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सत्य सनातन की एक और ऐतिहासिक विजय, धार की भोजशाला मंदिर है – इंदौर उच्च न्यायालय

मृत्युंजय दीक्षित

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला मंदिर के विवाद का निर्णय हिंदुओं पक्ष में गया है। भोजशाला को लेकर हिंदू समाज एक हजार वर्षों से संघर्ष कर रहा था। मध्य प्रदेश की इंदौर उच्च न्यायालय की दो जजों की बेंच ने धार भोजशाला पर निर्णय सुनाते हुए परिसर को हिंदू मंदिर घोषित किया है। न्यायालय ने एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर विश्वास करते हुए यह निर्णय दिया है और सरकार को ऐतिहासिक संरचनाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी दी है। निर्णय सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि भोजशाला का मूल स्वरूप संस्कृत शिक्षा केंद्र का था। न्यायालय ने कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और न्यायालय वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा करता है। न्यायालय ने कहा कि सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं का संरक्षण करे। न्यायालय ने कहा कि श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं, कानून व्यवस्था और संरक्षण सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। यह निर्णय 24 दिन और 43 घंटे की व्यापक सुनवाई के बाद न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने सुनाया है।
निर्णय में मुस्लिम पक्ष को नमाज अदा करने के लिए सरकार से संपर्क करने की छूट दी गई है। न्यायलय ने केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला परिसर के प्रबंधन और संस्कृत शिक्षा से जुड़े फैसले लेने को कहा है। एएसआई परिसर का समग्र प्रशासन और प्रबंधन अपने पास जारी रखेगा।
हिंदुओं द्वारा पूजा जारी रही – उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि विवादित स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई और ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह स्थापित होता है कि विवादित क्षेत्र का मूल चरित्र भेाजशला के रूप मे था जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र था। न्यायालय ने कहा कि विवादित भोजशाला कमाल मौला मस्जिद परिसर एक संरक्षित स्मारक है जिसे 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस क्षेत्र का धार्मिक चरित्र माँ सरस्वती का भोजशाला मंदिर ही है।
अब परिसर में केवल हिंदू ही पूजा पाठ कर सकेंगे क्योकि वर्ष 2003 वाला वह आदेश रद्द हो गया है जिसमें हिंदुओं को केवल मंगलवार और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की छूट दी गई थी। यह विजय हिंदुओं के 1000 वर्षों के संघर्ष की विजय का स्वर्णिम अवसर है। इस फैसले के बाद लंदन म्यूजियम से माँ वाग्देवी की प्रतिमा वापस आने मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। मुस्लिम पक्ष उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की बात कह रहा है।
वर्ष 1034 में परमार शासक राजा भोज ने ज्ञान की साधना और माँ सरस्वती की आराधना के लिए भोजशाला का निर्माण कराया। यह नालंदा, तक्षशिला और काशी की ही तरह एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था। सैकड़ों अलंकृत लाल स्तंभों पर देवी- देवताओं की मूर्तियां शोभायमान थीं। इस भवन में माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, भास्कर भट्ट, धनपाल, मातुंगाचार्य जैसे प्रकांड विद्वान अध्ययन व अध्यापन करते थे। भवन के उत्तर व दक्षिण की दीवारों पर जालीदार खिड़कियों के बीच देवी- देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई थीं । भवन के मध्य में विशाल यज्ञकुंड है। वर्ष 1035 में यहाँ माँ सरस्वती की अप्रतिम सौंदर्य से पूर्ण प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा बसंत पंचमी के दिन की गई थी।
राजा भोज शौर्य एवं पराक्रम के साथ साथ धर्म ज्ञान, विज्ञान, साहित्य तथा कला के ज्ञाता थे। राजा भोज ने माँ सरस्वती की आराधना, हिंदू जीवन दर्शन एवं संस्कृत के प्रसार हेतु ईस्वी सन 1034 में माँ सरस्वती मंदिर भोजशाला का निर्माण कराया। माँ सरस्वती के अनन्य उपासक राजा भोज ने जिस स्थान पर सरस्वती की साधना करके अनेकों बार उनका साक्षात्कार किया उसी स्थान पर अपनी कल्पना एवं वास्तु से विश्व के सर्वश्रेष्ठ सरस्वती मंदिर का निर्माण धारा नगरी में करवाया जो आज भोजशाला के नाम से विख्यात है।
पराभव काल – पावन भोजशाला जो अपने आंगन में धर्म, दर्शन और शास़्त्रार्थ के लिए प्रसिद्ध थी, जहां वेदमंत्रो की ध्वनि गूंजती थी वहीं इस्लामी साजिश के तहत माँ सरस्वती की आराधना का ढोंग करते हुए कमाल मौलाना ने अपने कदम बढाए। कमाल मौलाना ने तंत्र- मंत्र के माध्यम से 36 वर्षों तक संपूर्ण मालवा राज्य को धर्मान्तरित करवाया और मालवा राज्य की जानकरियां भी एकत्र करता रहा। ईस्वी वर्ष 1305 में इस्लामी हमलावर अलाउद्दीन खिलजी ने परमारों के अभेद्य गढ़ मालवा पर आक्रमण कर इस्लामी साम्राज्य की स्थापना की तथा भोजशाला सहित हिन्दुओं के तमाम मंदिरों व आस्था के केंद्रो का विध्वंस किया । वर्ष 1401 में दिलावर खां गौरी ने मालवा को अपना साम्राज्य घोषित कर विजय मंदिर (सूर्य मार्तंड मंदिर) को ध्वस्त किया । आज उसी विजय मंदिर में नमाज पढ़ी जा रही है और उसे भी लाट मस्जिद कहते हुए मस्जिद सिद्ध करने की साजिशें जारी है।
वर्ष 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने आक्रमण कर भोजशाला को खंडित कर मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया और मंदिर के बाहर अतिक्रमण करके कमाल मौलाना की मृत्यु के 204 वर्ष बाद मकबरा बनाया। इसके आधार पर ही माँ सरस्वती के मंदिर भोजशाला को कमाल मौलाना की मस्जिद बनाने का षड्यंत्र किया जा रहा था जिसे आज इंदौर उच्च न्यायालय की बेंच के सामने साक्ष्यों के साथ ध्वस्त किया गया है ।
हिन्दू समाज ने भोजशाला पर अपना अधिकार वापस लेने के लिए 1000 वर्षों से लगातार संघर्ष किया। साठ के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों एवं हिंदू महासभा ने श्री महाराजा भोज स्मृति बसंतोत्सव समिति का गठन किया और अपने प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। अनेक वर्षों में अथक प्रयासों के बाद भी जब सफलता नहीं प्राप्त हो रही थीं तब वर्ष 2000 में धार के सामाजिक संगठनों की ओर से हिंदू जागरण मंच का गठन किया गया। हिंदू समाज माँ सरस्वती की भोजशाला पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए सतत संघर्ष वान तथा संकल्पवान रहा।
वर्ष 1995 में भोजशाला में दो पक्षों के मध्य विवाद के बाद प्रशासन ने हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दे दी। 12 मई 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम तुष्टिकरण का परम उदाहरण देते हुए भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी और हिंदुओं की मंगलवार की पूजा भी रोक दी। बाद में हिंदुओं को वर्ष में केवल एक दिन बसंत पंचमी और मुस्लिम समाज को प्रत्येक शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दे दी गई। 6 फरवरी 1998 को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने फिर आम जनमानस के प्रवेश पर रोक लगा दी। वर्ष 2003 में हिंदुओं को बिना फूल माला के पूजा करने की अनुमति दी गई और भोजशाला को पर्यटकों के लिए भी खोला दिया गया। 18 फरवरी 2003 वहां पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। वर्ष 2013 में बसंत पंचमी के अवसर पर तथा फिर वर्ष 2016 में भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव हुआ। तब से लेकर आज तक अनेकानेक जनजागरण अभियान और न्यायिक संघर्ष चलता रहा।
आज हिंदू समाज ने एक प्रमुख पड़ाव जीत लिया है और संभवतः उसके लिए आगे की राह सरल हो गई है।

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