लेख

आज़ादी सिर्फ एक दिन की नहीं होती – यह सोच की होनी चाहिए

धीरज मिश्रा

आज़ादी सिर्फ एक दिन की नहीं होती – यह सोच की होनी चाहिए। हम सब भारत हैं – और मेरा देश, मेरी ज़िम्मेदारी है, खुश रहने वाला समाज ही सशक्त भारत बनाता है, आज़ादी के 77 साल बाद – मैं अपने देश से क्या अपेक्षा रखता हूँ और क्या योगदान दे सकता हूँ?” ये भाव होना चाहिए। देश सिर्फ नक्शे में खींची हुई सीमाएं नहीं होता, देश वो है जो हमारे भीतर धड़कता है –वो मिट्टी जिसकी महक से हमें सुकून मिलता है, वो संस्कृति जो हमें जोड़ती है, वो भाषाएं जो हमें अभिव्यक्त करना सिखाती हैं और वो लोग – जिनके सपनों से देश की पहचान बनती है। एक राष्ट्र, उसके नागरिकों की सोच, कर्म और संकल्पों से बनता है। यह केवल राजनेताओं या सैनिकों की नहीं, बल्कि हर आम व्यक्ति की ईमानदारी और समझदारी की कहानी है।
जिस तरह बीज से वृक्ष उगता है, उसी तरह सोच से बदलाव आता है। अगर हम अपनी सोच को राष्ट्रहित में मोड़ सकें,तो हमारे निर्णय, आदतें, और व्यवहार – देश को तरक्की की राह पर ले जा सकते हैं। सोच बदलते ही – कर्मचारी ईमानदारी से काम करता है, दुकानदार सही तोल और मूल्य देता है, युवा नए विचारों से राष्ट्र निर्माण करता है और ग्राहक लोकल ब्रांड्स को प्राथमिकता देता है। सोच बदलना ही असली क्रांति है। देश तभी आगे बढ़ेगा जब हर नागरिक अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाएगा। हर छोटे-बड़े काम का महत्व है – सफाईकर्मी से लेकर वैज्ञानिक तक। पेड़ लगाना, पानी बचाना, प्लास्टिक का कम उपयोग – ये सिर्फ पर्यावरण नहीं, देशभक्ति भी है। अपने टैक्स समय पर देना, वोट डालना, जनहित की नीतियों का समर्थन करना – ये सब जिम्मेदार नागरिक की पहचान हैं। ट्रैफिक सिग्नल हो या समय की पाबंदी – ये छोटी आदतें देश को एक व्यवस्थित राष्ट्र बनाती हैं। अगर आप पढ़े-लिखे हैं, तो एक बच्चे को पढ़ाएं। अगर आप स्किल्ड हैं, तो किसी को सिखाएं। देश के विकास में सबसे बड़ा निवेश – ज्ञान का फैलाव है। मेक इन इंडिया’ तभी सफल होगा जब हम लोकल ब्रांड्स, कारीगरों और स्टार्टअप्स को प्राथमिकता देंगे और व्यापारी अपने ग्राहकों को प्राथमिकता देगा। जाति, धर्म, भाषा – इन सबसे ऊपर उठकर जब हम एक-दूसरे को ‘भारतीय’ समझकर साथ चलते हैं, तभी देश मजबूत होता है।
मैं ही देश हूँ, मेरा परिवार, मेरी सोच और मेरा कर्म – सब देश हैं। अपने ऑफिस में सहयोग की भावना, अपने मोहल्ले में समझदारी, अपने परिवार में सम्मान – ये सब देश की ऊर्जा बनाते हैं। अगर आप सोचते हैं कि देश की स्थिति खराब है – तो पहला प्रश्न खुद से करें: क्या मैं देश के लिए ईमानदार हूं?
आज़ादी सिर्फ झंडा फहराने तक नहीं, ईमानदारी निभाने तक है। खुश रहने वाला नागरिक, एक खुशहाल राष्ट्र की नींव है। राष्ट्र निर्माण भाषणों से नहीं, नियमित कर्मों से होता है। सोच बदलो – देश बदलना तय है। 15 अगस्त केवल एक छुट्टी नहीं है। यह स्मरण है – उन अनगिनत बलिदानों का, और एक मौका है – अपने हिस्से का देश गढ़ने का। तो आइए, हम सब मिलकर कहें:
“मैं भारत हूँ – और मैं अपने कर्म से देश को ऊँचा बनाऊँगा।” 🇮🇳 जय हिंद | वंदे मातरम् |

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