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हिमाचल में कांग्रेस बिखरने को बेताब थी, कमी पूरी कर दी अभिषेक मनु सिंघवी की उम्मीदवारी ने

हिमाचल प्रदेश में मुख्‍यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्‍खू राज्‍यसभा के उम्‍मीदवार के रूप में सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी की आस लगाए बैठे थे. हाईकमान ने अभिषेक मनु सिंघवी को उतार दिया. मौका मिलते ही सुक्‍खू के विरोधी धड़े ने क्रॉस वोटिंग करके अपनी ताकत दिखा दी - और बात अब सुक्‍खू सरकार के अस्तित्‍व संकट पर आ गई है.

राज्य सभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग तो ऐसे हुई है जैसे कुंभ में डुबकी लगाने की होड़ मची हो. उत्तर प्रदेश में तो ऐसी हलचल मची है जिसका असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ने जा रहा है. कर्नाटक से भी ऐसी खबर है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में जो हुआ है, ऐसा लग रहा है कि जिसमें 'ऑपरेशन लोटस' से कहीं ज्यादा किसी ऑटो-इम्यून डिजीज जैसे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं - हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की तो ये सोच कर ही बेचैनी बढ़ गई होगी. 

मुख्‍यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्‍खू को पूरी उम्मीद थी कि अगर सोनिया गांधी नहीं, तो प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस नेतृत्व राज्य सभा चुनाव में उम्मीदवार जरूर बनाएगा. सुक्खू के ऐसा सोचने के पीछे हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी की शुरू से आखिर तक भागीदारी तो रही ही, उनके वहां घर बनवाने की वजह से तो संभावना और भी बढ़ जा रही थी. 

वैसे तो दिल्ली से किसी को भी भेज दिया जाता तो सुक्खू और उनके साथी सिर-आंखों पर ही बिठा कर रखते, लेकिन गांधी परिवार का प्रभाव तो अलग ही होता. अपनी तरफ से सुक्खू और उनके साथियों ने अभिषेक मनु सिंघवी के उम्मीदवार बनने पर तैयारियों में कोई कमी नहीं की थी, लेकिन गुटबाजी पर काबू नहीं रख सके और खेल हो गया.  

खबर तो यही आ रही है कि हिमाचल प्रदेश की एकमात्र राज्यसभा सीट के चुनाव में कांग्रेस के कम से कम नौ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है - जिसका फायदा बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन को मिल सकता है.

राज्य सभा का चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के 35 वोट चाहिये. अगर नौ विधायकों ने कांग्रेस की जगह बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है, जैसा कि बताया जा रहा है, तो ऐसी स्थिति में बीजेपी का वोट 34 तक पहुंच जाएगा, और कांग्रेस के नंबर 43 से घटकर प्रथम वरीयता के 34 वोटों पर आ जाएंगे. 

68 सदस्यों वाली हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी नंबर 35 है - और कांग्रेस का नंबर अगर 43 से 34 पहुंच चुका है तो सुक्खू सरकार डेंजर जोन में पहुंच चुकी है, ऐसा मान कर चलना चाहिये.

मुश्किल ये है कि बात सिर्फ राज्य सभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहने वाली है, क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक अब तो कांग्रेस में रहने से रहे. वैसे कांग्रेस भी नहीं चाहेगी कि धोखा देने के बाद भी ऐसे विधायक बने रहें, जब तक पार्टी को लगता है कि सरकार बचाने के विकल्प बचे हुए हैं - लेकिन जो स्थिति बताई जा रही है, उसमें सुक्खू सरकार ज्यादा से ज्यादा लोक सभा चुनाव 2024 के नतीजे आने तक खैर मना सकती है.

सवाल ये उठता है कि क्या सोनिया गांधी अगर हिमाचल प्रदेश से चुनाव लड़ी होतीं तो क्या मामला अलग हो सकता था?

राज्‍य सभा चुनाव की उम्‍मीदवारी से शुरू हुई कलह

जब तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की तरफ से सोनिया गांधी को राज्य की कुछ लोक सभा सीटों में से किसी पर चुनाव लड़ने की पेशकश की गई. तेलंगाना में कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की समिति ने एक प्रस्ताव भी पास किया था, और सोनिया गांधी से प्रस्ताव पर विचार करने की गुजारिश की गई थी. 

लेकिन जब सोनिया गांधी के लोक सभा चुनाव न लड़ने की चर्चा चली तो हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की तरफ से ऐसी इच्छा जाहिर की गई कि वो राज्य सभा जाने के लिए हिमाचल प्रदेश का रुख करें. और अगर सोनिया गांधी का कोई और प्लान हो तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए भी बिलकुल वही ऑफर था.

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ साथ हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने अपनी तरफ से सोनिया गांधी को राज्य से राज्य सभा का उम्मीदवार बनाये जाने की गंभीर कोशिशें भी की थी. 

प्रियंका गांधी के भविष्य का प्लान तो अभी सामने नहीं आया है, लेकिन सोनिया गांधी ने हिमाचल प्रदेश की जगह राजस्थान का रुख कर लिया. और ये भी देखिये कि वो पहले ही निर्विरोध राज्य सभा के लिए चुनी जा चुकी हैं. 

हिमाचल प्रदेश से राज्य सभा के लिए दिल्ली से सुप्रीम कोर्ट के वकील और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी को उम्मीदवार बना कर भेज दिया गया, लेकिन ये बाद राज्य के नेताओं को हजम नहीं हुई. 

अभिषेक मनु सिंघवी को वहां के नेता बाहरी के तौर पर ट्रीट करने लगे. और धीरे धीरे कलह बढ़ती चली गई. ऐसी स्थिति से बचने का रास्ता भी था कांग्रेस नेतृत्व के पास, लेकिन आनंद शर्मा के नाम से परहेज भी था - क्योंकि वो कांग्रेस की चर्चित G-23 गुट के नेताओं में शुमार थे. अब तो उस गुट का अस्तित्व भी खत्म हो चुका है, लेकिन बचे हुए नेताओं को किसी न किसी रूप में कीमत चुकानी ही पड़ती है. गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल जैसे नेता भले ही कांग्रेस छोड़ चुके हों, लेकिन मनीष तिवारी जैसे नेता अब तो बस जैसे तैसे टाइमपास कर रहे हैं. हाल ही में जब कमलनाथ के बीजेपी में जाने की जोरदार चर्चा छिड़ी थी, मनीष तिवारी के भी बीजेपी के संपर्क में होने की बात कही जा रही थी. 

शिमला से आने वाले आनंद शर्मा कांग्रेस के बचाव में आगे बढ़ कर मोर्चा संभालने वाले नेताओं में शुमार रहे हैं, और वो राज्य सभा जाने के लिए प्रयासरत भी थे. दिल्ली में डेरा डाल कर वो चीजों को अपने पक्ष में करने की पूरी ताकत से कोशिश भी कर रहे थे, लेकिन दिल्ली के राजनीतिक सर्किल में 'संकटमोचन' कहे जा रहे अभिषेक मनु सिंघवी भारी पड़े.

अभिषेक मनु सिंघवी का मुद्दा इतना गंभीर तो नहीं था, लेकिन जिन हालात में कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के परिवार को दरकिनार कर सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी, चिंगारी तो तभी से उठ चुकी थी - बस, एक मौके की तलाश थी, और सुक्खू के विरोधी गुट ने अपना रंग और दम दोनों दिखा दिया. 

साफ दिखाई पड़ते रहे हैं कांग्रेस के धड़े

हिमाचल प्रदेश में क्रॉस वोटिंग के पीछे कांग्रेस की गुटबाजी ही असली वजह बताई जा रही है. हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के मुख्य तौर पर दो धड़े हैं - एक धड़ा, वीरभद्र सिंह समर्थकों का है जिसका नेतृत्व प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह करते हैं, और दूसरा धड़ा ऐसे विधायकों और नेताओं का है जो मौजूदा पावर सेंटर की अहमियत समझते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ हैं.

ये तो हिमाचल में कांग्रेस के सत्ता में आने के वक्त ही तय हो गया था कि सुक्खू सरकार की नींव इतनी मजबूत नहीं है जो ऑपरेशन लोटस जैसे भूकंप को झेल सके. 2022 के विधानसभा चुनाव हिमाचल प्रदेश की हार बीजेपी के लिए बहुत बड़ा झटका था, लेकिन बाद के चुनावों को देखते हुए पार्टी ने गुजराज की रिकॉर्ड जीत के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया, और उसी पर फोकस रहने का भी निर्णय लिया ताकि पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कोई असर न पड़े. 

और विधानसभा चुनाव के बाद अब लोकसभा चुनाव का टाइम आ गया है. राज्यसभा चुनाव के बहाने मौका देख कर बीजेपी ने अपने तरीके से फीडबैक भी ले लिया है, और मनमाफिक फीडबैक उसे मिल भी गया है. 

रही कसर बीजेपी ने हर्ष महाजन को उतारकर पूरी कर दी

हिमाचल प्रदेश से राज्य सभा के लिए हर्ष महाजन को उम्मीदवार बनाने का फैसला भी बीजेपी के लिए बेहद कारगर साबित हुआ है. हर्ष महाजन कभी कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते थे, लेकिन ये तब की बात है जब सूबे की राजनीति में वीरभद्र सिंह का दबदबा हुआ करता था. हर्ष महाजन तीन बार चंबा में विधायक और वीरभद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. वो राज्य कोऑपररेटिव बैंक के चेयरमैन भी रह चुके हैं. 

हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके हर्ष महाजन ने सितंबर, 2022 में बीजेपी का दामन थाम लिया था. और चुनाव से पहले से ही कह रहे थे, सुक्खू सरकार में सभी पीड़ित हैं... वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करेंगे.

बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन का कहना था, मैं सबको जानता हूं... मैंने सबसे वोट मांगा है.

क्रॉस वोटिंग के सवाल पर हर्ष मंदर का जवाब था, अगर ऐसा हुआ है तो हमारी गलती थोड़े ही है... कांग्रेस के विधायक मुख्यमंत्री की कार्यशैली से नाराज हैं. 

और अब तो जैसे हिमाचल प्रदेश में बवाल ही मच गया है. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू तो बीजेपी पर कांग्रेस विधायकों को अगवा कर लेने तक का गंभीर आरोप लगा डाला है - कुल मिलाकर संकेत तो अच्छे नहीं ही कहे जा सकते. 

बड़ा सवाल ये है कि क्या सोनिया गांधी को हिमाचल प्रदेश से राज्य सभा उम्मीदवार बना कर कांग्रेस सुक्खू सरकार पर मंडरा रहा खतरा टाल सकती थी? या सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने की सूरत में भी आलाकमान को हिमाचल प्रदेश के कांग्रेस विधायकों पर भरोसा कम ही था

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