
लोकतन्त्र में सत्तापक्ष एवं मजबूत विपक्ष दोनों इसके मजबूत स्तंभ हैं। विपक्ष का यह अधिकार और संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है कि वह सरकार की नीतियों का रचनात्मक विरोध करे और सरकार को आईना दिखाने का काम करे। सदन में सार्थक चर्चा, संयुक्त संसदीय समितियों में भागीदारी और आवश्यकता पड़ने पर धरना प्रदर्शन करके विपक्ष सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और जन कल्याणकारी नीतियां बनाने के लिए प्रतिबद्ध करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। संविधान निर्माताओं ने यह उम्मीद की थी कि जहाँ सत्तापक्ष विपक्ष को समुचित सम्मान देते हुए उनका विश्वास अर्जित करने का प्रयास करे, वहीं विपक्ष भी विरोध के लिए विरोध की राजनीति से बचते हुए सदन के सुचारु संचालन में सहयोग प्रदान करे और ऐसे कदम उठाने से बचे जो संसदीय मर्यादाओं के विपरीत हों। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद विपक्ष की भूमिका निरन्तर नकारात्मक रही है और विपक्ष ने सरकार का विरोध के लिए विरोध को ही अपना एजेंडा बना रखा है। लगता यह है कि गांधी परिवार एवं कांग्रेस के साथ अधिकांश परिवारवादी राजनीतिक दल आज तक यह हजम नहीं कर पा रहे हैं कि एक राष्ट्रवादी विचारधारा को समर्पित सरकार जिसका नेतृत्व एक गरीब निहायत सामान्य परिवार के व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है, किस तरह राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निरन्तर लोकप्रियता के नए प्रतिमान बनाते हुए मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के नेतृत्व में सम्पूर्ण विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी जी के प्रति शुरू से ही इतनी घृणा एवं नफरत से भरा है कि उनका विरोध करने के लिए वह सभी नैतिकता एवं मर्यादा की सीमाओं को लांघकर गाली गलौच की भाषा का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं करता। विपक्ष हर संसद सत्र से पूर्व कोई न कोई मुद्दा तलाश कर सदन में हंगामा एवं संसद सत्र का बहिष्कार करने एवं सदन की कार्यवाही बाधित करने को ही अपनी विजय एवं प्रासंगिकता समझता है। अराजकता की सीमा तक विरोध एवं सभी संवैधानिक संस्थानों का अपमान ही अब विपक्षी नेताओं का एकमात्र ऐजेंडा बन चुका है। कभी अडानी, हिंडनबरग तो कभी पेगासस, कभी एस आई आर तो कभी वोट चोरी जैसे झूठे एवं अतार्किक आरोप लगाकर सदन को बाधित करने की विपक्ष की नीति देश में अराजकता को ही बढ़ावा देने का सुनियोजित प्रयास है। हमें याद रखना होगा कि विपक्ष के यह सभी आरोप कभी भी न्यायालय या विशेषज्ञ समितियों के समक्ष टिक भी नहीं सके परन्तु विपक्ष को कभी भी अपनी इन अराजक करतूतों के लिए शर्मिंदगी भी महसूस न हुई। आज भी विपक्ष अपने उसी अराजक रवैये पर कायम है और बिना किसी संकोच मोदी को वोट चोर एवं मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को वोट चोरी में संलिप्त बताने के दुष्प्रचार में व्यस्त है।
यही नहीं अभी दो दिन पहले ही नेता विपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में वोट अधिकार यात्रा के दौरान यह कहा कि चुनाव आयोग एवं मोदी की मिलीभगत का यह काम 2002 में गुजरात में बनी भाजपा सरकार के समय से चला आ रहा है और गुजरात माडल हकीकत में कोई विकास का माडल नहीं वरन वोट चोरी कर सरकार बनाने का माडल ही था। इस तरह के अतार्किक एवं बेसिरपैर के अनर्गल आरोप संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के अपमान के साथ साथ देश में सरकार के प्रति अविश्वास फैलाने एवं अराजकता की दिशा में देश को झोकने का निहायत घृणित एवं निन्दनीय प्रयास है। अभी परसों ही दरभंगा, बिहार में वोट अधिकार यात्रा के दौरान कांग्रेस के ही मंच से एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने प्रधानमंत्री मोदी की दिवंगत मां को गाली दी जिसके लिए विवाद बढ़ने पर आयोजक ने तो माफी मांगी परन्तु राहुल गांधी, खड़गे जी सहित किसी भी शीर्ष नेता ने उस व्यक्ति की निन्दा में भी दो शब्द नहीं कहे। यह घटना इस बात का सबूत है कि जब शीर्ष नेता गाली गलौच की भाषा का प्रयोग संवैधानिक संस्थानों एवं उन पर आसीन लोगों के लिए करते हैं तो उसका असर नीचे तक कार्यकर्ताओं में जाता है और वे शीर्ष नेतृत्व को खुश करने के लिए बढ़ चढ़कर गाली गलौच की भाषा का प्रयोग करते हैं। किसी भी प्रधानमंत्री या अन्य व्यक्ति की दिवंगत मां के लिए अपशब्द या गाली राजनीति में नैतिकता एवं मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा है।
देश में संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और विपक्ष को सरकार के विरोध का संवैधानिक अधिकार है परन्तु संविधान किसी को भी अपशब्द कहने एवं अतार्किक झूठे आरोप लगाकर संवैधानिक संस्थानों एवं उन पर आसीन लोगों के अपमान की इजाजत नहीं देता। प्रधानमंत्री पर तो ऐसे मनगढ़ंत आरोपों की एक लम्बी सूची है। अडानी को देश बेंच देने, पैगासस के द्वारा विपक्षी नेताओं की जासूसी, हिंडनबरग रिपोर्ट के समय सरकार पर एल आई सी, स्टेट बैंक आफ इंडिया और एच ए एल जैसी देश की संस्थाओं को डुबोने जैसे झूठे आरोप, धारा 370 की समाप्ति को मुस्लिम विरोधी एवं तीन तलाक पर प्रतिबंध को मुसलमानों के निजी कानून में दखल, जीएसटी का छोटे कारोबारियों के हितों पर आघात के नाम पर विरोध तो विपक्ष के दुष्प्रचार एवं जनता को भ्रमित एवं गुमराह करने के कुछ नमूने हैं। पहले सम्पूर्ण विपक्ष ईवीएम का विरोध करने पर आमादा था और अपनी पराजय के लिए ईवीएम पर ही दोष डालता था परन्तु चुनाव आयोग की चुनौती एवं उच्चतम न्यायालय के सख्त रुख के बाद अब उसने मोदी पर चुनाव आयोग की मिलीभगत से वोट चोरी का एक नया सनसनीखेज खुलाशा करने का दुष्प्रचार चालू किया है। महाराष्ट्र में मतदाता सूची में गड़बड़ी करके एवं सायं 5 बजे के बाद चुनाव आयोग की मिलीभगत से भाजपा के पक्ष में फर्जी मतदान बड़े पैमाने पर कराने के आरोपों की हवा जब चुनाव आयोग के जवाब एवं उच्चतम न्यायालय ने याचिका खारिज कर निकाल दी तो राहुल गांधी ने नए सिरे से चुनाव आयोग एवं भाजपा को वोट चोरी में संलिप्त बताने के लिए बंगलौर में प्रेस वार्ता की।यह प्रेस वार्ता जिसे राहुल गांधी ने एटम बम विस्फोट कहा था, वह सुतली बम भी साबित न हो सकी। इस प्रेस वार्ता में जमकर झूठ परोसा गया जिसका पर्दाफ़ाश अनेक समाचार चैनलों एवं स्वयं चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस वार्ता में किया। राहुल गांधी ने जो भी आरोप लगाए, उनमें अधिकांशतः मतदाता सूची में गड़बड़ी से सम्बन्धित थे परन्तु वे यह कहीं भी साबित न सके कि चुनाव आयोग ने वोट चोरी कराकर भाजपा की मदद की। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ने हस्ताक्षरित शपथ पत्र के साथ लिखित में आरोप देने की जब मांग की तो राहुल गांधी ने इसे चुनाव आयोग की धमकी एवं तानाशाही रवैया बताते हुए हकीकत में वोट अधिकार यात्रा के दौरान अपनी सरकार बनने पर तीनों चुनाव आयुक्तों को देख लेने की धमकी दी। यह खुले तौर पर जनता को भ्रमित करके संवैधानिक संस्थानों के प्रति उकसाने एवं देश में अराजकता को ही बढ़ावा देने का षड़यंत्र है।
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह मोदी विरोध में किसी भी सीमा तक जाने के लिए सेना, संवैधानिक संस्थानों एवं न्यायालय तक पर भी सवाल खड़े करने में संकोच नहीं करते। वह यह भी नहीं सोचते कि इससे देश की प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर क्या चोट पहुंचती है और किस तरह पाकिस्तान जैसे शत्रु देश उनकी देश विरोधी बातों का अपने भारत के विरूद्ध दुष्प्रचार के लिए उपयोग करते हैं। वैसे आप राहुल गांधी से इतनी गम्भीरता एवं बुद्धिमता की उम्मीद भी नहीं करे सकते जिनको विदेशों में भी मोदी एवं सरकार के विरुद्ध जहर उगलने और देश में लोकतंत्र की समाप्ति, संवैधानिक संस्थानों पर कब्ज़ा, मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न जैसे झूठे आरोप लगाने में भी लज्जा नहीं आती।
मेरी यह आशंका ही नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास है कि राहुल गांधी यह समझ चुके हैं कि चुनाव में वे मोदी का सामना नहीं कर सकते हैं और वे जार्ज सोरोस एवं सैम पित्रोदा जैसे मोदी एवं राष्ट्रवादी सरकार के विरोधियों के इशारे पर जनता में अविश्वास फैलाने एवं अराजकता को बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक संस्थानों पर निरन्तर प्रहार की नीति पर चल रहे हैं। शायद उन्हें इसकी प्रेरणा पाकिस्तान में इमरान खान के तख़्तापलट एवं बंगलादेश में शेख हसीना की लोकप्रिय सरकार के विरुद्ध विद्रोह एवं सरकार के पतन से मिली होगी। राहुल के आकाओं ने उन्हें यही समझाया होगा कि आप मोदी को तब तक नहीं हटा सकते जब तक आप मोदी के साथ साथ संवैधानिक संस्थानों पर भी जनता में अविश्वास फैलाने में सफल नहीं होते। इसी कारण वह अब जनता से सीधे जुड़े मुद्दे मतदाता सूची में गड़बड़ी कर वोट चोरी का आरोप लगा रहे हैं और भाजपा के साथ साथ चुनाव आयोग को भी कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल गांधी एवं तेजस्वी सहित सभी विपक्षी नेता यह भूल जाते हैं कि भारत में लोकतन्त्र की जड़े बहुत मजबूत हैं और भारत पाकिस्तान या बंगलादेश नहीं है।यह परिस्थिति देश के लिए चिन्ताजनक अवश्य है परन्तु मेरा विश्वास है कि भारत की प्रबुद्ध एवं लोकतंत्र को समर्पित जनता इन अराजक तत्वों का समय आने पर माकूल जवाब देकर इनके अलोकतांत्रिक, जनता के प्रति अपमानजनक एवं देश विरोधी अभियान की हवा निकालने में कोई संकोच नहीं करेगी।