“कायंदरा का युद्ध: रानी नायिका देवी की वीरता, भारतीय एकता और विदेशी आक्रमण के विरुद्ध राष्ट्ररक्षा का ऐतिहासिक अध्याय”
डॉ प्रमोद कुमार

भारतीय इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और आत्मसम्मान की जीवित परंपरा का इतिहास है जिसने इस भूभाग को हजारों वर्षों तक सभ्यता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों का केंद्र बनाए रखा। भारत की इस दीर्घ परंपरा में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जहाँ महिलाओं ने केवल परिवार या समाज के स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्र और सभ्यता की रक्षा में भी निर्णायक भूमिका निभाई। ऐसा ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु अपेक्षाकृत कम चर्चित ऐतिहासिक प्रसंग है 1178 में कायंदरा का युद्ध, जिसमें गुजरात की तत्कालीन वीरांगना रानी नायिका देवी ने राजस्थान के तीन बड़े तत्कालीन राजाओं इनमें नाडोल का राजा कैल्हण चौहान, जालोर का राजा है। कीर्तिपाल सोनगरा और आबू का राजा धारावर्ष परमार आदि चौहान और परमार राजाओं के सहयोग से विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को पराजित कर भारतीय प्रतिरोध की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की थी।
बारहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक रूप से अनेक राज्यों में विभाजित अवश्य था, किंतु सांस्कृतिक रूप से वह एक व्यापक सभ्यतागत चेतना से जुड़ा हुआ था। इसी काल में मध्य एशिया से इस्लामी आक्रमणों का दबाव लगातार बढ़ रहा था। अरब और तुर्क आक्रमणकारी केवल राजनीतिक विस्तार तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनका उद्देश्य आर्थिक लूट, सामरिक प्रभुत्व और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना भी था। ऐसे समय में भारतीय राजाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं थी, बल्कि भारतीय जीवनमूल्यों, संस्कृति और सामाजिक स्थिरता की रक्षा भी थी।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मोहम्मद गौरी का उदय हुआ। गौरी ने भारत को केवल एक समृद्ध भूमि के रूप में नहीं देखा, बल्कि वह इसे स्थायी इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के लिए एक रणनीतिक क्षेत्र मानता था। उसने पहले सिंध और पंजाब की ओर अपने अभियान चलाए और फिर पश्चिम भारत की ओर बढ़ने की योजना बनाई। गुजरात उस समय आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य था। समुद्री व्यापार, कृषि संपन्नता और स्थापत्य कला ने गुजरात को मध्यकालीन भारत का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया था। इसलिए गौरी की दृष्टि गुजरात पर पड़ना स्वाभाविक था।
उस समय गुजरात पर चालुक्य अथवा सोलंकी वंश का शासन था। राजा अजयपाल की मृत्यु के बाद उनका पुत्र मूलराज द्वितीय अल्पवयस्क था, इसलिए शासन की बागडोर उसकी माता रानी नायिका देवी के हाथों में आई। भारतीय इतिहास में यह तथ्य अत्यंत प्रेरणादायक है कि एक महिला ने उस समय सत्ता संभाली जब विदेशी आक्रमण का गंभीर संकट सामने था। सामान्यतः मध्यकालीन इतिहास को पुरुष-प्रधान सत्ता संरचना के रूप में देखा जाता है, किंतु नायिका देवी का व्यक्तित्व इस धारणा को चुनौती देता है। वे केवल औपचारिक संरक्षिका नहीं थीं, बल्कि एक सक्षम प्रशासक, रणनीतिकार और राष्ट्ररक्षिका थीं।
रानी नायिका देवी का मूल संबंध गोवा के कदंब वंश से माना जाता है। वे राजनीतिक दृष्टि से प्रशिक्षित, साहसी और दूरदर्शी थीं। उन्होंने यह समझ लिया था कि यदि विदेशी आक्रमणकारी गुजरात में सफल हो गया, तो उसका प्रभाव केवल गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सम्पूर्ण पश्चिम भारत संकट में पड़ जाएगा। इसलिए उन्होंने इस युद्ध को केवल राज्य की सुरक्षा का प्रश्न नहीं माना, बल्कि भारतीय अस्मिता की रक्षा का संघर्ष समझा।
इतिहासकारों के अनुसार 1178 ईस्वी में मोहम्मद गौरी ने गुजरात की ओर आक्रमण किया। वह राजस्थान के मरुस्थलीय मार्ग से आगे बढ़ते हुए गुजरात की सीमा तक पहुँचा। गौरी को यह विश्वास था कि एक महिला शासक के नेतृत्व वाला राज्य उसकी सेना का सामना नहीं कर सकेगा। यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल सिद्ध हुई। भारतीय इतिहास में कई विदेशी आक्रमणकारी भारत की सामाजिक संरचना और सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को समझने में असफल रहे। गौरी ने भी यही गलती की।
रानी नायिका देवी ने परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए केवल अपनी सेना पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक क्षेत्रीय सहयोग की नीति अपनाई। उन्होंने राजस्थान के चौहान और परमार राजाओं से सहयोग प्राप्त किया। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय की भारतीय राजनीतिक चेतना में सहयोग और साझा सुरक्षा की भावना को दर्शाता है। अक्सर यह कहा जाता है कि भारतीय राज्य आपसी संघर्षों में उलझे रहते थे, किंतु कायंदरा का युद्ध इस धारणा का पूर्णतः खंडन करता है। यहाँ विभिन्न राजवंशों ने विदेशी आक्रमणकारी के विरुद्ध मिलकर संघर्ष किया।
युद्ध का क्षेत्र वर्तमान राजस्थान और गुजरात की सीमा के निकट आबू पर्वत के आसपास का क्षेत्र माना जाता है। कायंदरा नामक स्थान पर भारतीय सेना ने रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत की। रानी नायिका देवी ने भूगोल का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया। उन्होंने पर्वतीय और संकरे मार्गों का चयन किया, जिससे गौरी की विशाल सेना की गति और संगठन दोनों प्रभावित हुए। यह युद्ध केवल शारीरिक शक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि रणनीति, मनोबल और नेतृत्व की परीक्षा भी था।
कहा जाता है कि रानी नायिका देवी स्वयं अपने पुत्र को गोद में लेकर युद्धभूमि में उपस्थित हुईं। चाहे इस प्रसंग में कुछ ऐतिहासिक अलंकरण जुड़ गए हों, किंतु यह तथ्य भारतीय समाज में नारी शक्ति की उस सांस्कृतिक छवि को प्रकट करता है जहाँ महिला केवल करुणा और मातृत्व का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, नेतृत्व और प्रतिरोध की भी प्रतीक होती है। भारतीय परंपरा में दुर्गा, चंडी और शक्ति की अवधारणा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रही, बल्कि सामाजिक प्रेरणा का स्रोत भी रही है। नायिका देवी इसी परंपरा की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति थीं।
युद्ध प्रारंभ होने पर भारतीय सेना ने अत्यंत संगठित और योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण किया। चौहान और परमार योद्धाओं की घुड़सवार सेना तथा गुजरात की स्थानीय सैन्य शक्ति ने संयुक्त रूप से गौरी की सेना को घेर लिया। गौरी की सेना लंबी दूरी तय करके आई थी, इसलिए वह भौगोलिक और जलवायु संबंधी कठिनाइयों से पहले ही कमजोर हो चुकी थी। दूसरी ओर भारतीय सेना स्थानीय परिस्थितियों से परिचित थी। परिणामस्वरूप गौरी की सेना में भारी अव्यवस्था फैल गई।
इस युद्ध में मोहम्मद गौरी को इतनी गंभीर पराजय मिली कि उसे युद्धक्षेत्र छोड़कर भागना पड़ा। अनेक इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि यह गौरी के भारतीय अभियानों की सबसे बड़ी प्रारंभिक हारों में से एक थी। इस पराजय के बाद उसने कई वर्षों तक गुजरात की ओर पुनः आक्रमण करने का साहस नहीं किया। यह विजय केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि भारतीय प्रतिरोध की सामूहिक क्षमता का प्रमाण थी।
कायंदरा का युद्ध भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि यदि राजनीतिक नेतृत्व दूरदर्शी और संगठित हो, तो विदेशी आक्रमणों का प्रभावी प्रतिरोध संभव था। यह युद्ध इस मिथक को भी तोड़ता है कि भारत हमेशा विदेशी आक्रमणों के सामने निष्क्रिय रहा। वास्तव में भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ स्थानीय शक्तियों ने आक्रमणकारियों को पराजित किया, किंतु औपनिवेशिक इतिहासलेखन और बाद की राजनीतिक व्याख्याओं में उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
नारी शक्ति के संदर्भ में रानी नायिका देवी का व्यक्तित्व आधुनिक भारत के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। आज जब महिला सशक्तिकरण की चर्चा आधुनिक अवधारणा के रूप में की जाती है, तब भारतीय इतिहास यह प्रमाणित करता है कि महिलाओं ने सदियों पूर्व ही प्रशासन, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा में अपनी क्षमता सिद्ध की थी। नायिका देवी का संघर्ष यह संदेश देता है कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब महिलाओं को नेतृत्व और निर्णय की समान भूमिका प्राप्त हो।
आधुनिक विकसित भारत की अवधारणा केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हो सकती। एक विकसित राष्ट्र वह होता है जो अपने इतिहास, संस्कृति और सामूहिक चेतना से शक्ति ग्रहण करे। कायंदरा का युद्ध हमें बताता है कि राष्ट्रीय एकता केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता होती है। जब विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने मतभेद भुलाकर साझा सुरक्षा और सभ्यतागत मूल्यों के लिए एकजुट होती हैं, तभी राष्ट्र मजबूत बनता है।
यह युद्ध अखण्ड भारत की सांस्कृतिक अवधारणा को भी रेखांकित करता है। यहाँ अखण्डता का अर्थ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता है। गुजरात की रानी, राजस्थान के राजपूत शासक और विभिन्न क्षेत्रों के योद्धा मिलकर विदेशी आक्रमणकारी का सामना करते हैं—यह उस व्यापक भारतीय चेतना का प्रतीक है जिसमें क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद एक साझा सभ्यतागत आत्मा विद्यमान थी।
इतिहास के विश्लेषण में तटस्थता आवश्यक है। इसलिए यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि मध्यकालीन संघर्षों को केवल धार्मिक दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। इन युद्धों के पीछे राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक कारण भी थे। किंतु यह भी सत्य है कि विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय समाज को व्यापक विनाश, लूट और अस्थिरता का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में जो शक्तियाँ भारतीय जनजीवन और सांस्कृतिक स्थिरता की रक्षा के लिए खड़ी हुईं, उनका ऐतिहासिक महत्व स्वतः बढ़ जाता है।
कायंदरा का युद्ध इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यह भारतीय सैन्य रणनीति की परिपक्वता को दर्शाता है। भूगोल का उपयोग, सहयोगी सेनाओं का समन्वय और मनोवैज्ञानिक नेतृत्व—इन सभी तत्वों ने विजय सुनिश्चित की। आधुनिक भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि रणनीतिक दूरदर्शिता, सामाजिक एकता और नेतृत्व क्षमता से सुनिश्चित होती है।
आज के भारत में जब महिलाओं की भूमिका राजनीति, सेना, विज्ञान, शिक्षा और प्रशासन में निरंतर बढ़ रही है, तब रानी नायिका देवी जैसी ऐतिहासिक विभूतियाँ प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं। वे यह सिद्ध करती हैं कि नारी शक्ति केवल प्रतीकात्मक सम्मान की नहीं, बल्कि वास्तविक नेतृत्व की अधिकारी है। यदि समाज महिलाओं को समान अवसर देता है, तो वे राष्ट्रनिर्माण में निर्णायक योगदान दे सकती हैं।
इतिहास की एक बड़ी विडंबना यह रही कि अनेक भारतीय वीरांगनाओं को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे अधिकारी थीं। रानी लक्ष्मीबाई का नाम व्यापक रूप से प्रसिद्ध है, किंतु नायिका देवी जैसी वीरांगनाएँ अभी भी जनस्मृति में सीमित हैं। यह आवश्यकता है कि भारतीय शिक्षा और इतिहासलेखन में ऐसे प्रसंगों को समुचित स्थान दिया जाए ताकि नई पीढ़ी अपने इतिहास के संतुलित और प्रेरणादायक पक्षों को जान सके।
कायंदरा का युद्ध केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी एक संदेश है। यह संदेश है कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और महिला नेतृत्व किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्तियाँ होती हैं। जब समाज जाति, क्षेत्र, भाषा और संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर सामूहिक हितों को प्राथमिकता देता है, तब वह बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सकता है।
विकसित भारत का निर्माण केवल आधुनिक तकनीक, उद्योग और आर्थिक वृद्धि से नहीं होगा। उसके लिए आवश्यक है कि समाज में आत्मसम्मान, सामाजिक समरसता, लैंगिक समानता और ऐतिहासिक चेतना का विकास हो। रानी नायिका देवी का संघर्ष हमें यही सिखाता है कि राष्ट्र की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं होती, बल्कि वह विचारों, मूल्यों और सामूहिक आत्मबल की रक्षा से भी जुड़ी होती है।
अंततः कायंदरा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक गौरवपूर्ण अध्याय है जिसमें एक महिला शासक ने अद्वितीय साहस, बुद्धिमत्ता और नेतृत्व का परिचय देते हुए विदेशी आक्रमणकारी को पराजित किया। यह युद्ध केवल गुजरात की विजय नहीं था, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान की विजय था। यह नारी शक्ति, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना का ऐसा उदाहरण है जो आज भी विकसित, समरस और अखण्ड भारत के निर्माण के लिए प्रेरणा प्रदान करता है। रानी नायिका देवी का व्यक्तित्व हमें यह स्मरण कराता है कि जब राष्ट्र संकट में होता है, तब साहस और नेतृत्व किसी एक लिंग या वर्ग की बपौती नहीं होते, बल्कि वे उन सभी में प्रकट हो सकते हैं जो अपने समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित हों।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



