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यात्रा संस्मरण (कैलाश कुंड)

पं रामजस त्रिपाठी नारायण

मेरे पूर्ववर्ती धर्मगुरु वाजपेई जी के मुखारविंद से सुनकर लालसा जग गई थी कि यदि नारायण की कृपा रही तो इरादे फतेह परिवार भद्रवाह में रहते हुए कैलाश कुंड की यात्रा जरूर करूंगा। जो वर्ष  में मात्र (जून से अक्टूबर तक) ही होती है खासतौर पर सावन मास में यह अधिक फलदाई होती है। उस स्थान की महत्ता अपने दिमाग में तब और घर कर गई जब अक्टूबर २०२२ में वहां की  ड्यूटी से लौटे हुए मां भारती के सपूतों को शाबाशियां दी जा रही थी। तब समझ में आया कि निश्चित ही वह स्थान बहुत ही दुर्गम है। सैनिकों से बात करने पर ज्ञात हुआ कि वहाँ की सबसे बड़ी लड़ाई पानी और ईंधन की है मौसम की मार से अपने आप को बचाना है और उन दुर्गम पहाड़ियों के दर्रे से होने वाले घुसपैठ को रोकना है।
वैसे यह कैलाश पर्वत श्रृंखला इतनी ऊंची है कि वह हमारे मुख्यालय से भी दिखाई देती है,  जैसे सूर्य को देखकर पृथ्वी उससे ऊर्जा प्राप्त करती रहती है उसी तरह नित्य सायं कालीन वॉकिंग के दौरान अपने हेलीपैड ग्राउंड से मैं भी उस बर्फ से ढके पर्वत श्रृंखला को देखा करता था और मन में लालसा जागृत होती थी कि एक दिन वहां पहुंचना है।
अतः इस वर्ष  मई में जब बर्फ पिघलना प्रारंभ हुआ  था तभी से मैं संकल्प ले लिया था कि मुझे इस वर्ष यात्रा करनी है। मेरे उम्र को देखते हुए अपने-अपने अनुभव से मेरे वरिष्ठों ने कहा कि वह स्थान बहुत हीं ऊंचा है  आक्सीजन कम है, कुछ प्रॉब्लम आ सकती है परंतु जहां चाह वहां राह  यदि मन में उत्साह है तो शरीर भी उसी प्रकार का रिस्पांस देता है। बीपी और पल्स चेक के दौरान सामान्य पाया गया। अंततः अगस्त आते-आते मुझे संस्तुति मिल गई और मैं 21 अगस्त 2023 को अपने हेडक्वार्टर भद्रवाह बटालियन से उस स्थान की ओर चल पड़ा , हमारी गाड़ियां हमें उस स्थान तक छोड़ीं जिसका नाम किला मोहल्ला है, जो कभी स्वतंत्रता के पूर्व हिमाचल राज का हिस्सा हुआ करता था। स्वतंत्रता के बाद जे&के गवर्नमेंट ने उस कीले को जेल के रूप में परिवर्तित किया तत्पश्चात समय के साथ अब वह विजिटिंग प्लेस के रूप में विकसित किया जा रहा है। वास्तव में इस स्थान को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि निश्चित ही यहां पर स्वतंत्रता पूर्व हिमाचल के हिंदू राजाओं का राज रहा होगा। इसके चार कोनों पर चार विशाल बूर्ज और बीच में तालाब तथा किले के बीच में काली मां का मंदिर अपने आप में मनोरम है।यह इतनी ऊंचाई पर है कि यहां से भद्रवाह वैली बहुत ही स्पष्ट और बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। 
यहां तक छोड़ने के बाद यहां से हेड क्वार्टर की गाड़ियां पीछे की ओर लौट गई और हम पगडंडियों के माध्यम से पैदल यात्रा करते हुए आगे की ओर चल दिए। जहां हमें आज शाम को पहुंचना था उस स्थान का नाम है धर्मकोट। जो अपने आप में एक अच्छी ऊंचाई रखता है, जहां पर दो दिन का क्लाइमिटेशन किया जाता हैं। वहां पहुंचते पहुंचते हमारी धमनियां फुल फेज में कार्य करने लगी थीं, मुंह से सांस लेने पर भी पेट में पूरी सांस समा नहीं रही थी।पहुंचते हीं वहां पर तैनात सैनिकों से मिला, मिलकर खुशी हुई। अगले दिन मंगलवार था कार्यक्रम सूची के अनुसार प्रातः काल धर्मस्थल में भजन करते हुए सभी सैनिकों और ओहदेदारों से मिला उनकी पहचान कराते हुए पांच उंगलियों की सहायता से शरीर कर्मेंद्रिय, ज्ञानेद्रिय मन, बुद्धि, विवेक और आत्मा के रूप में पहचान कराया और अंत में यह बतलाया कि शरीर इंद्रियां मन और स्थूल बुद्धि लगभग सभी जीव में होती है पर जिसके अंदर मेधा जागृत हो जाए विवेक  जागृत हो जाए और आत्मा की पहचान हो जाए , वही वास्तव में ईश्वर की संतान है वही महान है। तत्पश्चात ब्रेकफास्ट ब्रेकफास्ट के बाद अनौपचारिक तौर पर सैनिकों का एक मोटिवेशन क्लास लिया।
कहते चलूं कि यात्रा के प्रारंभ से हीं थोड़ी हाजमे की शिकायत थी, गैस की समस्या थी  और धर्मकोट पहुंचने पर भी वह समस्या बनी रही थी, तो हमारे  शुभचिंतकों ने कहां की आप ऊपर मत जाइए आप नीचे लौट जाइए पर  मैं सोचा की ऊपर चढ़ने का मौका कभी-कभी ही मिलता है नीचे तो लौट जाना ही है क्योंकि पानी को भी छोड़ दिया जाय तो नीचे ही बहता है, पर ऊपर उठने के लिए उसको उपक्रम लगाना पड़ता है । इस साल यह मौका मिला है, पता नहीं अगले साल क्या हो अतः इस प्रकार की मनोकामना करते हुए मैं सब की सुनता रहा और अपने आप को ठीक करने के लिए मन: संकल्प करता रहा अंततः अपने डॉक्टर साहब के सुझावानुसार सादा भोजन ओराएस घोल और पुदीन पत्ते की लाल चाय तथा शरबत ने धीरे-धीरे पेट को ठीक किया। एक बात और कहते चलूं कि, जीवन की प्रत्येक परिस्थितियां कुछ ना कुछ हमें सिखाती है हमें खबर नहीं होती है की किस समय का कौन -सा अनुभव हमारे जीवन के किस समय के विचारों में निर्णय के रूप में परिवर्तित हो जाए , हम सही निर्णय लेने के लिए जाने-जाने लगें अतः जितना हो सकता है उतना अधिक भ्रमण और रचनात्मक कर्म करने का प्रयास करना चाहिए, याद रहे हमारी गलतियां हीं हमें सिखाती हैं, जीवन में गलती वही नहीं करता जो कभी सही करने की चेष्टा नहीं करता। मैं यह इतने विश्वास साथ इसलिए कह सकता हूं कि 2007 में  मेरे एक अद्वितीया अधिकारी मेजर बरसेन साब ने  चर्चा के दौरान कहा था कि ज्ञान प्राप्त करना है और सही जानकारी प्राप्त करनी है तो  काम करने से मत डरो। हमें अधिक से अधिक भ्रमण करना चाहिए चीजों को अपनी आंखों से देखना चाहिए और सदैव  तटस्थ रहकर समस्याओं को समझना चाहिए तभी वास्तविक समझ प्राप्त होगी। तभी से लगभग प्रयास  रहता है कि मैं यथा संभव तटस्थ रहते हुए अपना कर्म और धर्म को निभाऊं ।
 अरे! धत् तेरी कि चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
चलिए फिर से हम अपनी यात्रा की ओर चलें ।
धर्मकोट में अगले दिन २३ अगस्त की प्रात: काल में जबरदस्त एक्सरसाइज किया शरीर को अच्छा लगा विश्वास हो गया कि अब मैं लगभग ठीक हूं और सायंकाल एक तरफ हमारा चंद्रयान-3 भारत का तिरंगा चंद्रमा पर लहरा रहा था और मैं सैनिकों के साथ वॉलीबॉल मैच जीत कर साबित कर रहा था कि अब मैं अपनी यात्रा करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार हूं अगले दिन यानि २४अगस्त के प्रातःकाल 5:00 बजे कैलाशपति भगवान शंकर की जय , बजरंग बली की जय बोलकर और नारायण की ध्वनि के साथ यात्रा प्रारंभ हुई।
कुछ दूर चलने के बाद कम से कम २१ फिट ऊंचा भगवान शंकर का एक त्रिशूल दिखा जो एक बहुत ही ऊंचे चबूतरे पर जमाया गया था , सुरक्षा के लिहाज से साथ चल रहे साथी सैनिकों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि मान्यता के अनुसार यहां से कैलाश कुंड की यात्रा प्रारंभ मानी जाती है। वहां पर प्रणाम करके आगे की ओर चल दिया धीरे-धीरे चढ़ाईयां ऊंची होती गई परंतु रात भर के आराम से संचित ऊर्जा के कारण पूरे उत्साह के साथ चलता रहा यह वैसे ही था कि जब अपने पास धन हो और सामने कोई एकाएक खर्चा आ जाए तो चिंता नहीं होती वह धन हमारा सहारा बन जाता है। 
आते आते आगे चंद्र देव की ग्वारी आई पूछने पर ज्ञात हुआ कि यहां पर एक चंद्र देव नामक ग्वाला रहता था जो अपने माल मवेशियों के साथ गर्मी के चार-पांच महीनों में जीवन यापन करता था उसी के नाम से उस स्थान का नाम चंद्रदेव की ग्वारी पड़ गया।
कटी फटी पगडंडियों से चलते हुए आगे बढ़ता गया एक पहाड़ी से ऊपर दूसरी पहाड़ी दूसरी पहाड़ी से ऊपर तिसरी पहाड़ी चढ़ते  हुए तलाई वन पर पहुंचा, वहां एक और ग्वारी का दर्शन हुआ गले में कांटेदार पट्टे बांधे हुए उनके कुत्ते भौ भौं भौं करने लगे, अपने साथी सैनिकों ने उनका आधार कार्ड देखा और उनका गांव पूछा और मैं उनके कुशल क्षेम पूछते हुए यह जानना चाहा कि उनके गले में यह कांटेदार पट्टा क्यों तो उन्होंने कहा कि जंगल में भालू और तेंदुआ बहुत हैं वे आते हैं और मवेशियों को भेड़ बकरियों को और इन कुत्तों को भी झपटकर ले जाते हैं इसलिए उनके गले पर कांटेदार पट्टा बांधा गया है कि वह उनके गले पर सीधे प्रहार न कर सकें। हम लोग ऐसी बात ही कर रहे थे कि हमारे साथ चल रहे तीन कुत्तों की टोली में से एक कमजोर कुत्ते पर उस ग्वाले का कुत्ता झपट पड़ा , हमारे उस कुत्ते को अपनी जान बचानी मुश्किल होने लगी हम लोग आवाज कर रहे हैं परंतु कोई असर नहीं हमको लीड करता हुआ जो भोपाल नमक हमारा तगड़ा वाला कुत्ता था  वह अपनी जिम्मेदारी के तहत वहां से दौड़ता हुआ आया और उस ग्वाले के कुत्ते पर झपट पड़ा इस प्रकार से हमारे उस कुत्ते की जान बची वहां पर मैं देखा और समझा कि यदि हम अपने आप को श्रेष्ठ समझते हैं तो हमें अपने पूरे टीम की समुचित जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। इसी के साथ हमारे साथी सैनिकों ने उस भोपाल नामक समझदार कुत्ते की वफादारी और साहस की बहुत प्रशंसा की। देखने की बात है कि वह जीव कुत्ता योनि में होते हुए भी अपने गुणों के कारण हम मनुष्यों द्वारा श्रेष्ठ माना जा रहा था।
वहां से आगे बढ़ते हुए तलाई २ तलाई ३ की खड़ी चढ़ाई की यात्रा पुरी करते -करते मोबाइल में  समय देखा तो 7:57 हो रहा था, अब तक शरीर की पूरी ऊर्जा खर्च हो चुकी थी, सर्द हवाओं एवं ठंडी के बावजूद हमारे अंदर के कपड़े पसीने से भीग चुके थे,  साथ में लाया हुआ  ओ आर एस का घोल भी खत्म हो चुका था और ऊपर से लिंक के रूप में आने वाली पार्टी  भी आ चुकी थी, बस बचा था तो वह जज्बात वह ललक कि हमें अभी और यहां से 3 घंटे की यात्रा पूरी करनी है।
थोड़ी देर विश्राम करने के बाद नीचे से लेकर आई हुई पार्टी अभिवादन देकर नीचे की ओर लौटी और हम ऊपर की पार्टी के साथ ऊपर की ओर चल पड़े।
अब हमारी गति में धीमापन आ चुका था जांघ भर गई थी ऊपर उठाया नहीं जा रहा था परंतु धीरे-धीरे धीरे-धीरे डंडे के सहारे चलता रहा बैठता रहा पानी पीता रहा, मेरी गलती हुई हालत को देखते हुए एक जवान ने अपने पॉकेट से निकलकर नमकीन का एक पैकेट दिखाया बोला क्या आप कहेंगे मैं तुरंत कहां हूं क्योंकि उसमें मेरी बीपी लो हो रही थी।
उस नमकीन में से थोड़ा नमकीन खाकर पानी पिया थोड़ा रेस्ट किया फिर चल दिया। मैं भूला नहीं चाहूंगा कि हमारे साथ वाले साथी इतने प्रेरक थे कि उन्होंने मुझे दूरी का अंदाजा लगने ही नहीं दिया हर एक ऊंची पहाड़ी जब दिखती थी तो बस यही कहते थे कि बस इसके बाद आ ही गया बस प्लेन रास्ता है और शायद इसीलिए मैं धीरे-धीरे धीरे-धीरे देव दारू और चीड़ के पेड़ों की छाया और उनके फूलों तथा जंगली वनस्पतियों के फूलों को निहारते हुए बीच-बीच में अपना फोटो खिंचवाते हुए लगभग 10: 15 बजे मैं उस पर्वत शृंखला पर पहुंचा जिस पर किसी पेड़ का नामोनिशान नहीं था। हां बर्फ गलने के बाद नमी होने के कारण उन पर घासें उग आईं थी। वहां से हमारे सैनिकों का पोस्ट दिखाई दे रहा था और हमारे सैनिक आते-जाते गुर्जर बकरा वालों का आई कार्ड चेक कर रहे थे, पूरा नज़ारा ऐसा ही मालूम पड़ रहा था जैसे 23 तारीख की शाम को चंद्रयान ने हकीकत में चंद्रमा को देखा हो।
चंद्रयान ३ की तरह  समुद्र की सतह से काफी उपर पेड़ पौधों से विहीन सियोज नामक  उतुंग शिखर पर जैसे ही पहुंचा अत्यधिक टेंपरेचर की गिरावट और सरसराहट भरी हवाओ ने हमारा स्वागत किया , रास्ते में पसीने के कारण चेहरे पर जो नमक नमक हो गया था। वह सब सुख गई और तुरंत ऐसा महसूस हुआ कि कोट डालो नहीं तो ठंडी लग जाएगी क्योंकि हमारे सारे कपड़े भीग चुके थे। जवानों ने नारायण नारायण नारायण कह कर अभिवादन दिया मैं भी नारायण नाम का उच्च घोष कर सभी सैनिकों को एक साथ अभिवादन दिया और गर्म पानी लाल चाय बिस्कुट और गरमा गरम मैगी को खाकर अपने हीन हो रहे शक्ति को फिर से संचित किया।
यहां के क्लाइमेट से परिचित होते हुए आज सैनिकों से मिला हूं, सबका कुशल क्षेम जाना हूं रक्षा सूत्र बांधा हूं और संभवत आशा है कि कल महादेव के स्थल कैलाश कुंड की यात्रा होगी जिसका वृतांत कभी और लिखूंगा

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