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इजरायल भारत की दोस्ती से इनके दुश्मन भी खौफ खाएँगे

डाॅ. बचन सिंह सिकरवार

गत दिनों इजरायल में चार सालों में पाँचवीं बार हुए आम चुनाव में यहाँ की जनता ने एक बार फिर कोई डेढ़ साल बाद सबसे अधिक समय तक सत्ता सम्हालने का अनुभव रखने वाले 73वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत देकर, जो विश्वास जताया है, उसके कई माने हैं। पहली बात तो यह है कि नेतन्याहू के बाद बने प्रधानमंत्रियों में से कोई भी उनसे अधिक दिनों तक अपनी सत्ता बनाए रखने में नाकाम रहा है। इनमें से कोई भी इस्लामिक दहशतगर्द संगठन ‘हमास’ इजरायल पर हुए हमलों का उसी जैसी आक्रमकता और वैसी तत्परता नहीं दिखा पाए, जिस शैली में नेतन्याहू प्रधानमंत्री रहते देते आए थे, जो इस देश की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। इस दौरान किसी भी क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति भी नहीं दिखायी दी, जिसकी चाहत में इतने प्रधानमंत्री बदले गए। उनसे निराश होने के बाद देश में चार साल में पाँचवी वार आम चुनाव कराने की नौबत आयी। वस्तुतः जो बात नेतन्याहू में वह किसी दूसरे राजनेता में भला कहाँ है? फिर सैनिक से राजनेता बने बेंजामिन नेतन्याहू यहूदी राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी दोस्ती पर अचरज कैसा है? सचमुच उनकी और मोदी मैत्री बहुत विशेष नहीं, विशिष्ठ है। मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने इजरायल की न केवल यात्रा की,बल्कि उनके साथ कई क्षेत्रों में साथ-साथ काम करने के समझौतों पर हस्ताक्षर भी किये। यही कारण है कि बेंजामिन नेतन्याहू के गठबन्धन की जीत होते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें बधाई देने में देर नहीं की। उन्होंने नेतन्याहू को बधाई देते हुए कहा,‘‘हम अपने संयुक्त प्रयास से भारत-इजरायल के ऐतिहासिक सम्बन्धों को और मजबूत होंगे।’’ अब नेतन्याहू के फिर से प्रधानमंत्री बनने पर भारत के रक्षा क्षेत्र में पहले से कहीं ज्यादा विश्वास और सहयोग बढ़ेगा। भारत की निगरानी और सरहदों को अभेद्य बनाने के आवश्यक उपकरण मिलेंगे। इजरायल भारत की दोस्ती से इनके दुश्मन भी खौफ खाएँगे।

चुनावी नतीजे आने के बाद ‘लिकुड पार्टी’ और नए बने प्रधानमंत्री नेतन्याहू के गठबन्धन सरकार में शामिल यहूदी कट्टरपंथियों के दबाव में यहूदी बहुसंख्यकों की बड़ी माँगों के अनुसार सरकार चलाने की सम्भावना है। उदारवादी, बुद्धिजीवी तथा रिफार्म मूवमेण्ट इन इजरायल मीडिया से कहा,‘‘ इस चुनाव के नतीजों से हमारी सबसे बड़ी चिन्ता यही है कि नई सरकार अरब मुस्लिम नागरिकों के साथ भेदभाव करेगी। उनकी शंका का कारण यह है कि नेतन्याहू की अल्पमत सरकार को एक अरब पार्टी के सांसद ने अपना समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया था। अब नेतन्याहू आराम से बहुमत की सरकार चलायेंगे।
अपने देश में भी ऐसे ही उदारवादियों, बुद्धिजीवियों, कथित धर्मनिरपेक्षता के पक्षधरों के कारण ही भारत ने इजरायल से दशकों तक यानी 1948 से लेकर 2017 तक राजनयिक सम्बन्ध स्थापित नहीं किये, कहीं इससे अरब और दूसरे इस्लामिक मुल्क अपने देश के मुसलमान भारत तथा सत्तारूढ़ काँग्रेस ने नाराज न हो जाएँ। इस दौरान भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने इजरायल की यात्रा नहीं की। लेकिन 29 जनवरी,सन् 1992में प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंहराव ने पहली बार इजरायल के दूतावास की भारत में स्थापना अवश्य की थी। सन् 2017में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इजरायल की यात्रा पर गए, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा था कि हम इजरायली तो कब से मित्र देश के प्रधानमंत्री के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे, इन्तजार की घड़ियाँ अब आकर खत्म हुईं और दीर्घ सत्तर साल के बाद प्रतीक्षा की घड़ियों की सुखद समाप्ति हुई है।
मध्य-पूर्व(पश्चिमेशिया) में स्थित इजरायल तीनों तरफ से अरब देशों से घिरा हुआ है। इस देश में प्राचीन फलीस्तीन का थोड़ा-सा भाग है। 29 नवम्बर, 1947 को राष्ट्र संघ ने फलस्तीन का विभाजन करके एक भाग यहूदियों(ज्यूज) को और एक भाग एक अरबों को दे दिया। 15मई, 1948 को यहूदियों ने अपने भाग का नाम ‘इजरायल’ घोषित कर दिया।
इस तरह यहूदियों के देश के रूप में इजरायल का गठन हुआ, तब से जितने भी इस देश के प्रधानमंत्री बने हैं,उनमें बेंजामिन नेतन्याहू ही ऐसे हैं,जो यहीं जन्में हैं। बाकी प्रधानमंत्रियों का जन्म इजरायल में न होकर अन्य देशों ब्रिटेन, फ्रान्स, जर्मन, अमेरिका आदि में हुआ है, जहाँ से उनके माता-पिता इस देश यहूदी के गठन के बाद आकर बसे थे। लेकिन इनसे भिन्न नेतन्याहू का जन्म सन् 1949 में इजरायल में ही हुआ, उनके माता-पिता इजरायल की स्थापना के बाद किसी दूसरे मुल्क से आकर यहाँ बसे थे। 47वर्ष की अवस्था में इजरायल के प्रधानमंत्री बनने वाले बेंजामिन नेतन्याहू वाले सबसे कम उम्र के थे। वे चुनाव में कई बार हारे-जीते,पर उससे वे न कभी हताश-निराश हुए और न ही उन्होंने मन से पराजय ही स्वीकार की। वे सेना के सैनिक होने के कारण सन् 1967के अरब-इजरायल युद्ध में अपने शौर्य, पराक्रम, वीरता-धीरता दिखा चुके हैं। उस समय इजरायल ने बन्दूक के बल पर सीरिया, गोलान की पहाड़ियाँ, जोर्डन का पश्चिमी किनारा, गाजा पट्टी तथा पूर्वी येरूशलम पर कब्जा कर लिया। कुछ ही समय में उनकी गणना अरब के विरोधियों के प्रवक्ता के रूप में होने लगी। नरम पंथी यित्जाक राबिन की हत्या के पश्चात् 1996 में हुए चुनाव में इजरायल की जनता ने कट्टर अरब विरोधी नेतन्याहू को प्रधानमंत्री बनाया। नेतन्याहू उस ‘ओस्लो एकाॅर्ड’ के विरोधी थे, जो इजरायल और फलस्तीन के दो राज्यों को मान्यता देे रहा था। दो राज्यों को यह समाधान आतंकवाद की भेंट चढ़ गया और नेतन्याहू ने उस समझौते को तोड़ दिया। उन्होंने इजरायल द्वारा कब्जा किये गए इलाकों को खाली करने से मना कर दिया अरबों की इजरायल से निकाल कर बाहर करने की अभियान शुरू किया। उन्होंने फलस्तीनियों से समझौता के सारे रास्ते बन्द कर दिया। नेतन्याहू ने अमेरिका ने नजदीकी बढ़ाई और ईरान के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय अभियान छेड़ दिया। उन्होंने ओबामा काल में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते का विरोध किया और ईरान के विरुद्ध परमाणु शस्त्रास्त्रों के प्रयोग की धमकी भी दी।
इजरायल में 1नवम्बर को हुए आम चुनाव के लिए हुए मतदान में लोगों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया, ताकि देश में स्थिर सरकार बन सके। उसी का परिणाम है कि 3 नवम्बर को मतगणना में पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबन्धन को 3 नवम्बर को 120 सदस्यी संसद (नैसेट)में 64स्थानों पर विजय प्राप्त हुई। स्पष्ट बहुमत के साथ ही नेतन्याहू की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ हो गया है। उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री येर लैपिड ने हार स्वीकार करते हुए अपने प्रतिद्वन्द्वी नेतन्याहू को जीत के बधाई देने में देर नहीं की। इसके साथ प्रधानमंत्री येर लैपिड ने क विभिन्न सरकारी विभागों को सत्ता के सुचारू स्थानान्तरण के लिए निर्देश भी दे दिए हैं। केन्द्रीय निर्वाचन समिति के अनुसार नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 32, प्रधानमंत्री येर लैपिड की येश अतीद(एटिड) को 24, रिलीजियस जियोनिज्म को 14, नेशनल यूनिटी को 12, शास को 11 तथा युनाइटेड टोरा जुदाइम्स को 8स्थानों पर जीत प्राप्त हुई है।

वर्तमान में इजरायल के लोगों का मानना है कि भारत ही इस्लामी अरब शत्रु देशों से घिरे इस यहूदी मुल्क का सच्चा दोस्त है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मित्र नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बनने से फिर से रक्षा उपकरणों, कृषि, सिंचाई, खुफिया समेत कई क्षेत्रों में सहयोग और सहायता का दौर बढ़ेगा। भारत इजरायल मैत्री आर्थिक दृष्टिकोण से भी मजबूत होगी।अब देखना यह है कि मोदी और नेतन्याहू के रहते दोनों देशों की दोस्ती कितना परवान चढ़ती है।

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