
इस वर्ष पिछले एक माह में ही हिमालय पर्वतीय क्षेत्र की साया में बसे अनेक निकटवर्ती राज्यों में अत्यधिक वर्षा एवं बादल फटने के कारण हुई भीषण तबाही एवं जान माल की हानि है। बादल फटने जैसी घटनाएं पर्वतीय क्षेत्रों में सामान्यतः होती रहती हैं परन्तु इस वर्ष इनका निरन्तर बड़े पैमाने पर होना और इन घटनाओं में तीव्र वृद्धि के कारण हुई व्यापक तबाही ने सरकार के साथ साथ सामान्य लोगों को भी चिन्ता में डाल दिया है। हिमांचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर में पिछले एक दो माह में ही भीषण तबाही की जो तस्वीरें सामने आई हैं ,वो विचलित करने वाली हैं। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने हालात से निपटने एवं जान माल की रक्षा के लिए सराहनीय काम किया है परन्तु यह भी सच है कि अनेक मौकों पर ये अपने दायित्वों के प्रति पूर्ण सजग, निष्ठावान एवं समर्पित होने के बाद भी प्रकति की इस विनाशलीला के समक्ष असहाय दिखी हैं। यह स्थिति सरकार से लेकर हम आप सभी के लिए एक गम्भीर मंथन का विषय है कि प्रकति के इस विनाशकारी एवं रौद्र रूप के पीछे क्या कारण हैं और इसके लिए कौन उत्तरदायी है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं जब तब होती रही हैं और कभी कभी केदारनाथ या अन्य भयावह घटनाओं ने हमें चेतावनी भी दी है कि हम सजग हो जाएं परन्तु हमने शायद इनसे कोई सबक नहीं लिया। हम तत्काल हालातों से निपटने के बाद फिर सब भुला देते हैं और यही कारण है कि ऐसी घटनाएं निरन्तर बढ़ती जा रही हैं और उनकी गहनता एवं भयावहता भी आज चरम पर है। वैसे तो पहले ही बहुत देर हो चुकी है परन्तु यदि हम अब भी न जागे और इस दिशा में गम्भीर नहीं हुए तो इसके बहुत भयावह परिणामों का सामना न केवल इन क्षेत्रों की जनता एवं अर्थव्यवस्था को करना होगा वरन देश को भी भुगतान होगा। पर्वतीय क्षेत्र के इन राज्यों में त्रासदी की इन बढ़ती हुई एवं गम्भीर घटनाओं के लिए वैसे तो अनेक कारण उत्तरदायी हैं जैसे कि पर्यावरणीय असंतुलन, वनों का कटना, पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी एवं अधाधुंध अनियोजित शहरीकरण, आधारभूत संरचना के विकास एवं औधोगीकरण के लिए निरन्तर प्रकति के साथ खिलवाड़ एवं वैश्विक भौगोलिक तापमान में वृद्धि के कारण पहाडों का क्षरण। यदि एक वाक्य में इन सभी कारणों को समाहित किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि हमने विकास के नाम पर विनाश को ही निमंत्रण दिया है और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने के स्थान पर प्रकृति का बिना किसी संकोच सीमा से परे जाकर विदोहन किया है। प्रकृति हमें जीवन देती है और हमारी सुख सुविधाओं का पूरा ख्याल रखती है, हमें संसाधन उपलब्ध कराती है। ऐसे में हमारा भी उत्तरदायित्व बनता है कि हम प्रकृति का सम्मान करें और उसका शोषण इस सीमा तक न करें कि हम उसका ही मार्ग अवरोध करने लगे। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति जितनी उदार है, उसका रौद्र एवं आक्रामक रूप उससे भी अधिक भयावह एवं विनाशकारी होता है। मनुष्य प्रकृति से जुड़कर और उसे सम्मान देकर तो सब कुछ हासिल कर सकता है परन्तु उससे लड़कर अपने विनाश को ही आमंत्रण देता है जैसा हाल के दिनों में हमारे सामने आ रहा है।
पर्वतीय क्षेत्र प्रकृति की सुन्दरता समेटे हुए हैं और स्वाभाविक है कि हम उन खूबसूरत नजारों का आनन्द लेने और कुछ पल उन प्राकृतिक वादियों में बिताने के लिए लालायित रहते हैं। इधर पिछले कई वर्षों में प्रकृति के प्रति इस लगाव के कारण इन क्षेत्रों का अधाधुंध शहरीकरण एवं व्यवसायीकरण हुआ है। वनों को काटकर एवं नदी नालों का भी मार्ग अवरूद्ध कर मकानों एवं होटलों का निर्माण बिना किसी योजना बेतरतीब तरीके से हुआ है। पर्वतीय क्षेत्रों में हमारे अनेकों धार्मिक स्थल एवं आस्था के केंद्र हैं जहाँ वर्ष में लाखों लोग दर्शन के लिए जाते हैं। इन धार्मिक पर्यटकों की संख्या भी आबादी एवं सुविधाओं में वृद्धि के कारण निरन्तर बढ़ती जा रही है। इसने इन नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों में व्यवसायीकरण को और बढ़ावा दिया है। यह ठीक है कि पर्यटकों एवं धार्मिक यात्रा करने वाले लोगों को भी सुविधाएं दी जानी चाहिए और उनकी यात्रा सुगम बनाए जाने के लिए सरकार को काम करना चाहिए। इससे इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। इन क्षेत्रों का विकास एवं यहां के लोगों की तरक्की एवं सुविधाओं में वृद्धि भी सरकार की जिम्मेदारी है परन्तु इन क्षेत्रों के विकास के समय सरकार के साथ साथ आम लोगों को भी अधिक जिम्मेदारी है कि वह दीर्घकालीन योजनाएं बनाए और इन नाजुक क्षेत्रों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ें।नदियों एवं पहाडों का संरक्षण करना एवं उनसे एक उचित दूरी बनाये रखते हुए ही मकानों, सड़कों एवं आधारभूत संरचना का निर्माण करने की अनुमति दी जानी चाहिए। इस विषय में सरकार को कुछ कठोर नियमों को बनाना ही नहीं चाहिए वरन उनका सख्ती से अनुपालन भी सुनिश्चित होना चाहिए। वनों के कटान पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि वन इन क्षेत्रों में जमीन की पकड़ मजबूत करने एवं पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाने हैं।
भौगोलिक तापमान में वृद्धि एक विश्वव्यापी समस्या है जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन पर्वतीय क्षेत्रों में ही पड़ता है। पहाड़ तापमान में वृद्धि के कारण पिघल रहे हैं और उसका खामियाजा समय समय पर स्थानीय लोगों एवं पर्यटकों को भुगतान पड़ता है। वन क्षेत्र में वृद्धि एवं अधाधुंध शहरीकरण एवं व्यवसायीकरण पर रोक लगाकर एक सीमा तक भौगोलिक तापमान में वृद्धि की समस्या पर अंकुश लगाया जा सकता है।
अन्त में मैं यही कहना चाहूंगा कि इस परिस्थिति के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं और इस समस्या पर अंकुश बिना जन सहयोग के सरकार नहीं कर सकती है। सरकार को तो कठोर कदम उठाने ही होंगे। हम आप को भी प्रकृति से एक दूरी रखते हुए और उसका सम्मान करते हुए प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द लेने के लिए सोचना होगा। प्राकृतिक सुन्दर परन्तु जोखिम से भरे नाज़ुक पर्वतीय क्षेत्रों के क्रूरतापूर्व विदोहन से बचना होगा एवं इन क्षेत्रों के शहरीकरण एवं व्यवसायीकरण पर रोक लगाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का ईमानदारी के साथ अनुपालन एवं समर्थन करना होगा।ऐसा करके ही हम इन प्रकृति के खूबसूरत नजारों से परिपूर्ण पर्वतीय क्षेत्रों का संरक्षण कर सकते हैं और दिन प्रतिदिन इन क्षेत्रों में आ रही आपदाओं पर एक सीमा तक अंकुश लगा सकते हैं।