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बैंक का लोन कब तक सुरक्षित

आमोद सोलंकी

जैसा कि हम आजकल ख़बरों में देख रहे हैं कि फलां कंपनी के शेएर के भाव गिर गए और बैंक्स का लोन के रूप में दिया हुआ धन दांव पे लग गया। अब हमारे मन में विचार आता हे जब हम कोई छोटा मोटा लोन बैंक से लेते हे तब तो बैंक्स लोन अमाउंट से ज्यादा ही सिक्योरिटी लेते हैं, फिर ये कम्पनीज के केस में क्या झोल हो जाता हैं। 
हमारे देश में बैंक्स सामान्य पब्लिक और बिजनेसमैन को अलग नज़र से देखता हैं, बैंक्स को पता हैं सामान्य व्यक्ति पूरा लोन ईमानदारी से चुकाएगा और बिजनेसमैन के केस में संदेह हैं। (बैंक्स बिजनेसमैन का नाम देखकर लोन देते हैं ऐसा अपने यहाँ लोगों का विचार हैं।)
बैंक्स का लोन तब तक तो सुरक्षित हैं जब तक व्यापार सही से चल रहा हैं। लेकिन अगर किसी कंपनी के व्यापार के  बारे में कोई बुरी खबर आती हैं तो लोग धड़ाधड़ शेएर बेचना शुरू कर देते हैं। हर व्यापार में उतर चढ़ाव आते रहते हैं। 
लेकिन बैंक्स के पार्ट में क्या खामी हैं , जिससे बैंक्स के जमाधारकों का पैसा कॉर्पोरेट लोन में फंस जाता हैं। इसे कुछ पॉइंट्स से समझते हैं :
१. पहला तो बैंक्स लकीर के फ़क़ीर हैं  50 वर्ष पुराने रूल्स एंड रेगुलेशन पे चल रहे हैं। व्यापारी इनसे जायदा स्मार्ट हैं और बाक़ी कि कसर भ्रस्टाचार पूरी कर देता हैं। हम सिक्योर्ड लोन को कैटेगरी में देखे तो पाएंगे बैंक्स के जमाधारकों का पैसा कॉर्पोरेट लोन के रूप में कितना सुरक्षित हैं। 
   फिक्स्ड एसेट्स लोन में बंधक हो तब :- बैंक्स जिन कॉर्पोरेट लोन के रूप में फिक्स्ड एसेट्स जैसे जमीन, प्लाट, पूर्णतय निर्मित बिल्डिंग को अगर सिक्योरिटी में लिया हैं उतना राशि 100 % सेफ हैं। 
 प्लांट एंड मशीन ; अगर बैंक्स ने प्लांड और मशीन बंधक लिए हैं तो इनकी वैल्यू समय के साथ कम ही होती है। 
  current एसेट्स :- अगर बैंक्स ने कॉर्पोरेट लोन के एवज में current एसेट्स जैसे : स्टॉक, बुक डेब्ट्स को बंधक किया हैं तो यह कैटेगरी के एसेट्स को बेचकर कभी भी पूरा रुपया वसूल नहीं किया जा सकता। कह सकते हैं इस कैटेगरी से बैंक्स बस २०-३० % ही वसूल कर सकते हैं। 
  other एसेट्स:- इस कैटेगरी में बैंक्स जो कुछ सिक्योरिटी के रूप में ले रहे हैं ये बस कागजी कार्यवाही के लिए कर रहे हैं। मान लीजिये बैंक्स किसी कंपनी के सॉफ्टवेयर, ट्रेड मार्क्स, कंपनी के स्टॉक्स इत्यादि। जब बैंक्स इस कैटेगरी से वसूली या नीलामी के लिए जाते हैं तब मुश्किल से वैल्यूड अमाउंट का १० % ही मिल पता हैं। 
 तो फिर सवाल हैं बैंक्स फिक्स्ड एसेट्स के अलावा दूसरी कैटेगरी के एसेट्स में जुआ क्यों खेलते हैं। पहले तो बैंक्स को अपना धंधा चलना हैं हाउस लोन , कार लोन सुरक्षित हैं पर बैंक्स को इनसे थोड़ा ही रेवेन्यू आता हैं।  बैंक्स ज्यादा कमाई के लालच में कॉर्पोरेट को मंहगा लोन के देते हैं। ट्रेडमार्क्स, सॉफ्टवेयर, स्टॉक, कंपनी के शेएर का बैंक्स वैल्यूएशन कराते हैं पर इन रिपोर्ट्स को हमेशा कॉर्पोरेट के फेवर हाई वैल्यू पे बनाया जाता हैं। चूँकि ये बैंक्स के रूल्स में हैं तो असेप्ट भी होता हैं। सारा रिस्क बैंक्स को इन्ही कैटेगरी में रहता हैं , सॉफ्टवेयर हो या स्टॉक या ट्रेडमार्क कोई दूसरा नीलामी के इन्हे खरीदकर इनका खास उपयोग नहीं कर सकता। सॉफ्टवेयर हर हर कंपनी अपने बिज़नेस के हिसाब से डेवेलोप कराते हैं या रेडी मेड ले लेते हैं , मार्किट के दूसरे सॉफ्टवेयर समय के साथ काम प्राइस पे उपलब्ध हैं। और अगर बैंक्स ने गलती से कंपनी के स्टॉक गिरवी किये तो (shares are subject to  market risk ) ये नियम हर समय लागु रहता हैं। लोन डिफाल्ट के केस में बैंक्स इन गिरवी शेएर से कुछ भी रिकवर नहीं कर सकते हैं।

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