच पर सामने आ चुके हैं।
उद्योगपतियों के बच्चों को venture capital, networks और brand value पहले से ही मिल जाती है, जिससे उनका उद्यम आगे बढ़ाना आसान हो जाता है।
दूसरी ओर, एक सामान्य उद्यमी को अपना व्यवसाय खड़ा करने के लिए कई बार पूरी जिंदगी संघर्ष करनी पड़ती है।
7. नेपोटिज़्म के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष
(क) सकारात्मक पक्ष:
पारिवारिक अनुभव और मार्गदर्शन बच्चों के लिए सफलता की गारंटी हो सकता है।
संसाधन और नेटवर्किंग का लाभ उठाकर वे समाज के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
कुछ स्टार किड्स अपनी मेहनत और प्रतिभा से भी पहचान बनाते हैं (जैसे रणबीर कपूर, आलिया भट्ट, अभिषेक बच्चन आदि)।
(ख) नकारात्मक पक्ष:
यह योग्यता और समान अवसर की भावना को खत्म कर देता है।
योग्य लेकिन गरीब परिवार के बच्चों के लिए अवसर कम हो जाते हैं।
यह सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।
प्रतिभा की बजाय surname और background को महत्व मिल जाता है।
8. नेपोटिज़्म के कारण समाज पर प्रभाव
प्रतिभा का पलायन: योग्य लोग निराश होकर अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं।
गुणवत्ता में गिरावट: केवल परिवारवाद पर आधारित नेतृत्व अक्सर जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता।
सामाजिक आक्रोश: जनता में असमानता की भावना पैदा होती है।
लोकतंत्र पर खतरा: राजनीति में परिवारवाद लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।
9. नेपोटिज़्म और योग्यता आधारित समाज की आवश्यकता
एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज वही होता है जिसमें अवसर समान रूप से वितरित हों।
शिक्षा और रोजगार में मेरिट को महत्व दिया जाए।
राजनीति में टिकट देने की प्रक्रिया पारदर्शी हो।
फिल्मों और कला में प्रतिभा आधारित ऑडिशन व अवसर दिए जाएं।
उद्योग जगत में नए उद्यमियों को सरकारी और निजी मदद मिले।
10. समाधान और सुधार की दिशा
1. पारदर्शिता: हर क्षेत्र में चयन प्रक्रिया पारदर्शी और योग्यता-आधारित हो।
2. नीतिगत सुधार: राजनीति में परिवारवाद रोकने के लिए सख्त कानून बनें।
3. संवेदनशील समाज: जनता को भी केवल वंश परंपरा नहीं, बल्कि प्रतिभा को महत्व देना चाहिए।
4. प्रतिभा संवर्धन: गरीब और पिछड़े वर्ग के युवाओं को विशेष सहायता और मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
“नेपोटिज़्म की गहराई: सफलता की बैसाखी बने–मां बाप” विषय स्पष्ट करता है कि भारतीय समाज के लगभग हर क्षेत्र में वंशवाद की गहरी जड़ें हैं। नेता हों या अभिनेता, राजनेता हों या नौकरशाह, उद्योगपति हों या उद्यमी—हर जगह बच्चों के लिए मां-बाप की पहचान ही सफलता की सबसे बड़ी सीढ़ी बन जाती है। यह सच है कि कुछ स्टार किड्स अपनी मेहनत और प्रतिभा से खुद को साबित भी करते हैं, किंतु अधिकांश को शुरुआती अवसर केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से मिलते हैं। नेपोटिज़्म की जड़ें भारतीय समाज में इतनी गहरी हैं कि इसे पूरी तरह समाप्त करना कठिन है, लेकिन इसे नियंत्रित करना संभव है। जब तक अवसर केवल कुछ घरानों तक सीमित रहेंगे, तब तक लोकतंत्र, कला, व्यवसाय और नौकरशाही की गुणवत्ता पर प्रश्न उठते रहेंगे। जरूरत है कि माता-पिता अपने बच्चों को बैसाखी देने के बजाय उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा दें।
समाज और व्यवस्था भी ऐसी हो जहाँ हर युवा अपने सपनों को बिना किसी पारिवारिक सहारे पूरा कर सके। तभी असली समानता, योग्यता और न्याय पर आधारित भारत का निर्माण संभव होगा।नेताओं के बच्चों को चुनावी टिकट, अभिनेताओं के बच्चों को बड़ी-बड़ी फिल्में, नौकरशाहों के बच्चों को संसाधन और मार्गदर्शन, तथा उद्योगपतियों के उत्तराधिकारियों को तैयार साम्राज्य आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इसके विपरीत, सामान्य प्रतिभाशाली युवाओं को अवसर पाने के लिए संघर्ष, आर्थिक तंगी और सामाजिक असमानताओं से लड़ना पड़ता है। परिणामस्वरूप समाज में असंतोष, असमानता और योग्यता की उपेक्षा बढ़ती है।
अतः कि नेपोटिज़्म को पूरी तरह समाप्त करना शायद संभव न हो, किंतु इसे संतुलित करना आवश्यक है। माता-पिता अपने बच्चों को अवसर की बैसाखी देने के बजाय आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दें और व्यवस्था ऐसी बने कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी और योग्यता-आधारित हो। यदि राजनीति, फिल्म, नौकरशाही और उद्योग में समान अवसर सुनिश्चित हों, तो ही असली लोकतंत्र और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हो सकेगी। नेपोटिज़्म तभी सकारात्मक बन सकता है जब यह बैसाखी न होकर केवल प्रेरणा का स्रोत बने।
डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा