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“एक सत्ता, दो दृष्टियाँ: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधी और आंबेडकर का अनशन संघर्ष”

डॉ प्रमोद कुमार

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का वृत्तांत नहीं है, बल्कि यह विचारों, दृष्टियों और सामाजिक सरोकारों के टकराव और संवाद की गाथा भी है। अंग्रेजी हुकूमत एक ऐसी सत्ता थी जिसने राजनीतिक दमन के साथ-साथ सामाजिक विषमता, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक हीनता को संस्थागत रूप दिया। इस सत्ता के विरुद्ध उठी आवाज़ें अनेक थीं, किंतु उनमें महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर दो ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने न केवल अंग्रेजी शासन का विरोध किया, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा को भी प्रश्नांकित किया। दोनों ने अनशन जैसे कठोर नैतिक हथियार का प्रयोग किया, परंतु उनके अनशन का उद्देश्य, संदर्भ और नैतिक आधार एक समान होते हुए भी मूलतः भिन्न थे। यही भिन्नता भारतीय राष्ट्र-निर्माण की जटिलता को समझने की कुंजी प्रदान करती है।
महात्मा गांधी के लिए अंग्रेजी हुकूमत एक नैतिक चुनौती थी। वे उसे केवल विदेशी शासन के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक पतन के प्रतीक के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि यदि भारतीय समाज नैतिक रूप से सशक्त हो जाए तो कोई भी बाहरी सत्ता उसे गुलाम नहीं बना सकती। इसीलिए गांधी का सत्याग्रह केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम था। अनशन उनके लिए आत्मसंयम, आत्मबलिदान और सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा का प्रतीक था। जब वे अनशन पर बैठते थे, तो उसका उद्देश्य विरोधी को नैतिक रूप से झकझोरना होता था, न कि उसे शारीरिक या हिंसक दबाव में लाना। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध उनका अनशन इस विश्वास से प्रेरित था कि अन्याय के सामने स्वयं कष्ट सहना ही सच्चे प्रतिरोध की पहचान है।
इसके विपरीत, डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिए अंग्रेजी हुकूमत केवल विदेशी शासन नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सत्ता भी थी जिसने भारतीय समाज की अंतर्निहित असमानताओं को या तो अनदेखा किया या अपने प्रशासनिक हितों के लिए उनका उपयोग किया। आंबेडकर का संघर्ष दोहरा था—एक ओर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध, दूसरी ओर उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध जिसने सदियों से बहुसंख्यक समाज को दासता, अपमान और वंचना में जकड़ रखा था। उनका अनशन आत्मशुद्धि का नहीं, बल्कि अधिकार-संघर्ष का साधन था। वे इसे नैतिक अपील से अधिक राजनीतिक दबाव के रूप में देखते थे, जिसके माध्यम से शोषित वर्गों के अधिकार सुनिश्चित किए जा सकें।
गांधी का अनशन प्रायः व्यापक राष्ट्रीय एकता की अपील के रूप में सामने आता है। उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था और सामाजिक प्रश्न राष्ट्र की एकता के अधीन थे। वे मानते थे कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामाजिक सुधार संभव होगा। इसीलिए उनका ध्यान पहले अंग्रेजी हुकूमत को नैतिक रूप से परास्त करने पर केंद्रित था। दूसरी ओर, आंबेडकर के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन थी जब तक सामाजिक स्वतंत्रता सुनिश्चित न हो। वे बार-बार यह कहते थे कि यदि समाज के भीतर ही गुलामी कायम रही, तो अंग्रेजों के जाने से कुछ विशेष नहीं बदलेगा। यही कारण था कि उनका अनशन और उनका संघर्ष अंग्रेजी सत्ता के साथ-साथ भारतीय समाज की जातिगत सत्ता को भी चुनौती देता था।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि गांधी और आंबेडकर दोनों ने अनशन का प्रयोग अत्यंत सोच-समझकर किया। गांधी के अनशन में नैतिकता का आग्रह प्रमुख था। वे स्वयं कष्ट सहकर दूसरों के हृदय परिवर्तन की अपेक्षा करते थे। उनका विश्वास था कि अन्याय करने वाला भी अंततः मनुष्य है और सत्य की अपील उसके अंतःकरण को छू सकती है। इस दृष्टि में अनशन आत्मपीड़ा का वह रूप है जो हिंसा के पूर्ण निषेध के साथ अन्याय का प्रतिकार करता है। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध उनके अनशन इसी नैतिक विश्वास की अभिव्यक्ति थे।
आंबेडकर का दृष्टिकोण अधिक यथार्थवादी और अधिकार-केंद्रित था। वे मानते थे कि इतिहास में शोषक वर्ग कभी भी केवल नैतिक अपील से अपने विशेषाधिकार नहीं छोड़ते। इसलिए संघर्ष में संवैधानिक, राजनीतिक और कानूनी दबाव अनिवार्य है। उनका अनशन भावनात्मक अपील से अधिक एक रणनीतिक कदम था, जिसका उद्देश्य सत्ता संरचना को बाध्य करना था कि वह दलितों और वंचितों के अधिकारों को स्वीकार करे। उनके लिए अनशन आत्मबलिदान का महिमामंडन नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था को उजागर करने का अंतिम उपाय था।
अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध गांधी का संघर्ष अपेक्षाकृत प्रतीकात्मक और नैतिक था, जबकि आंबेडकर का संघर्ष अधिक ठोस और संरचनात्मक था। गांधी साम्राज्यवाद को भारत की आत्मा पर आक्रमण मानते थे, वहीं आंबेडकर इसे भारतीय समाज की विषमता को बनाए रखने वाला एक कारक मानते थे। इसीलिए गांधी का अनशन प्रायः राष्ट्रीय और नैतिक प्रश्नों से जुड़ा रहा, जबकि आंबेडकर का अनशन सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे विशिष्ट मुद्दों पर केंद्रित रहा।
यह भी उल्लेखनीय है कि गांधी का अनशन कभी-कभी भारतीय समाज के भीतर दबाव का माध्यम भी बन गया। उनकी नैतिक छवि इतनी प्रभावशाली थी कि उनके अनशन से समाज भावनात्मक रूप से विचलित हो जाता था। आंबेडकर ने इस पहलू की आलोचना भी की। उनका मानना था कि अनशन जैसे साधन का प्रयोग यदि शक्ति-संतुलन को असमान रूप से प्रभावित करे तो वह लोकतांत्रिक विमर्श को बाधित कर सकता है। फिर भी, आंबेडकर स्वयं भी जब अनशन पर बैठे, तो उन्होंने इसे अत्यंत विवशता की स्थिति में अपनाया, न कि आदर्श साधन के रूप में।
इन दोनों दृष्टियों का टकराव केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्र की दिशा को लेकर दो भिन्न अवधारणाओं का संघर्ष था। गांधी का राष्ट्र नैतिक एकता पर आधारित था, जहाँ सामाजिक प्रश्नों का समाधान क्रमिक सुधार से होगा। आंबेडकर का राष्ट्र संवैधानिक समानता पर आधारित था, जहाँ सामाजिक न्याय को टालना अन्याय को स्थायी बनाना है। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध उनके अनशन इन दोनों दृष्टियों की स्पष्ट अभिव्यक्ति थे।
फिर भी, यह कहना गलत होगा कि गांधी और आंबेडकर एक-दूसरे के पूर्ण विरोधी थे। दोनों ही अंग्रेजी शासन को भारत के लिए घातक मानते थे और दोनों ही हिंसा के विरुद्ध थे। अंतर केवल प्राथमिकताओं और पद्धतियों का था। गांधी के लिए नैतिक शुद्धता साध्य भी थी और साधन भी, जबकि आंबेडकर के लिए न्याय साध्य था और साधन परिस्थितियों के अनुसार चुने जाने चाहिए थे।
अंग्रेजी सत्ता के संदर्भ में देखें तो गांधी का अनशन साम्राज्यवाद के नैतिक दिवालियेपन को उजागर करता है, जबकि आंबेडकर का अनशन औपनिवेशिक शासन की सामाजिक उदासीनता को सामने लाता है। गांधी अंग्रेजों से कहते हैं कि वे अन्यायी हैं, आंबेडकर उनसे कहते हैं कि वे अन्याय में सहभागी हैं। यह सूक्ष्म अंतर दोनों के संघर्ष को अलग दिशा देता है।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि इन दोनों दृष्टियों ने मिलकर ही भारतीय स्वतंत्रता और लोकतंत्र की नींव रखी। यदि केवल गांधी की नैतिक दृष्टि होती, तो सामाजिक न्याय अधूरा रह जाता। यदि केवल आंबेडकर की अधिकारवादी दृष्टि होती, तो राष्ट्रीय एकता संकट में पड़ सकती थी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका अनशन संघर्ष दरअसल भारतीय चेतना के दो आवश्यक आयामों का प्रतिनिधित्व करता है—नैतिकता और न्याय।
इस प्रकार “एक सत्ता, दो दृष्टियाँ” केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक सच्चाई का बयान है कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी सत्ता से मुक्ति नहीं, बल्कि भीतर की दासता से भी मुक्ति है। गांधी और आंबेडकर के अनशन इस द्वंद्व को उजागर करते हैं और हमें यह सिखाते हैं कि राष्ट्र-निर्माण में एक ही मार्ग पर्याप्त नहीं होता। सत्य और न्याय, करुणा और अधिकार, आत्मसंयम और संवैधानिक संघर्ष—इन सबका संतुलन ही एक समावेशी और मानवीय समाज की नींव रख सकता है।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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