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नव वर्ष 2026 से नई उम्मीदें

राकेश कुमार मिश्र

अब हम नए वर्ष 2026 में प्रवेश कर चुके हैं। अपने सभी परिवारजनों, सम्बन्धियों और मित्रों को नववर्ष शुभ और मंगलमय होने की शुभकामनाएं भेजने के दायित्व का भी निर्वहन कर चुके हैं। इस अवसर पर मेरे मन में बारम्बार एक सवाल उठ रहा है और मेरा मन उसका जवाब पाने के लिए बेहद व्यग्र है।आप सभी के साथ मैं उस सवाल को साझा करने का प्रयास कर रहा हूँ ताकि आप सभी लोग भी उस पर मन्थन कर सकें और उसका जवाब तलाशने की कोशिश करें। मेरा सवाल यह है कि नए वर्ष में क्या वास्तव में कुछ ऐसा होगा जो हकीकत में हम आप के साथ साथ अपने राष्ट्र और विश्व के लिए भी शुभ और मंगलमय हो। यदि ऐसा सम्भव होता है तो यह हकीकत में 2026 को एक यादगार वर्ष बना सकता है। यदि हम ऐसा करने या होते हुए देखने में असफल रहे तो हमारी नव वर्ष मंगलमय होने की शुभकामनाएं एक परम्परा का निर्वहन ही बन कर रह जाएंगी। हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में हमें इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास होते दिखाई देंगे जो सम्पूर्ण विश्व और हम सभी के लिए मंगलकारक होंगे।
मेरी पहली चिन्ता वैश्विक शांति को लेकर है। आज सम्पूर्ण विश्व संघर्ष और तनाव के भीषण दौर से गुज़र रहा है। रुस और यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से वैश्विक चिन्ता का विषय है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की पहल पर इस युद्ध को रोकने एवं दोनों देशों के बीच समझौता कराने के निरन्तर प्रयत्न किए जा रहे हैं परंतु दोनों देशों के नेताओं के बीच अविश्वास एवं हठधर्मिता के चलते इसका कोई स्थायी समाधान शीघ्र निकलता नहीं दिखता। इसी तरह भारत पाकिस्तान के बीच तनाव और भारत द्वारा आपरेशन सिंदूर जारी रहने की घोषणा से हम सभी वाकिफ हैं। पाकिस्तान एक तरफ भारत और दूसरी तरफ अफगानिस्तान के साथ संघर्ष की राह पर चलता दिख रहा है और निकट भविष्य में भी उसकी नीति और नियत में किसी बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। एक लम्बे समय तक चीन से तनाव के बाद भी आज यह नहीं कहा जा सकता कि भारत चीन के सम्बन्ध सामान्य हैं। इसी तरह इजरायल हमास के बीच युद्ध और तनाव, इजरायल – ईरान, चीन- ताइवान, अमेरिका -वेनेज़ुएला, सऊदी अरब – यूएई आदि अनगिनत तनाव के क्षेत्र हैं जो नए वर्ष में भी वैश्विक शान्ति के लिए खतरा ही बने हुए हैं। सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाएं असहाय एवं मूक दर्शक बनी हुई हैं और प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक मंच पर कई बार आवाहन के बावजूद कोई भी बड़ा एवं प्रभावी देश संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था को समर्थ और प्रभावी बनाने की दिशा में पहल करता नहीं दिखता।
मेरी चिंता का दूसरा विषय विश्व में निरन्तर बढ़ती हुई कट्टरवादिता एवं असहिष्णुता है। इस बढ़ती कट्टरपंथी सोच ने विश्व के अनेक देशों के साथ साथ भारत के लिए भी समस्याएं पैदा की हैं और मानवता के लिए संकट खड़ा करने में प्रमुख भूमिका अदा की है। यह कट्टरपंथी तत्व मज़हब के नाम पर लोगों को गुमराह कर अपने हितों के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं और मानवता के प्रति हिंसा का रास्ता अपनाने में भी संकोच नहीं करते। पाकिस्तान में कट्टरपंथी तत्वों ने अल्पसंख्यक लोगों के साथ जो किया वह किसी से छिपा नहीं है। इधर पिछले डेढ़ वर्षों से बंगलादेश भी पूर्णतः कट्टरपंथी तत्वों के नियंत्रण में है और शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद अन्तरिम प्रधानमंत्री बने मोहम्मद युनूस ने जमायते इस्लामी के साथ मिलकर हिन्दू लोगों के प्रति कट्टरपंथी तत्वों के इस हिंसक रवैये को हवा देने का ही काम किया है। बंगलादेश में वैसे तो फरवरी में चुनाव प्रस्तावित हैं परंतु जिस तरह अवामी लीग पर चुनाव लड़ने में प्रतिबंध लगाया गया है और बीएनपी तथा जमाते इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दल ही चुनाव में भाग लेंगे,ऐसे में निकट भविष्य में भी बंगलादेश में कट्टरपंथी तत्वों पर किसी अंकुश लग सकने की कल्पना नहीं की जा सकती। अपने देश में भी कुछ ऐसे कट्टरपंथी तत्व सक्रिय हैं जो कभी वन्देमातरम गाने का विरोध करते हैं और मुस्लिम समाज को ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित करते हैं तो कभी हाल में ही हुए लाल किले पर विस्फोट में शामिल डाक्टरों का समर्थन करते दिखते हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मेरे हिन्दू समाज में भी कुछ ऐसे तत्व हैं जो हिन्दुत्व एवं सनातन के नाम पर कभी क्रिसमस पर हुड़दंग, वेलेन्टाइन डे पर लोगों के साथ अभद्रता जैसे घृणित काम करने में संलग्न दिखते हैं। मेरा मत है कि इस प्रकार की मानसिकता एवं कट्टरपंथी सोच किसी देश और वहां के लोगों का भला नहीं कर सकती है। इसके विपरीत इससे सामाजिक तनाव को ही बल मिलता है जो देश के विकास में एक बड़ा बाधक तत्व है।
समाज में बढ़ती जा रही असहिष्णुता भी एक चिन्ता का विषय है। यह बढ़ती असहिष्णुता समाज में व्याप्त कटुता एवं तनाव की बड़ी वजह है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र या मस्जिद के सामने निकलते हिंदू मतावलंबी लोगों के जुलूस पर हमला एवं पथराव की घटनाएं दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं जो समाज के एक वर्ग में दूसरे के प्रति नफरत एवं असहिष्णुता की ही एक मिसाल है। इस बढ़ती असहिष्णुता का एक बड़ा कारण अपने मजहब को ही सर्वोच्च मानने और अन्य पंथों के लिए हेय भावना में निहित है। राष्ट्र से भी ऊपर पंथ और मजहब को रखने की इस सोच से निजात पाए बिना और सभी के प्रति सम्मान का भाव रखे बिना समाज में भाईचारा बनाए रखा नहीं जा सकता।
हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हमें इस पर नाज भी होना चाहिए। आपातकाल के दिनों के अपवाद को छोड़कर जिस तरह अपने देश में बिना किसी हिंसा सत्ता परिवर्तन होते रहे हैं, वह अनेक देशों के लिए सीखने की बात और विश्व में एक मिसाल है। इधर कुछ वर्षों से जिस तरह देश के विपक्षी दलों ने नए नए बहाने एवं भ्रामक तथ्यों का सहारा लेकर जनादेश का अपमान किया है और देश के चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी कीचड़ उछालने का काम किया है, वह देश में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करने की एक साजिश ही कही जा सकती है। सच में देखा जाय तो यह भी असहिष्णुता की ही एक मिसाल है। देश के कुछ चुनिंदा राजनैतिक वर्चस्व वाले परिवार मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही यह सहन नहीं कर पा रहे हैं कि देश की सत्ता से लेकर अनेक राज्यों में कैसे सामान्य लोग भी सत्ता के शिखर तक पहुंच रहे है। विपक्ष इस बात से भी बहुत निराश है कि उसके द्वारा गढ़े गए झूठे प्रपंच एवं दुष्प्रचार भी काम नहीं आ रहे हैं। चौकीदार चोर से लेकर वोट चोरी के नए प्रपंच तथा श्री राम मंदिर के विरोध के साथ साथ जीएसटी एवं धारा 370 की समाप्ति तक पर देश को गुमराह करने की कोशिश के बावजूद विपक्ष जनता को विश्वास में लेने में असफल ही रहा है। कभी न्यायालय के निर्णय का विरोध तो कभी ईडी और सीबीआई की कार्यवाही पर सवाल विपक्ष की लाचारी और मानसिक दिवालियापन के ही सूचक कहे जा सकते। किसी न किसी झूठे आरोप के बहाने संसद की कार्यवाही को बाधित करने की विपक्ष की नीति ने देश में लोकतंत्र का मजाक उड़ाने एवं महत्वपूर्ण समय के साथ साथ जनता के पैसे की बरबादी को ही बल प्रदान किया है।
यह भी एक चिन्ता का विषय है कि देश के ही नहीं वरन विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विपक्षी नेताओं के द्वारा दुष्प्रचार की सभी सीमाएं पार करते हुए साम्प्रदायिक, विभाजनकारी एवं देश विरोधी जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यही नहीं राष्ट्र प्रथम की सोच पर चलने वाले और भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पर गर्व करने वाले राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों से करने में भी विपक्ष के नेताओं को संकोच नहीं होता। यह विपक्षी नेता संविधान की प्रति उसी तरह जेब में रखकर चलते हैं, जैसे कानून को न मानने वाला कानून अपनी जेब में रखने का दम्भ भरता है। संविधान की इतनी बात भी इनकी समझ के परे है कि लोकतंत्र का मतलब ही है विभिन्न विचारधाराओं के बीच जनता के द्वारा किसी एक का चुनाव। यह सभी विचारधाराएं और उनसे जुड़े संगठन और दल लोकतंत्र का ही एक हिस्सा हैं और जन समर्थन के बाद भी उनके लिए अपमानजनक एवं घृणित टिप्पणी करना लोकतंत्र का ही अपमान है।
मोदी सरकार के द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध जीरो टालरेंस की नीति एवं अनेक वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होकर निर्णायक प्रहार के आहवान के बावजूद विश्व में बढ़ती आतंकवादी घटनाएं सभी के लिए चिन्ता का विषय है। भारत एक लम्बे समय से आतंकवादी वारदातों का निशाना रहा है और पाकिस्तान के द्वारा प्रायोजित एवं संरक्षित आतंकवाद आज भी भारत के लिए सरदर्द बना हुआ है। पुलवामा हो या पहलगाम या यूपीए के समय मुम्बई आतंकी घटना सभी के पीछे आई एस आई और पाकिस्तान सेना के संरक्षण में सक्रिय आतंकी संगठनों का ही हाथ रहा है परन्तु कभी भी पाकिस्तान ने इसे स्वीकार नही किया। अभी पिछले नवंबर में ही जिस तरह लाल किले पर कार विस्फोट किया गया और उसी संदर्भ में जिस तरह फरीदाबाद के एक मेडिकल कालेज के कई डाक्टरों की संलिप्तता सामने आई, वह गम्भीर चिन्ता का विषय है। इससे भी गहन सोच का विषय है कि देश के किसी भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों के नेताओं के द्वारा इसकी भर्त्सना एवं निन्दा में कोई बयान नहीं दिया गया। आतंकवादी वारदातों और उनसे जुड़े संगठनों पर निर्णायक कार्यवाही के लिए देश के सभी राजनैतिक दलों और संगठनों को सरकार के साथ खुलकर खड़ा होना होगा। विपक्ष को सबूत मांगने और आतंकवादियों के मानवाधिकार की वकालत करने के स्थान पर देश की सुरक्षा एवं अखण्डता पर बल देना चाहिए।
हमें यह बात भी चिन्तित करती है कि देश में सत्ता में बैठे लोग देश की जनता के नागरिक अधिकारों के प्रति कब संवेदनशील होंगे। देश की प्रशासनिक मशीनरी अपने उत्तरदायित्वों के प्रति कब जवाबदेह होगी। वर्ष भर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जो अत्यधिक पीड़ादायक होती हैं और प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त लापरवाही, गैर जवाबदेही एवं भ्रष्टाचार को उजागर करती हैं। हमें हर बार एक ही जवाब सुनने की आदत पड़ गई है कि जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्यवाही होगी लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है। कभी कफ सीरप पीकर बच्चों की मौत होती है तो कभी गन्दगी युक्त पानी पीने के कारण। कभी भ्रष्टाचार के कारण बनते पुल और इमारत गिर जाती है तो कभी रख रखाव में लापरवाही के कारण। पर्यावरण का क्षरण एक ऐसी समस्या है जो समय बीतने के साथ निरन्तर भीषण होती जा रही है। नवंबर आते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य देश की राजधानी दिल्ली सहित भीषण धुंध और खतरनाक एक्यूआई स्तर की चपेट में आ जाते है और सर्दी भर लगभग एक ही हालात बने रहते हैं। सरकारों के पास कुछ तात्कालिक कदम उठाने के अलावा कोई दीर्घकालीन स्थाई समाधान उपलब्ध नहीं होता। यह भी लापरवाही की पराकाष्ठा ही है कि लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन से जुड़े मुद्दों पर भी सरकारों का रवैया इतना सतही एवं असंवेदनशील है।
मेरी नजर इसी बात पर रहेगी कि नव वर्ष 2026 में इन हालातों में कोई बदलाव आयेगा या नहीं। हम नव वर्ष के सभी के लिए मंगलकारक होने की उम्मीद तभी कर सकते हैं जब वैश्विक शान्ति की तरफ दुनिया बढ़े और विश्व में बढ़ते तनाव में कमी आए। विश्व में बढ़ते कट्टरवादी विचारों पर अंकुश लगे और लोगों में असहिष्णुता के स्थान पर सभी का सम्मान एवं सहयोग की भावना को बल मिले। आतंकवाद पर सभी को एकजुट होकर उससे निपटने की नीति पर चलने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। सत्ता प्राप्ति के लिए लोकतंत्र को अपमानित करने के आचरण में बदलाव लाना होगा। सभी विचारधारा से जुड़े लोगों और संगठनों का सम्मान करते हुए उनसे नफरत की भावना से निजात पानी होगी। लोकतंत्र की सफलता तभी है जब विपरीत विचारधारा के लोग भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कर आगे बढ़े।हमें देश के संस्थानों एवं संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी एवं झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति का परित्याग करना होगा। सरकार को भी विपक्ष का सकारात्मक सहयोग लेने की नीति अपनानी चाहिए न कि विपक्ष को नजरंदाज और अपमानित करने की। सरकार को नागरिक हितों और उनके जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मसालों पर और अधिक संवेदनशीलता दिखानी होगी जिससे लोगों के नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित किया जा सके। ऐसा करके ही नव वर्ष को सभी के लिए शुभ एवं मंगलमय बना सकेंगे।

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