
नव वर्ष 2026 में भारत के लिए बन रही बेहतर सम्भावनाओं और उभरती नई चुनौतियों पर विचार करने के पहले एक नजर इस बात पर डालना जरूरी है कि गत वर्ष 2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था एवं कूटनीतिक क्षेत्र में देश की प्रमुख उपलब्धियां क्या रहीं और किन नई चुनौतियों ने दस्तक दी। 2025 का वर्ष सम्पूर्ण विश्व के लिए नए भू -राजनैतिक समीकरणों के बनने के साथ साथ राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीतियों के चलते बढ़ते व्यापारिक तनाव और नीतिगत अनिश्चितताओं के लिए याद किया जाएगा। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली पर भी दिखाई दिया। इसके बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था ने काफी मजबूती दिखाई और वित्तीय प्रणाली भी स्थिर रही। यद्यपि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 2026 में भी इन व्यापारिक तनाव और नीतिगत आर्थिक अनिश्चितताओं के साथ साथ बदलते भू-राजनैतिक संतुलनों का असर दिखाई देगा क्योंकि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में असंतुलन लाने वाली शक्तियां अभी भी सक्रिय हैं और स्थिर नहीं हुई हैं।
विश्व के इस बदलते हुए आर्थिक एवं कूटनीतिक परिदृश्य का भारत पर भी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था और मेरा विचार है कि भारत उन कुछ चुनिंदा देशों में एक है जिसने गत वर्ष इन तनाव और अनिश्चितताओं का सबसे अधिक दंश झेला। भारत के निर्यातों पर अमेरिका द्वारा लगाये गए 50 प्रतिशत टैरिफ और रूस से तेल न खरीदने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का दबाव इसकी मिशाल हैं। यह महत्वपूर्ण है कि भारत ने इन व्यापारिक तनाव और दबाब का बेहद कुशलतापूर्वक सामना किया और देश की आन्तरिक अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए। यह कोई सामान्य बात नहीं है कि ऐसे तनाव और अनिश्चितता के माहौल में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2025-26 की प्रथम छमाही में 8.0 प्रतिशत रही। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2025-26 की प्रथम और द्वितीय तिमाही में क्रमशः 7.8और 8.2 प्रतिशत रही जो 2024-25 की चारो तिमाहियों और वार्षिक वृद्धि दर से भी अधिक है। इसके साथ ही साथ भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनी हुई है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की भविष्य के लिए एक सुनहरी और उम्मीदों से भरी तस्वीर कही जा सकती है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि 2026 में भी तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा जो एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था और उसकी वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह से मजबूत है और इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट 2025 में ही कहा गया है कि भारत की तेज आर्थिक वृद्धि दर आगे भी बनी रहेगी। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के गवर्नर ने यह भी कहा कि इसका श्रेय घरेलू मांग में वृद्धि, नीची मंहगाई दर बने रहने की संभावना और निवेश में वृद्धि के साथ साथ निरन्तर सुधारवादी आर्थिक नीतियों को दिया जा सकता है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया का अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत रह सकती है और आगे के वर्षों में भी 6.5 प्रतिशत या अधिक रह सकती है। अनेक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का भी अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर वर्तमान वित्तीय वर्ष में 7.0 से 7.5 प्रतिशत रहेगी।
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि देश के आर्थिक परिदृश्य की इस बेहतरीन तस्वीर के लिए निरन्तर आर्थिक सुधारों की दिशा में सरकार के द्वारा उठाए गए कदमों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी राष्ट्र के प्रति अपने उद्बोधन में यह कहा कि 2025 को आर्थिक सुधारों के वर्ष के रूप में देखा जाएगा। आय कर व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए 12 लाख तक आय को पूर्णतः कर मुक्त करना और नई कर व्यवस्था के तहत आय कर की दरों में व्यापक कटौती करना ऐसे कदम रहे जिससे लोगों की व्यय योग्य आय में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई और घरेलू मांग में तेजी आई। इसका सकारात्मक असर निवेश को प्रेरित करने और उच्च वृद्धि दर हासिल करने पर पड़ा। सरकार ने 1961 के आय कर कानून को भी समाप्त कर नए आयकर कानून को पारित किया है जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा। विशेषज्ञों का अनुमान है इससे आयकर ढांचे का सरलीकरण होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी जिसका भविष्य में सकारात्मक असर सरकार के कर संग्रह और निवेश तथा मांग में वृद्धि पर पड़ेगा। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26 में भी अधिक आयकर विवरणी दाखिल होने और कर संग्रह बढ़ने की स्थितियां देखी जा रही हैं। इसी श्रृंखला में सरकार के द्वारा जीएसटी के ढांचे में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए दो प्रभावी दरें 5और18 प्रतिशत सितम्बर 2025 से लागू की गईं। मध्यम आय वर्ग के लोगों को जीएसटी दरों में व्यापक कटौती के द्वारा भारी राहत प्रदान की गई तथा अनेक आम उपभोग की वस्तुओं एवं जीवन रक्षक दवाओं तथा जीवन बीमा आदि को करमुक्त कर दिया गया। जीएसटी में इस सुधार का लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि के द्वारा घरेलू मांग एवं निवेश पर व्यापक सकारात्मक असर पड़ना तय है। जीएसटी में कटौती का पूरा असर 2026में ही सामने आएगा जो देश की अर्थव्यवस्था को निश्चित तौर पर गति प्रदान करेगा। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य एवं 2026 के लिए एक बहुत शुभ संकेत है। सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में देश में लागू 27श्रम कानूनों के स्थान पर चार श्रम संहिताएं लागू की हैं यह श्रम संहिताएं वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक शान्ति एवं श्रमिकों की कार्य दशाएं, कार्य के घण्टे से सम्बन्धित हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इसका श्रमिकों की कार्य कुशलता, उत्पादकता एवं सुरक्षा पर सकारात्मक और अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। इससे औद्योगिक क्षेत्र के विकास को भी गति मिलेगी। सरकार शीतकालीन सत्र में ही मनरेगा के स्थान पर वी बी जी राम जी कानून भी लाई है जो श्रमिकों को एक वर्ष में 125 कार्य दिवस की रोजगार गारन्टी के साथ इस योजना को विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप ग्रामीण विकास के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाएगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊँची वृद्धि दर में नियंत्रित मंहगाई दर की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है जिसने अतिरिक्त क्रयशक्ति एवं घरेलू मांग में वृद्धि के द्वारा अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की है। जनवरी 2025 में उपभोक्ता मूल्य आधारित मंहगाई दर 4.26 प्रतिशत थी जो निरन्तर कम होकर नवंबर 2025 में मात्र 0.71 प्रतिशत रह गई है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 2026में भी मंहगाई दर में नरमी रहने की उम्मीद जताई है।यही कारण कि 2025 में रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने रेपो रेट में 1.25 बेसिक प्वाइंट की कमी की है जिससे कर्ज सस्ते हुए हैं और निवेश को प्रोत्साहन मिला है। आम जनता की ईएमआई घटने से भी लोगों को राहत मिली है। 2026 में भी नीची मंहगाई दर के चलते यह सिलसिला जारी रह सकता है।
भारत द्वारा व्यापार में वृद्धि के लिए 2025 में ब्रिटेन, न्यूज़ीलैण्ड और ओमान से किए गए व्यापार समझौते 2026 में अपना असर दिखायेंगे। अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय संघ दक्षिण अफ़्रीका, एवं आसियान देशों से भी व्यापार समझौते 2026 में आकार लेते दिखेंगे। इनमें सबसे बड़ी प्राथमिकता अमेरिका के साथ अपने हितों को संरक्षित रखते हुए जल्दी से जल्दी व्यापार समझौते को अन्तिम रूप देना होना चाहिए। यह देश के समक्ष 2026 में एक बड़ी चुनौती है कि वह अमेरिका के साथ गतिरोध शीघ्रातिशीघ्र दूर करे जिससे देश के निर्यातों पर लगे अतार्किक टैरिफ दरों से निजात पाई जा सके। हमें याद रखना होगा कि अमेरिका से रिश्तों में आई खटास का सम्मानजनक समाधान अपने हितों की संरक्षा करते हुए निकालना ही होगा क्योंकि अमेरिका भारत का कूटनीतिक सहयोगी होने के साथ साथ व्यापार में भी सबसे बड़ा साझेदार है। आस्ट्रेलिया, मॉरिशस, यू ए ई और एफ्टा के साथ हुए व्यापार समझौतों का भी अधिक लाभ 2026 में ही मिल सकता है।
इन सभी कारणों का ही नतीजा है कि भारत 2025 समाप्त होते होते 4.18 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और उम्मीद है कि 2030 तक 7.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की जीडीपी के साथ विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। नए वर्ष में भी घरेलू बाजार की मजबूती ही भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार बनी रहेगी। इस दौरान भी भारत का घरेलू बाजार 10 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ेगा। ग्लोबल वेल्थ मैनेजर की हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में भी भारत खपत के स्तर में सुधार के मामले में विश्व का सबसे आकर्षक बाजार होगा। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति में वृद्धि, बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर, सेवा क्षेत्र में महत्वपूर्ण वृद्धि एवं कारोबारी सुगमता में सुधार के कारण उद्योग एवं कारोबार में उन्नति जैसे कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य काफी उज्जवल एवं उत्साहवर्धक है।
देश में रोजगार अवसरों की धीमी वृद्धि एवं बेरोजगारी सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती 2026 में भी बने रहने की संभावना है। देश में बेरोजगारी दर नवंबर 2025 में 4.7 प्रतिशत रही है जो अप्रैल 2025 के बाद सबसे कम है।स्टार्ट अप की संख्या तेजी से बढ़ रही है परन्तु निजी निवेश में धीमी वृद्धि के कारण रोजगार अवसरों में मांग के अनुरूप वृद्धि नहीं हो पाई है। सरकार को 2026 में रोजगार सृजन को विशेष प्राथमिकता देते हुए समुचित कदम उठाने होंगे।
शेयर बाजार में तेजी की प्रवृत्ति 2025 में देखी गई है ओर सेंसेक्स तथा निफ्टी में नौ से दस प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।उम्मीद की जा सकती है कि 2026 में भी शेयर बाजार में वृद्धि का यह सिलसिला जारी रहेगा।
भारत के समक्ष एक बड़ी चुनौती डालर के मुकाबले रुपये का लगातार कमजोर होने पर अंकुश लगाने की है। 2025 में रुपये में लगभग 4.95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 2025के अन्तिम सत्र में एक डालर की कीमत 89.88 रुपये के बराबर थी। आयातों के लिए बढ़ती डॉलर की मांग एवं विदेशी पोर्टफोलिओ निवेशकों के द्वारा लगातार निकासी ने रुपये को डॉलर के मुकाबले कमजोर के में अहम योगदान दिया है। 2025 में विदेशी पोर्टफोलिओ निवेशकों ने ईक्विटी बाजार से लगभग 18अरब डालर की निकासी की है।
यह कहा जाता है कि ऊंचाई पर पहुंचने से बड़ी चुनौती ऊंचाई पर बने रहने की होती है। भारत के समक्ष भी यह महत्वपूर्ण चुनौती है कि वह 2025 में अर्थव्यवस्था में आए उछाल को बरकरार रखे।
इसके लिए सरकार को निरन्तर घरेलू खपत बढ़ाने, रोजगार सृजन पर जोर देने की नीति पर चलना होगा भारत को निरन्तर आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने की नीति पर चलना होगा। इन अगली पीढ़ी के सुधारों पर आगे बढ़ते हुए कारोबारी सुगमता, जीवन सुगमता, प्रशासनिक सुधार एवं बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ अर्थतन्त्र को और मजबूती देने वाले कदम उठाने होंगे। भारत पर बढ़ता विदेशी ऋण का बोझ भी एक चिन्ता का विषय है और रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने भी इसे अर्थव्यवस्था के लिए एक जोखिम के रूप में चिन्हित किया है। एक अनुमान के अनुसार भारत पर विदेशी ऋण 2014 के बाद मोदी जी के कार्यकाल में लगभग चार गुना हो गया है। सरकार को राजकोषीय अनुशासन की नीति पर चलते हुए राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने की नीति पर जोर देना होगा।
आत्मनिर्भरता की नीति पर दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने की चुनौती का सामना नए वर्ष में भी सरकार को करना होगा। चीन के साथ लगातार बढ़ता व्यापार घाटा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यद्यपि सरकार रक्षा क्षेत्र से लेकर अनेक क्षेत्रों में मेक इन इंडिया के तहत घरेलू उत्पाद बढ़ाने के लिए प्रयासरत है और आयातों पर अंकुश लगाने के लिए काम कर रही है परन्तु अभी इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी सरकार को कुछ क्रान्तिकारी कदम उठाने की और जनता का सहयोग हासिल करने के लिए निरन्तर प्रयास करने होंगे। अरावली पर्वत श्रृंखला पर उपजे जनाक्रोश सरकार की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करते हैं। 2025 में देश में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदाओं का सामना देश के पर्वतीय क्षेत्रों को करना पड़ा। जलवायु परिवर्तन एवं बढ़ते तापमान जैसे संकटों से बचाव एवं प्रकति के साथ तालमेल के साथ विकास की चुनौतियों से नए वर्ष में भी सरकार को निपटना होगा। अर्थव्यवस्था के बढ़ते डिजटलीकरण के साथ बढ़ती साइबर अपराधों की घटनाओं से निपटने की चुनौती भी नए वर्ष में बनी रहेगी। इसके लिए सख्त कानून और लोगों को जागरूक करने की ज़रुरत होगी।
भारत को 2026 में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय एवं कूटनीतिक चुनौतियों का भी सामना करना होगा। चीन से लम्बे तनाव के बाद 2025 में रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं और तनाव में कमी भी आई है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि चीन के साथ भारत के सम्बन्ध सामान्य हो गए हैं। भारत को इस दिशा में आगे बढ़ने के साथ साथ सतर्क रहने की भी जरुरत है। इधर राष्ट्रपति ट्रंप के साथ पाकिस्तान के बढ़ते कूटनीतिक सम्बन्ध भी भारत के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरे हैं। अमेरिका का इस तरह पाकिस्तान को महत्व देना और आसिम मुनीर की आवभगत के साथ उसकी शान में कसीदे पढ़ना भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ाने वाला है। इसी प्रकार शेख हसीना के तख़्तापलट के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस और जमाते इस्लामी के द्वारा जिस तरह मुस्लिम कट्टरपंथी तत्वों को वहाँ के हिन्दू लोगों के विरोध में हिंसा एवं प्रताणना के लिए संरक्षण एवं समर्थन दिया जा रहा है, वह भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है। बंगलादेश की राजनीति में आने वाले समय में कट्टरपंथी तत्वों का प्रभुत्व बढ़ने की ही उम्मीद है। फरवरी में होने वाले आम चुनाव में बंगलादेश के दोनों मुख्य दल बीएनपी और जमाते इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों के समर्थक एवं भारत विरोधी ही हैं। ऐसे में भारत के लिए बड़ी चुनौती होगी कि वह बंगलादेश में आन्तरिक मामलों में दखल से अपने को दूर दिखाते हुए अपने हितों को कैसे संरक्षित करे।
भारत इस वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी भी करेगा ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए एक अवसर के साथ साथ चुनौती भी है। विभिन्न भू राजनीतिक प्राथमिकताओं और वैचारिक दृष्टिकोण वाले सदस्य देशों के बीच उन्हें एक सार्थक दिशा प्रदान करना एक बड़ी चुनौती होगी।
अन्त में निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है कि नव वर्ष में भारत इस बात से जाना जाएगा कि वह उभरती हुई कूटनीतिक एवं सामरिक चुनौतियों का सामना किस प्रकार करता है। इसी तरह विश्व की नजर इस बात पर भी रहेगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी गति को बरकरार रखने और उभरती आर्थिक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किस कुशलता के साथ करने में सक्षम होती है। सुनिश्चित लक्ष्य एवं प्रभावी क्रियान्वयन ही यह तय करेंगे कि भारत 2026 में केवल संतुलन साधने में ही लगा रहता है या हकीकत में एक शक्ति केंद्र के रूप में सामने आता है।



