लेख

“राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) सेमेस्टर प्रणाली: पाठ्यक्रम की जटिलताएं और शिक्षक-विद्यार्थी के मध्य संवाद व समन्वय पर संकट”

डॉ प्रमोद कुमार

“शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद, समन्वय और व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है।”
“यदि शिक्षा की जड़ें गहरी होंगी तो ही उसका वृक्ष ज्ञान, कौशल और मानवीयता के फल देगा।”

भारत में शिक्षा हमेशा से केवल ज्ञान प्राप्ति का साधन नहीं रही, बल्कि राष्ट्र के चरित्र, संस्कृति और समाज के निर्माण की आधारशिला रही है। स्वतंत्रता के बाद से ही अनेक शिक्षा आयोगों और नीतियों के माध्यम से यह प्रयास होता रहा कि शिक्षा अधिक व्यावहारिक, वैज्ञानिक और समयानुकूल हो सके। इसी कड़ी में वर्ष 2020 में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति (NEP-2020) लागू की, जिसे स्वतंत्र भारत की तीसरी और सबसे व्यापक शिक्षा नीति कहा गया। इस नीति का उद्देश्य भारत को “वैश्विक ज्ञान महाशक्ति” बनाना और शिक्षा प्रणाली को अधिक कौशल आधारित, बहुआयामी तथा व्यवहारिक बनाना था।

NEP-2020 में कई नवीन प्रावधान किए गए, जैसे बहुभाषी शिक्षा, मातृभाषा को प्राथमिकता, स्किल-आधारित कोर्सेज, क्रेडिट ट्रांसफर सिस्टम, रिसर्च-ओरिएंटेड लर्निंग और फ्लेक्सिबल पाठ्यक्रम। इन्हीं प्रावधानों में एक प्रमुख परिवर्तन था सेमेस्टर प्रणाली का विस्तार, जिसमें वार्षिक प्रणाली की जगह छह-छह माह की अवधि में परीक्षा और मूल्यांकन की व्यवस्था की गई। हालाँकि, इस 6 माह की सेमेस्टर प्रणाली ने एक नई बहस को जन्म दिया है। जहाँ एक ओर समर्थकों का कहना है कि यह विद्यार्थियों को निरंतर अध्ययन के लिए प्रेरित करती है और उन्हें वैश्विक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ती है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का मानना है कि इससे सिलेबस का गणित बिगड़ गया है और शिक्षक-विद्यार्थी समन्वय कमजोर हुआ है।

नई शिक्षा नीति (NEP-2020) भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लेकर आई। इसका उद्देश्य शिक्षा को आधुनिक, कौशल-आधारित, बहुआयामी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना था। इस नीति ने कई सकारात्मक प्रावधान किए, जैसे बहुभाषी शिक्षा, लचीला पाठ्यक्रम, क्रेडिट ट्रांसफर और प्रोजेक्ट-आधारित अधिगम। किंतु इसका सबसे चर्चित और विवादित पहलू सेमेस्टर प्रणाली (6 माह का मूल्यांकन चक्र) रहा है। वार्षिक प्रणाली में विद्यार्थियों को पूरे वर्ष गहन अध्ययन और शिक्षक से संवाद का पर्याप्त अवसर मिलता था। वहीं सेमेस्टर प्रणाली में केवल 4–5 माह का वास्तविक समय शिक्षण के लिए मिलता है, जिससे सिलेबस का गणित बिगड़ जाता है। अध्यापक को जल्दी-जल्दी पाठ्यक्रम पूरा करना पड़ता है और विद्यार्थी सतही तैयारी करके परीक्षा पास करने पर केंद्रित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, चर्चा, आलोचनात्मक सोच और शोध की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

शिक्षक-विद्यार्थी समन्वय भी प्रभावित हुआ है। पहले जहाँ शिक्षक को विद्यार्थियों को समझने और मार्गदर्शन देने का पर्याप्त समय मिलता था, अब यह संबंध सतही रह गया है। लगातार परीक्षाओं और असाइनमेंट के दबाव में विद्यार्थी तनावग्रस्त रहते हैं, जबकि शिक्षकों पर भी बार-बार मूल्यांकन और प्रश्नपत्र तैयार करने का बोझ बढ़ गया है। हालाँकि सेमेस्टर प्रणाली की कुछ सकारात्मकताएँ भी हैं। यह विद्यार्थियों को निरंतर अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, अंतरराष्ट्रीय शिक्षा मानकों से मेल खाती है और आलस्य को कम करती है। लेकिन भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक और शैक्षणिक संदर्भों में यह प्रणाली पूरी तरह प्रभावी नहीं दिखती। ग्रामीण क्षेत्रों, संसाधन-विहीन संस्थानों और कमजोर विद्यार्थियों के लिए यह बोझिल साबित हो रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक है कि—
* सिलेबस को यथार्थवादी ढंग से विभाजित किया जाए।
* शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात सुधारा जाए ताकि संवाद बढ़े।
* प्रोजेक्ट और शोध को प्रोत्साहित किया जाए, लेकिन परीक्षा का दबाव घटाया जाए।
* सेमेस्टर प्रणाली में लचीलापन रखा जाए ताकि हर विषय और स्तर पर एक जैसा ढाँचा न थोपा जाए।
यह लेख इसी विमर्श पर आधारित है—सेमेस्टर प्रणाली ने किस प्रकार सिलेबस की संरचना, अध्यापन की गुणवत्ता, विद्यार्थियों की समझ और शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों को प्रभावित किया है।

1. सेमेस्टर प्रणाली का उद्भव और पृष्ठभूमि:

भारत में पारंपरिक रूप से वार्षिक परीक्षा प्रणाली प्रचलित रही है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में एक शैक्षणिक वर्ष लगभग 10–12 महीनों का होता था, जिसमें नियमित शिक्षण, सह-पाठ्यचर्या गतिविधियाँ, प्रैक्टिकल, असाइनमेंट और अंत में वार्षिक परीक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों का मूल्यांकन किया जाता था।
सन् 2000 के दशक में जब वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मानकों की चर्चा बढ़ी, तब यह कहा गया कि भारत की वार्षिक प्रणाली अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाती। विश्व के कई देशों में सेमेस्टर प्रणाली प्रचलित थी, जहाँ विद्यार्थियों का मूल्यांकन साल में दो बार किया जाता था।
इसके बाद उच्च शिक्षा में धीरे-धीरे सेमेस्टर प्रणाली लागू की जाने लगी। UGC (University Grants Commission) और AICTE (All India Council for Technical Education) ने तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर प्रणाली को अनिवार्य कर दिया। NEP-2020 ने इस प्रवृत्ति को और अधिक व्यापक बनाया और अब विद्यालय स्तर पर भी इसे अपनाने पर बल दिया जा रहा है।

2. सिलेबस का गणित: छह माह में पाठ्यक्रम पूरा करने की चुनौती:

सेमेस्टर प्रणाली का सबसे बड़ा प्रभाव सिलेबस के प्रबंधन पर पड़ा है।
* समय की कमी: जहाँ पहले एक विषय को पढ़ाने के लिए शिक्षक के पास लगभग 10–11 माह होते थे, वहीं अब केवल 4–5 माह का प्रभावी समय मिलता है (क्योंकि छुट्टियाँ, परीक्षाएँ और अन्य गतिविधियाँ मिलाकर वास्तविक शिक्षण समय घट जाता है)।
* सतही अध्ययन: अध्यापक और विद्यार्थी दोनों को तेजी से पाठ्यक्रम पूरा करने की चिंता रहती है। परिणामस्वरूप, गहन अध्ययन, चर्चा, बहस और रचनात्मक गतिविधियों के लिए समय नहीं बच पाता।
* पाठ्यक्रम विभाजन का संकट: कई विषय ऐसे हैं जिनकी संकल्पनाएँ आपस में जुड़ी होती हैं। उन्हें जबरदस्ती छह माह के खंडों में बाँटने से विषय की निरंतरता और तार्किकता प्रभावित होती है।
* प्रोजेक्ट और रिसर्च के लिए समयाभाव: NEP-2020 ने रिसर्च, प्रोजेक्ट व प्रायोगिक अधिगम पर जोर दिया है, लेकिन सेमेस्टर प्रणाली में इतने कम समय में इन गतिविधियों को उचित स्थान नहीं मिल पाता।

3. शिक्षक-विद्यार्थी समन्वय पर प्रभाव:

शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संबंध केवल ज्ञान देने-लेने का नहीं होता, बल्कि यह एक संवाद, मार्गदर्शन और प्रेरणा का संबंध है। वार्षिक प्रणाली में अध्यापक को विद्यार्थियों को समझने, उनके बौद्धिक स्तर का आकलन करने और उन्हें व्यक्तिगत मार्गदर्शन देने का पर्याप्त समय मिलता था। लेकिन सेमेस्टर प्रणाली में—
अध्यापक पर दबाव बढ़ जाता है कि वे कम समय में पूरा सिलेबस पढ़ाएँ।
विद्यार्थियों पर दबाव रहता है कि वे लगातार असाइनमेंट, आंतरिक परीक्षा और प्रोजेक्ट पूरा करें।
संवाद का अवसर घट जाता है, क्योंकि समय की कमी के कारण अध्यापक और विद्यार्थी गहन चर्चा नहीं कर पाते।
व्यक्तिगत मार्गदर्शन संभव नहीं हो पाता, जिससे विद्यार्थियों की समस्याएँ अनदेखी रह जाती हैं।
इससे शिक्षा का मानवीय पक्ष प्रभावित हो रहा है और शिक्षा एक यांत्रिक प्रक्रिया में बदलती जा रही है।

4. मूल्यांकन और परीक्षा: बार-बार की तैयारी का बोझ:

सेमेस्टर प्रणाली में साल में दो बार परीक्षा होती है। इसका परिणाम है:
* विद्यार्थियों पर लगातार तैयारी और परीक्षा का मानसिक दबाव।
* गहराई से पढ़ने की बजाय “परीक्षा पास करने” की प्रवृत्ति का बढ़ना।
* शोध, रचनात्मक कार्य और अतिरिक्त गतिविधियों के लिए समय की कमी।
* शिक्षकों पर बार-बार प्रश्नपत्र तैयार करने और मूल्यांकन का अतिरिक्त बोझ।

5. वार्षिक बनाम सेमेस्टर प्रणाली की तुलनात्मक:

समीक्षा पहलू वार्षिक प्रणाली
सेमेस्टर प्रणाली की अवधि लगभग 10-12 माह
4-5 माह सिलेबस गहन और विस्तृत अध्ययन
सतही और जल्दबाज़ी में पूरा किया गया मूल्यांकन
साल में एक बार साल में दो बार शिक्षक-विद्यार्थी संबंध स्थायी, गहरा सतही,
समयाभाव के कारण कमजोर विद्यार्थी पर दबाव परीक्षा
एक बार, कम दबाव लगातार दबाव शोध/प्रोजेक्ट
पर्याप्त समय समय की कमी इत्यादि।

6. NEP-2020 की सकारात्मकताएँ और सीमाएँ:

यह स्वीकार करना होगा कि NEP-2020 का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली को अधिक समान अवसरयुक्त, बहुआयामी और व्यावहारिक बनाना था। इसके तहत—
विद्यार्थियों को अधिक विकल्प मिलते हैं।
विषयों के बीच लचीलापन आया है।
क्रेडिट-बेस्ड सिस्टम से विद्यार्थियों को कहीं भी पढ़ाई पूरी करने की सुविधा है।
निरंतर मूल्यांकन से आलस्य और आखिरी समय की पढ़ाई की प्रवृत्ति घटती है।

लेकिन इसकी सीमाएँ भी हैं:
भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता के लिए एक समान सेमेस्टर प्रणाली उपयुक्त नहीं।
ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में यह व्यवस्था ज्यादा कठिनाई पैदा करती है।
शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, अवसंरचना और संसाधनों की कमी में यह प्रणाली शिक्षा की गुणवत्ता घटा रही है।

7. विद्यार्थियों पर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दबाव:

* लगातार परीक्षा का तनाव – मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित।

* प्रतिस्पर्धा में वृद्धि – विद्यार्थी सहयोगी भाव भूलकर केवल अंकों पर केंद्रित।
* असमानता – आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थी ज्यादा प्रभावित होते हैं।
* भविष्य की चिंता – सतही ज्ञान से रोजगार और शोध दोनों पर असर।

8. शिक्षकों के लिए चुनौतियाँ

हर छह माह में सिलेबस पूरा करने का दबाव।
मूल्यांकन और आंतरिक परीक्षाओं का अतिरिक्त बोझ।
व्यक्तिगत मार्गदर्शन और शोध के लिए समय का अभाव।
रचनात्मक अध्यापन के अवसर कम होना।

9. संभावित समाधान और सुधार की राह

* लचीली सेमेस्टर प्रणाली – सभी विषयों और स्तरों पर एक ही ढाँचा थोपने की बजाय लचीलापन।
* सिलेबस का यथार्थवादी विभाजन – पाठ्यक्रम को समय और विषय की आवश्यकता अनुसार बाँटना।
* शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात सुधारना – ताकि संवाद और मार्गदर्शन संभव हो।
* ऑनलाइन-ऑफलाइन मिश्रित शिक्षा – समय बचाने और संसाधन उपलब्ध कराने के लिए।
* प्रोजेक्ट और शोध को प्रोत्साहन – लेकिन परीक्षा भार घटाकर।
* स्थानीय संदर्भों का समावेश – ताकि शिक्षा केवल अंतरराष्ट्रीय मानकों तक सीमित न रहे।

NEP-2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली का एक साहसिक प्रयास है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को आधुनिक, लचीला और कौशल-आधारित बनाना है। किंतु इसकी सेमेस्टर प्रणाली ने व्यावहारिक स्तर पर अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं। छह-छह माह में सिलेबस पूरा करने की जल्दबाजी ने शिक्षा की गहराई घटा दी है, अध्यापक और विद्यार्थियों के बीच संवाद कम कर दिया है, और शिक्षा को एक यांत्रिक प्रक्रिया में बदल दिया है। यदि शिक्षा केवल “पाठ्यक्रम पूरा करने” और “परीक्षा पास करने” तक सीमित हो जाएगी, तो NEP-2020 का वास्तविक उद्देश्य—समग्र व्यक्तित्व विकास और वैश्विक स्तर पर भारतीय शिक्षा की सशक्त पहचान—अधूरा रह जाएगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) का उद्देश्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अधिक आधुनिक, लचीला और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना था। किंतु इसकी सेमेस्टर प्रणाली ने व्यवहारिक स्तर पर कई गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। छह-छह माह की परीक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या पाठ्यक्रम की जटिलताओं की है। सीमित समय में सिलेबस पूरा करने की मजबूरी के कारण अध्यापन सतही होता जा रहा है, गहन अध्ययन, आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। दूसरी बड़ी कमी शिक्षक और विद्यार्थियों के मध्य संवाद और समन्वय पर संकट के रूप में सामने आई है। पहले वार्षिक प्रणाली में अध्यापक विद्यार्थियों को समझने, मार्गदर्शन देने और व्यक्तिगत संवाद कायम करने के लिए पर्याप्त समय पाते थे। अब अध्यापक और विद्यार्थी दोनों लगातार असाइनमेंट, आंतरिक परीक्षाओं और परिणामों की भागदौड़ में उलझे रहते हैं। इसका परिणाम यह है कि शिक्षा का मानवीय और मार्गदर्शक पक्ष कमजोर हो गया है। लगातार मूल्यांकन से विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव बढ़ा है, जबकि अध्यापकों पर बार-बार प्रश्नपत्र निर्माण और मूल्यांकन का अतिरिक्त बोझ आ पड़ा है। ग्रामीण और संसाधन-विहीन संस्थानों में यह समस्या और विकराल है, क्योंकि वहाँ न तो पर्याप्त समय मिलता है, न ही जरूरी संसाधन।
इस प्रकार स्पष्ट है कि सेमेस्टर प्रणाली ने शिक्षा की गहराई घटाई है और अध्यापक-विद्यार्थी संबंधों की आत्मीयता कमजोर कर दी है। यदि शिक्षा केवल “पाठ्यक्रम पूरा करने” और “परीक्षा पास करने” तक सीमित हो जाएगी, तो NEP-2020 का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि इस व्यवस्था को लचीला, यथार्थवादी और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए, ताकि शिक्षा पुनः समाज और राष्ट्र निर्माण का वास्तविक साधन बन सके। NEP-2020 का उद्देश्य शिक्षा को सशक्त और प्रासंगिक बनाना था, किंतु सेमेस्टर प्रणाली ने कई व्यवहारिक कठिनाइयाँ खड़ी कर दी हैं। यदि इसे भारतीय परिस्थितियों और संसाधनों के अनुसार संशोधित न किया गया, तो यह शिक्षा की गुणवत्ता और मानवीय पक्ष दोनों को नुकसान पहुँचा सकती है। आवश्यकता है संतुलन की—जहाँ आधुनिकता और वैश्विक मानक भी बने रहें और शिक्षक-विद्यार्थी का मानवीय संवाद भी संरक्षित रहे। अतः आवश्यकता है कि सेमेस्टर प्रणाली को लचीला, यथार्थवादी और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए। तभी यह प्रणाली विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकेगी और शिक्षा वास्तव में समाज व राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन पाएगी।

“नीति का उद्देश्य तभी सार्थक है, जब वह अध्यापक और विद्यार्थी के बीच विश्वास और समझ का सेतु बने।”

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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