
चीन का यह एजेंडा भारत के लिए बड़े खतरे की घंटी है। सीपीईसी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरता है। भारत पहले ही इसके खिलाफ आवाज उठाता रहा है, लेकिन काबुल तक के विस्तार का मतलब होगा कि चीन-अफगानिस्तान-पाकिस्तान की त्रिकोणीय धुरी भारत की सीमाओं के इर्द-गिर्द कसती जाएगी। ग्वादर से अक्साई चीन तक जो “आयरन बेल्ट” खड़ी की जा रही है, वह केवल सड़कें नहीं, बल्कि भारत को घेरने वाली सैन्य-सामरिक दीवार है।
दरअसल, चीन का काबुल तक सीपीईसी का विस्तार आर्थिक सहयोग से ज्यादा रणनीतिक घेराबंदी है। पाकिस्तान आतंकवाद का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है, चीन इसे आपदा में अवसर बनाकर साम्राज्यवादी डिज़ाइन आगे बढ़ा रहा है और तालिबान सत्ता के वैधीकरण के लालच में सब कुछ बेच देने पर आमादा है।
भारत के लिए यह समय चेतावनी का है। हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुखर होकर यह साफ करना होगा कि सीपीईसी न केवल संप्रभुता का उल्लंघन है, बल्कि एशिया में अस्थिरता और सैन्यकृत राजनीति का नया बीज है। “सीपीईसी” अब यह सिर्फ एक आर्थिक गलियारा नहीं, बल्कि चीन का सामरिक जाल है, जिसे काटने की तैयारी भारत को अभी से करनी होगी।