
आज का दिन हर सनातनी के लिए पुनः एक बार गौरव की अनुभूति का अवसर लेकर आया है। इन्दौर उच्च न्यायालय ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए धार भोजशाला को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण रूप से एक मन्दिर होने की बात स्वीकार कर ली। माननीय न्यायालय ने धार भोजशाला में श्रद्धालुओं को नियमित पूजा-पाठ करने के लिए अनुमति प्रदान किए जाने के साथ यह भी कहा कि धार भोजशाला का स्वरूप शिक्षा केंद्र का है।माननीय उच्च न्यायालय ने आज के अपने निर्णय में यह भी कहा कि धार भोजशाला भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के संरक्षण में रहेगी और दैनिक प्रबंधन के लिए सरकार के द्वारा व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। भोजशाला में अब तक जुमा के दिन नमाज अदा करने के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्षकार से नमाज के लिए किसी अन्य स्थान पर जगह उपलब्ध कराने हेतु सरकार से सम्पर्क करने के लिए भी कहा।
इस निर्णय के आने के बाद एक तरफ सनातन धर्म के अनुयायियों में अपार उत्साह और खुशी की लहर है, वहीं मुस्लिम पक्षकारों में निराशा है और वे इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहे हैं। उनको भरोसा है कि माननीय उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगाएगा और उनको न्याय प्रदान करेगा। असद्दुदीन ओवेसी ने भी फैसला आने के तुरंत बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन्दौर उच्च न्यायालय का यह फैसला भी बाबरी मस्जिद पर उच्चतम न्यायालय के द्वारा दिए गए फैसले जैसा ही है और उनको यकीन है कि उच्चतम न्यायालय इसे निरस्त कर देगा। मेरा विचार है कि इन्दौर उच्च न्यायालय के द्वारा धार भोजशाला को मन्दिर मानते हुए दिया गया यह निर्णय बहुत साफ सुथरा और ऐतिहासिक सबूतों और साक्ष्यों पर आधारित है जिसका आधार भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के द्वारा न्यायालय के आदेश पर 98 दिनों तक किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट है। श्रीराम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्चतम न्यायालय ने मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के कोई सबूत न मिलने और देश के 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था का सम्मान कर अपना निर्णय देने की बात कही थी। इसके विपरीत धार भोजशाला पर आए आज के निर्णय में आस्था के सम्मान जैसी कोई बात नहीं कही है और इस बात पर जोर दिया है कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट और अन्य स्त्रोतों के आधार पर इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं कि यह स्थान 11वीं शताब्दी में महाराज भोज के द्वारा निर्मित मन्दिर एव॔ शिक्षा केंद्र है। इतने स्पष्ट और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर दिए गए निर्णय पर उच्चतम न्यायालय से भी मुस्लिम पक्षकारों को कोई राहत मिलने की उम्मीद कम ही है।
हकीकत यह है कि धार भोजशाला पर यह विवाद 1952 से ही चल रहा था। इससे पहले किसी भी न्यायालय ने इस पर दायर याचिकाओं को सुनने योग्य भी नहीं समझा। 2003 में विवाद अधिक बढ़ने पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने शान्तिपूर्ण समाधान की पहल करते हुए दोनों पक्षों को निर्देश देते हुए एक आदेश पारित किया। इस आदेश के तहत हिन्दुओं को बसंत पंचमी और मंगलवार को नियत समय में मन्दिर में पूजा-पाठ की इजाजत दी गई तो मुसलमानों को भी जुमा की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई। यह पूर्ण रुप से मुस्लिम तुष्टीकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता की ही एक मिसाल थी कि हिन्दुओं के पक्ष में सभी साक्ष्य और ऐतिहासिक प्रमाण होने के बावजूद मुस्लिम समुदाय को भोजशाला में प्रवेश की अनुमति देकर मुस्लिम समुदाय को प्रशय दिया गया। इसके बाद अनेक बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि बसंत पंचमी जुमा के दिन ही पड़ी। अन्ततः 2022 में हिन्दुओं की तरफ से दायर याचिका में धार भोजशाला को मन्दिर स्वीकार करते हुए नित्य पूजा-पाठ की अनुमति देने और परिसर में नमाज पढ़ने पर रोक लगाने की मांग की गई। इसके बाद ही उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण को स्थल के सर्वेक्षण का आदेश पारित किया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने 98 दिन गहन सर्वेक्षण करके रिपोर्ट न्यायालय को सीलबंद लिफाफे में सौंपी। अन्ततः अप्रैल माह से उच्च न्यायालय, इन्दौर ने एक माह से अधिक लगातार सुनवाई कर 12 मई को फैसला सुरक्षित कर लिया जो आज एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में सामने आया।
मेरा स्पष्ट मत है कि मोदी जी के 2014 में सरकार बनाने के बाद से जिस तरह हिन्दुत्व की अलख देश में जगी है और छद्म धर्मनिरपेक्षता का असली चेहरा उजागर हुआ है, उसके नतीजे लगातार सामने आ रहे हैं। मोदी सरकार वैसे भी प्रखर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नीति की समर्थक है और भारत राष्ट्र की संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने, संरक्षित करने तथा उसकी गरिमा को पुनः बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। श्री राम लला मन्दिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ, महाकाल, सोमनाथ और केदारनाथ का कायाकल्प इस बात के सजीव प्रमाण हैं। हिन्दुत्व के जागरण और छद्म पंथनिरपेक्षता से सामान्य हिन्दू जनमानस के मोहभंग ने देश की न्यायपालिका को भी बिना किसी झिझक और संकोच सत्य के पक्ष में फैसला देने के लिए मजबूर किया है।पंथनिरपेक्षता के नाम पर सनातन हिन्दुओं के साथ होने वाले हर भेदभावपूर्ण आचरण और अन्याय के विरुद्ध उठ रही आवाज को नजरंदाज करना अब न्यायपालिका के लिए भी संभव नहीं रहा है। यही कारण है कि इन मुस्लिम परस्त और छद्म पंथनिरपेक्ष ताकतों को बार बार न्यायालय से भी निराशा ही हाथ लगी है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि काशी में ज्ञानवापी और मथुरा के विवाद पर भी देर-सबेर फैसला हिन्दुओं के ही पक्ष में आना है क्योंकि सर्वेक्षण और सभी साक्ष्य चीख चीख कर यह कह रहे हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं ने जबरन सनातन हिन्दू ढांचे को क्षतिग्रस्त कर मस्जिद का निर्माण कराया है। अन्त में हम वकील हरि शंकर जैन और विष्णु कुमार जैन के प्रति भी नतमस्तक हैं जो निरंतर सनातन हिन्दुत्व की सेवा तथा हिन्दुओं को उनकी विरासत वापस कराने के लिए संकल्पबद्ध और प्रयासरत हैं।सत्य सनातन की जय।



