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पड़ोसियों के सवालों के डर से छोड़ी थी दवाई, टीबी चैंपियन की सलाह काम आई

आगरा

जब रामबाग निवासी 18 वर्षीय मोनिका (बदला हुआ नाम) का टीबी का इलाज शुरू हुआ तो पड़ोसियों ने सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया। लोग मोनिका के साथ भेदभाव करना न शुरू कर दें, कल को उसकी शादी में रुकावट न आ जाए, इस डर से से मोनिका की माँ ने उसका इलाज बीच में ही बंद कर दिया। पर इससे उसकी तबियत ज़्यादा ख़राब हो गई। टीबी चैंपियन त्रिलोकीनाथ के समझाने पर माँ ने मोनिका को स्वस्थ करने की ठान ली और उसका इलाज दोबारा शुरू हुआ। अब उसकी हालत में सुधार है।
मोनिका बताती हैं - आठ महीने पहले मेरी गर्दन में गांठ हो गई थी। इसके चलते बुखार व खांसी आने लगी ‌थी। निजी चिकित्सालय से परामर्श लिया। निजी चिकित्सक ने उनका छह दिन उपचार किया। इसके बाद निजी डॉक्टर ने उन्हें चीनी का रोजा स्थित टीबी यूनिट में रेफर कर दिया। वहां उनकी टीबी की जांच हुई और पुष्टि के बाद उपचार शुरू हो गया। इसके बाद उन्हें आराम हो गया। लेकिन कुछ समय बाद यह बात उनके पड़ोसियों को पता चल गया और वह बार-बार टोकने लगे। कुछ साल पहले मोनिका की माँ को टीबी हुई थी और इस दौरान उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा था। अब ऐसा उनकी बेटी के साथ न हो इस डर से उन्होंने मोनिका का इलाज रोक दिया।
इसी दौरान टीबी चैंपियन त्रिलोकीनाथ पोरवाल ने मां से फोन पर संपर्क किया और फोन के माध्यम से ही काउंसलिंग की। मोनिका की माँ त्रिलोकीनाथ से घर पर मिलने में सहज नहीं थी इसलिए चैंपियन और वर्ल्ड विजन संस्था के जिला समन्वयक यूनुस खान ने बाहर मिलकर उन्हें समझाया कि डर कर इलाज छोड़ देने से बिमारी ठीक नही होगी बल्कि ये और खतरनाक साबित हो सकती है। टीबी का पूरा इलाज लेने से ही इसे ठीक किया जा सकता है। साथ ही यह भी बताया कि जो टीबी मोनिका को है (एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी) वह फैलती नहीं है। इन बातों से मोनिका की माँ का डर दूर हुआ और उन्होंने उसका इलाज फिर से शुरू कराया।
मोनिका ने बताया पाँच महीने से उनका उपचार लगातार चल रहा है और इसमें उनकी मां भी साथ दे रही हैं। पहले कमज़ोरी के कारण स्कूल भी छोड़ना पड़ा था पर अब फिर से जाना शुरू कर दिया है।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव का कहना है कि टीबी को जड़ से ख़त्म करने के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि इलाज के साथ-साथ रोगी को परिवार और समाज का साथ और सहयोग मिले। बिमारी को लेकर भय और भेदभाव को दूर करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है – चाहे वो रोगी का परिवार हो, समाज या स्वास्थ्य प्रणाली । समय आ गया है कि हम सब ये ज़िम्मेदारी निभाएं ।

जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. सीएल यादव ने बताया कि मोनिका जैसे कई रोगी भ्रांतियों या भय के चलते इलाज बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं और कई संभावित रोगी जाँच के लिए आगे नहीं आते। यह जानना ज़रूरी है कि भ्रांतियों और भेदभाव से टीबी के उपचार में बाधा उत्पन्न होती है। ये भ्रांतियाँ मरीज के जांच और इलाज में देरी, उपचार में रुकावट व खराब परिणामों के लिए जिम्मेदार बनती हैं।
उन्होंने बताया - टीबी का उपचार पूरा होने के बाद मरीज फिर से पूरी तरह से स्वस्थ हो जाता है। टीबी का उपचार बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। इससे एमडीआर टीबी होने का खतरा रहता है जो सामान्य टीबी से ज़्यादा खतरनाक है और उसका उपचार भी लम्बा चलता है।

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