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महा विनाश की ओर अग्रसर विश्व में बुद्ध के अहिंसा परक शांति संदेश की सार्थकता

युद्ध मानव मन के विकार का परिणाम होता है। मस्तिष्क में जब दूषित विचार प्रभावी हो जाते हैं, तब शुभ- अशुभ का ज्ञान धीरे-धीरे क्षीण हो कर उसे कुमार्ग पर अग्रसर कर देता है। मन में विद्यमान कुप्रवृत्तियां, प्रभावशाली होकर उसे निंदित कार्यों में नियोजित करने लगती हैं। और वर्चस्व स्थापना की चाहत में शक्ति परीक्षण का संघर्ष आरंभ हो जाता है।

    डॉ कामिनी वर्मा
 एसोसिएट प्रोफेसर, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय 

       -------ज्ञानपुर, भदोही ,उत्तर प्रदेश

       युद्ध मानव मन के विकार का परिणाम होता है। मस्तिष्क में जब दूषित विचार प्रभावी हो जाते हैं, तब शुभ- अशुभ का ज्ञान धीरे-धीरे क्षीण हो कर उसे कुमार्ग पर अग्रसर कर देता है। मन में विद्यमान कुप्रवृत्तियां, प्रभावशाली होकर उसे  निंदित कार्यों में नियोजित करने लगती हैं। और वर्चस्व स्थापना की चाहत में शक्ति परीक्षण का संघर्ष आरंभ हो जाता है। यह संघर्ष व्यक्ति- व्यक्ति के बीच समुदाय -समुदाय के बीच तथा राष्ट्र- और राष्ट्र के बीच चलने लगता है तब दोनों पक्षों की ओर से सहयोगी व्यक्ति, समुदाय और राष्ट्र शामिल होने लगते हैं। यह संघर्ष व्यक्तिगत न रहकर सार्वजनिक और वैश्विक स्तर का रूप ले लेता है। 
    वर्तमान में रूस और यूक्रेन के मध्य चल रहा संघर्ष, वैश्विक स्वरूप धारण करता दिख रहा है। ऐतिहासिक अवलोकन करने पर ज्ञान होता है, सो वियत संघ, जिसका औपचारिक नाम सोवियत समाजवादी गणतंत्रोंका संघ था। उसका यूरेशिया यूरोप  के बड़े भूभाग पर विस्तार था। 15 स्वयं शासित गणतंत्रों का यह संघ 1922 से 1991 तक अस्तित्व में रहा। तथा 1922 से 1990 तक साम्यवादी दल के नियंत्रण में रहा। रूसी सोवियत संघीय समाजवादी गणतंत्र इस संघ का सबसे बड़ा गणतंत्र और राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधियों का केंद्र था। इस गणतंत्र को रूस के नाम से भी संबोधित किया जाता था।
        1970 में हुई बोलशेविक क्रांति की सफलता के प्रभाव स्वरूप उसमें पूंजीवाद को समाप्त कर सर्वहारा वर्ग को महत्व प्रदान करते हुए साम्यवादी  शासन की स्थापना हुई थी। अतः पूंजीवादी राष्ट्र आरम्भ से ही इसके साथ शत्रुता का भाव रखने लगे थे।  स्टालिन के शासनकाल में साम्य वादियों की कठोर एवं उग्र तानाशाही तथा शीत युद्ध में शक्ति प्रदर्शन में हुए अत्यधिक व्यय के कारण सोवियत संघ की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई। 1980 तक आते-आते आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय हो गई। अंतिम सोवियत नेता मिखाईल गोर्बाचोव द्वारा ग्लास्नोस्त नामक राजनैतिक उन्मुक्त ता की नीति और पेरेस्ट्रोइका नामक आर्थिक ढांचे को सुधारने का प्रयास किया गया। परंतु इस कार्य में असफल रहे। दिसंबर 1991 में उनकी विचारधारा के विरोध में राज्य क्रांति करने का प्रयास हुआ। लेकिन उसे कुचल दिया गया। और इस घटना  के परिणाम स्वरूप सोवियत संघ बिखर गया। और 15 गणतंत्र स्वतंत्र प्रभुता संपन्न राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आए। और अपनी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं  राजनीतिक नीति के साथ आगे बढ़ते रहे। 
      यूक्रेन खनिज संपदा  विशेष रूप से तेल उत्पादन की दृष्टि से समृद्ध राष्ट्र है। साथ ही विधर्मी राष्ट्र भी। भौतिक संपदा से संपन्न यूक्रेन के प्रति रूस के  राष्ट्रवादी स्वरूप में विकार उत्पन्न हुआ। और उसे प्राप्त करने की चाहत एवं संपूर्ण क्षेत्र में अपनी निर्विवाद बादशाहत कायम करने की इच्छा से जद्दोजहद में लग गया।  यूरोप का सुरक्षा ढांचा (सिक्योरिटी आर्किटेक्चर)  नाटो पर निर्भर करता है।  युक्रेन ने अपनी स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न नीति अक्षुण्ण  रखने के लिए नाटो से हथियार व सैन्य सहायता प्राप्त कर रहा है । साथ ही विधर्मी राष्ट्र होने के कारण धार्मिक भावना से भी उत्प्रेरित होकर कार्यवाही में संलग्न है। रूस भी अपनी सुरक्षा और सीमा को लेकर चिंतित है। वह नाटो का पूर्व में विस्तार करना अपने हितों के विरुद्ध मानता है। शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस और पश्चिमी देशों में तनाव की स्थिति रही है। रूस के बाद यूक्रेन ही सबसे बड़ा यूरोपीय देश है। सोवियत संघ के विघटन ने अमेरिका को एकमात्र वैश्विक शक्ति बना दिया। अमेरिका ने सोवियत संघ से निकले देशों में पश्चिमी शासन पद्धति और यूरोपीय सुरक्षा संगठन नाटो की शक्ति में विस्तार करने लगा। नाटो का उद्देश्य ही साम्यवादी व्यवस्था को सीमित करना था। 2004 में रूस की पश्चिमोत्तर सीमा से लगे तीन नए बाल्टिक देशों और बुलगा रिया को नाटो में शामिल करना तथा 2008 में हुए बुखारेस्ट सम्मेलन में यूक्रेन और जार्जिया को भी नाटो में शामिल करके एक प्रकार से अमेरिका ने रूस की घेराबंदी कर दी। अब रूस से अमेरिका सहित किसी भी यूरोपीय देश को खतरा नहीं रह गया। जबकि रूस ने इस कार्यवाही को अपनी सुरक्षा के खतरे के रूप में लिया। और इस व्यवस्था में बदलाव के लिए कहता रहा। उसने नोटों से भी यूक्रेन को विस्तार न देने का आग्रह किया। परंतु नाटो के माध्यम से यूक्रेन शक्तिशाली होने लगा। रूस नहीं चाहता यूक्रेन किसी भी तरह से अमेरिका के इशारों पर चले और रूस के लिए घातक बने।  नाटो से हथियार व सैन्य शक्ति पाकर तथा धार्मिक भावना से प्रेरित होकर रूस यूक्रेन के साथ युद्ध रत है। जिसमें दोनों राष्ट्रों में अपार सम्पति व जन धन  हानि हो रही है। जिसमें अपना अपना राजनैतिक व आर्थिक स्वार्थ भुनाने की के लिए लोलुप अन्य देश उसे हवा दे रहे हैं । इसमें संदेह नहीं यदि यह अधिक समय तक जारी रहा तो विश्वव्यापी स्वरूप धारण कर सकता है। जिससे संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था गहराई से प्रभावित होगी। शक्ति के दुरुपयोग से प्रकृतिगत व्यवस्था असंतुलित होती है। जिससे अनेक प्रकार की समस्याएं होती उत्पन्न होती हैं। आज रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से संपूर्ण विश्व सशंकित है। युद्ध कभी भी किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। इससे हमेशा मानवता का ही अहित होता है। यह विजित और पराजित दोनों को हर प्रकार से क्षतिग्रस्त करता है। राष्ट्र का विकास बाधित होकर कई वर्ष पीछे चला जाता है। और शांति का वातावरण राष्ट्र को समृद्धि के पथ पर अग्रसर करता है। आपसी समस्या और विवाद का समाधान संवाद से खोजा जा सकता है। रूस और यूक्रेन युद्ध का प्रभाव भारत पर भी पड़ेगा। भारत के संबंध रूस तथा अमेरिका दोनों के साथ मधुर हैं। ऐसी स्थिति में भारत किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं कर सकता । इसलिए दोनों पक्षों के जायज हितों को ध्यान में रखते हुए, शांतिपूर्ण ढंग से वार्ता करके, समस्या को सुलझाने का प्रयास करने में भारत महती भूमिका का निर्वहन कर सकता है। 
     अति भौतिक समृद्धि किसी भी राष्ट्र को शांति नहीं प्रदान करती।आज जब समस्त संसार किसी भी अनहोनी की शंका से आशंकित है, ऐसे में सभी की दृष्टि भारतीय ऋषियों, मनस्वियों  की ओर उठ रही है। जिसने सदियों से संपूर्ण बसुधा को अपना कुटुंब मानकर विश्व बंधुत्व का शांति संदेश देता आ रहा है । विश्व शांति के पथ प्रदर्शक महात्मा बुद्ध के अहिंसापरक, मानवतावादी विचारों की वर्तमान में नितांत उपयोगिता है। 
      पिता शुद्धोधन और माता महामाया के यशस्वी पुत्र सिद्धार्थ गौतम न सिर्फ हिंदुस्तान की विरासत हैं, अपितु समस्त संसार उनकी वैचारिकी के प्रति श्रद्धानवत है। अप्प दीपो भव अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो, अपना मार्गदर्शन स्वयं करो, का उद्घोष करने वाले सिद्धार्थ गौतम को 35 वर्ष की अवस्था में बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे संबोधि अर्थात सम्यक ज्ञान ,बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। तभी से वह बुद्ध के रूप में विभूषित हुए । बुद्धत्व प्राप्त करके सारनाथ में ऋषिपत्तन में मृगदाव नामक स्थान पर पांच शिष्यों को सर्वप्रथम उपदेश दिया। तथा बाद में अपने अनुयायियों का एक संघ बनाकर बौद्ध धर्म का प्रचार एवं प्रसार किया। उनका प्रथम उपदेश धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। 
      बुद्ध की विचारधारा मानवतावादी सिद्धांतों और चार आर्य सत्य पर आश्रित है । सत्य ,अहिंसा ,दया ,करुणा, मित्रता के भाव से ओत  प्रोत,शुद्धता एवं आत्म संयम आदि नैतिक मूल्यों से समृद्ध बुद्ध ने सब्बम् दुखम कहकर समस्त संसार को दुखमय घोषित किया। मृत्यु को सर्व व्यापक मानते हुए संपूर्ण जगत को क्षणिक व नाशवान बताया। जीवन चिंता ,भय ,निराशा से परिपूर्ण है । जो भी सांसारिक सुख है, उसके मूल में दुख की सत्ता विद्यमान है। दुख का कारण अविद्या या अज्ञानता है। जिसके वशीभूत होकर व्यक्ति तृष्णा अर्थात वासनात्मक लोभ से ग्रसित हो जाता है। और तृष्णा का दास बनकर दुख भोगता रहता है। इसका पूर्णतः परित्याग करके दुखों का निवारण किया जा सकता है । अविद्या के कारण ही तृष्णा ,लोभ, लिप्सा, लालसा ,इच्छा और आकांक्षा का उदय होता है। और जिन तृष्णाओं की संपूर्ति नहीं होती ,वही अतृप्त तृष्णा जन्म मृत्यु का कारण बनती है। तृष्णा पर नियंत्रण करना ही निर्वाण की प्राप्ति है। निर्वाण से अभिप्राय शांति की अवस्था है जिसमें पूर्व कर्म समाप्त हो जाते हैं। और नए कर्म उत्पन्न नहीं होते। अतः पुनर्जन्म की संभावना नष्ट हो जाती है। दुखों का विरोध जीवन में संयम और साधना आत्मसात करके किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने सम्यक चरित्र पर बल दिया। सम्यक चरित्र के निर्माण के लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्गों जिन्हें मध्यम प्रतिपदा के नाम से भी जाना जाता है, का अनुसरण करके व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करता है। और चरित्र का निर्माण करता है। आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग न तो बहुत कठिन होना चाहिए और ना बहुत सरल । इस मार्ग के संयम के प्रमुख अंग- सम्यक शील, सम्यक प्रज्ञा और समाधि है। सम्यक शील में सम्यक वाक्, कर्मांत, आजीविका और व्यायाम आते हैं। सम्यक प्रज्ञा में सम्यक दृष्टि और सम्यक संकल्प हैं।और सम्यक समा धि में स्मृति और समाधि हैं। इस प्रकार अष्टांगिक मार्ग को प्रज्ञा ,शील तथा समाधि में बांटा गया है। इसे त्रिरत्न की संज्ञा भी प्रदान की गई है। इन अष्टांगिक मार्गों को आत्मसात करने से व्यक्ति के जीवन में सदाचार (शील)समाधि (चित्त वृत्तियों पर अनुशासन )तथा प्रज्ञा (विवेक) स्वत: समावेशित हो जाते हैं। 
     शील और सदाचार से मैत्री और करुणा की भावना संपोषित होती है। इन्हीं विचारों पर बुद्ध की शिक्षाएं केंद्रित हैं। तथा संपूर्ण मानवता को समर्पित हैं। जिनमें असत्य वचन न बोलना ,निंदा न करना ,कटु वचन न बोलना, द्वैष भाव न रखना ,नैतिकता युक्त शांतिप्रद, आचरण अंगीकार कर ऐसे कार्य, व्यवसाय का चयन करना, जो निष्कलंक, प्रतिष्ठापद तथा दूसरों के लिए अहितकारी न हो। प्रज्ञा में विवेक को शामिल किया गया है, जिससे मानवीय सद्गुणों का उद्भव और विकास होता है। समाधि- चित्त वृत्तियों को अनुशासित करता है, और शील और विवेक को पुष्ट करता है। 
     इस प्रकार बुद्ध का जीवन दर्शन नितांत मानवतावादी और व्यवहारिक है। उनके धर्म में व्यक्ति के नैतिक जीवन और आचार- व्यवहार पर ही बल दिया गया है। मानवीय आचरण, नैतिक जीवन की शुद्धता, मन, वाणी, कर्म की पवित्रता इस भवसागर से त्राण पाने के लिए आवश्यक है। 
     मानवता के लिए समर्पित बुद्ध का यह संदेश पूरे विश्व के लिए आज भी अपरिहार्य है। इस लेख के माध्यम से मैं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से आग्रह करती हूं, कि युद्ध त्याग कर मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाएं। जिसमें धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो । और
 सर्वे भवंति सुखिनः, सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंती,मां कश्चित् दुख भाग भवेत् । 
का अनुसरण करके के लिये विश्व मानवता के लिए बुद्ध का यह संदेश हम सब को अग्रसर करे।

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