अखण्ड, समृद्ध, सशक्त, विकसित एवं जाति-मुक्त भारत के स्वप्न की राह में जातिगत आरक्षण की वास्तविकता का अंतर्विरोध”
डॉ प्रमोद कुमार

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी सभ्यता हजारों वर्षों पुरानी है और जिसकी सांस्कृतिक आत्मा “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” तथा “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” जैसे सार्वभौमिक मानवीय आदर्शों से प्रेरित रही है। आधुनिक भारत के संविधान ने भी समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय को राष्ट्र-निर्माण के मूल स्तंभों के रूप में स्वीकार किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक ऐसे भारत की कल्पना की गई जो जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्त हो तथा प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्रदान करे। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संविधान में आरक्षण व्यवस्था को एक अस्थायी उपाय के रूप में स्वीकार किया गया ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अवसर मिल सकें।
किन्तु सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या जातिगत आरक्षण अपनी मूल भावना के अनुरूप सामाजिक न्याय का साधन बना हुआ है अथवा यह स्वयं जातीय पहचान को स्थायी बनाकर एक नए प्रकार के सामाजिक अंतर्विरोध को जन्म दे रहा है? क्या जातिगत आरक्षण अखण्ड, समृद्ध, सशक्त, विकसित एवं जाति-मुक्त भारत की परिकल्पना को सुदृढ़ करता है या उसके मार्ग में वैचारिक और व्यवहारिक बाधाएँ उत्पन्न करता है? यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक, नैतिक और राष्ट्रीय महत्व का विषय है।
आरक्षण व्यवस्था का मूल उद्देश्य उन समुदायों को अवसर प्रदान करना था जो सदियों तक सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता, शैक्षिक वंचना और आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार रहे। यह उद्देश्य निस्संदेह मानवीय और न्यायपूर्ण था। किसी भी सभ्य समाज का दायित्व है कि वह ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का प्रयास करे। इसी दृष्टि से आरक्षण व्यवस्था को सामाजिक न्याय के एक उपकरण के रूप में देखा गया। प्रारंभिक दशकों में इस नीति ने अनेक परिवारों को शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तथा एक नए मध्यवर्ग का निर्माण किया। अनेक ऐसे समुदाय, जो कभी सार्वजनिक जीवन में प्रतिनिधित्व से वंचित थे, उन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में स्थान मिला।
फिर भी किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल उसके उद्देश्यों से नहीं बल्कि उसके दीर्घकालिक परिणामों से भी किया जाता है। जब कोई व्यवस्था लंबे समय तक चलती है तो उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव सामने आते हैं। जातिगत आरक्षण के संदर्भ में सबसे बड़ा अंतर्विरोध यह दिखाई देता है कि जिस जाति-आधारित असमानता को समाप्त करने के लिए इसे लागू किया गया था, वही जाति आज भी राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक पहचान का केंद्रीय आधार बनी हुई है। नागरिक के रूप में व्यक्ति की पहचान से अधिक महत्व उसकी जातिगत पहचान को मिलने लगता है। परिणामस्वरूप जाति के क्षरण के बजाय उसका पुनर्सशक्तीकरण होता दिखाई देता है।
मानव एकता और सामाजिक समरसता का आधार यह है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता, चरित्र, परिश्रम और मानवीय गुणों के आधार पर देखा जाए, न कि जन्म से प्राप्त पहचान के आधार पर। किंतु जब सार्वजनिक नीतियाँ जन्म-आधारित वर्गीकरण पर आधारित होती हैं तो समाज में यह संदेश जाता है कि जाति अब भी एक निर्णायक सामाजिक सत्य है। इससे नई पीढ़ियाँ भी स्वयं को पहले किसी जाति का सदस्य और बाद में राष्ट्र का नागरिक मानने लगती हैं। इस प्रकार सामाजिक चेतना में जाति का पुनरुत्पादन होता रहता है।
जातिगत आरक्षण के आलोचकों का एक प्रमुख तर्क यह है कि यह व्यवस्था समान अवसर के सिद्धांत और समान परिणाम के प्रयास के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाई है। एक ओर संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, दूसरी ओर आरक्षण जन्म के आधार पर विशेष अवसर प्रदान करता है। इस स्थिति में अनेक लोग इसे संवैधानिक समानता और व्यवहारिक असमानता के बीच एक विरोधाभास के रूप में देखते हैं। यद्यपि समर्थक इसे ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई का साधन मानते हैं, परंतु आलोचक प्रश्न उठाते हैं कि क्या वर्तमान पीढ़ी को अतीत के अपराधों या पीड़ाओं के आधार पर स्थायी रूप से वर्गीकृत करना न्यायसंगत है?
आरक्षण का दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में दिखाई देता है। समय के साथ जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं रही बल्कि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का माध्यम बन गई। अनेक राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए जातीय समूहों को संगठित करते हैं। परिणामस्वरूप जातिगत चेतना कमजोर होने के बजाय और अधिक सशक्त होती है। विभिन्न समुदाय स्वयं को पिछड़ा सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा में लग जाते हैं क्योंकि पिछड़ेपन की मान्यता से आरक्षण और अन्य सुविधाएँ प्राप्त हो सकती हैं। यह प्रवृत्ति सामाजिक प्रगति के बजाय राजनीतिक लाभ की संस्कृति को बढ़ावा देती है।
समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण केवल अवसरों के वितरण से नहीं बल्कि उत्कृष्टता, नवाचार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से भी होता है। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में राष्ट्रों की सफलता ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और कौशल पर निर्भर करती है। ऐसे में यह बहस स्वाभाविक है कि क्या दीर्घकाल तक चलने वाली जातिगत आरक्षण व्यवस्था योग्यता-आधारित प्रणाली को प्रभावित करती है। यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि आरक्षण प्राप्त व्यक्ति कम योग्य होते हैं, क्योंकि अनेक प्रतिभाशाली लोग भी आरक्षण का लाभ लेते हैं, फिर भी चयन प्रक्रिया में जाति को एक निर्णायक मानदंड बनाने से योग्यता और अवसर के संबंध में विवाद उत्पन्न होते हैं। यह विवाद स्वयं सामाजिक तनाव का कारण बनता है।
मानव प्रगति का आधार आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और प्रतिस्पर्धा की स्वस्थ भावना होती है। यदि किसी समुदाय की उन्नति केवल सरकारी संरक्षण पर निर्भर हो जाए तो दीर्घकाल में यह मानसिक निर्भरता को जन्म दे सकती है। इसलिए कुछ विचारक मानते हैं कि सामाजिक न्याय की नीतियों का लक्ष्य समुदायों को स्थायी रूप से लाभार्थी बनाए रखना नहीं बल्कि उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाना होना चाहिए जहाँ वे बिना विशेष संरक्षण के भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। इस दृष्टि से आरक्षण की समय-सीमा, समीक्षा और प्रभावशीलता पर नियमित विचार आवश्यक है।
हालाँकि इस विमर्श का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत में सामाजिक असमानताएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी अनेक क्षेत्रों में जाति के आधार पर भेदभाव, सामाजिक दूरी और अवसरों की विषमता देखी जा सकती है। ग्रामीण भारत के अनेक हिस्सों में शिक्षा, भूमि स्वामित्व, सामाजिक प्रतिष्ठा और संसाधनों तक पहुँच में असमानताएँ मौजूद हैं। इसलिए यह कहना भी अतिशयोक्ति होगी कि आरक्षण की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। यही कारण है कि इस विषय पर कोई भी निष्कर्ष सरल नहीं हो सकता।
वास्तविक समस्या आरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच नहीं बल्कि आरक्षण के स्वरूप और उसके क्रियान्वयन के बीच है। यदि सामाजिक पिछड़ापन मुख्यतः आर्थिक, शैक्षिक और भौगोलिक कारणों से उत्पन्न हो रहा है, तो केवल जाति को आधार बनाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आज ऐसे अनेक परिवार हैं जो आरक्षित वर्गों में होने के बावजूद आर्थिक और शैक्षिक रूप से समृद्ध हैं, जबकि अनेक सामान्य वर्ग के परिवार अत्यंत गरीब और वंचित हैं। इस स्थिति में केवल जाति-आधारित दृष्टिकोण सामाजिक न्याय की व्यापक अवधारणा को सीमित कर देता है।
जाति-मुक्त भारत की कल्पना तभी साकार हो सकती है जब सार्वजनिक नीतियाँ नागरिकों के बीच साझा राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करें। यदि समाज का प्रत्येक वर्ग स्वयं को किसी विशेष जातीय समूह के रूप में देखने लगे और राज्य भी उसी आधार पर नीतियाँ बनाए, तो जातीय चेतना का क्षय कठिन हो जाता है। इसलिए अनेक विद्वान सुझाव देते हैं कि आरक्षण और कल्याणकारी नीतियों को धीरे-धीरे शिक्षा, आय, संपत्ति, भौगोलिक वंचना और सामाजिक अवसरों जैसे बहुआयामी मानकों से जोड़ना चाहिए।
अखंड भारत का अर्थ केवल भौगोलिक एकता नहीं बल्कि भावनात्मक और सामाजिक एकता भी है। जब समाज के विभिन्न वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा, असंतोष और परस्पर अविश्वास बढ़ता है, तब राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है। आरक्षण के प्रश्न पर होने वाले विवाद कभी-कभी इसी प्रकार की मानसिक दूरी को जन्म देते हैं। अतः आवश्यक है कि इस विषय पर भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टिकोण के बजाय तर्कसंगत, संवेदनशील और तथ्यपरक विमर्श किया जाए।
सशक्त भारत का निर्माण ऐसे नागरिकों से होता है जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग हों। सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक होने चाहिए। यदि कोई नीति सामाजिक न्याय प्रदान करती है किंतु सामाजिक समरसता को कमजोर करती है, तो उसमें सुधार की आवश्यकता है। इसी प्रकार यदि कोई नीति समरसता की बात करती है किंतु ऐतिहासिक अन्याय की उपेक्षा करती है, तो वह भी अधूरी है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि जातिगत आरक्षण का प्रश्न केवल समर्थन या विरोध का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की व्यापक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इस व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को अवसर प्रदान किए हैं, यह उसका महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही यह भी सत्य है कि दीर्घकाल में इसने जातीय पहचान को सार्वजनिक जीवन में बनाए रखने का कार्य भी किया है, जो जाति-मुक्त समाज की परिकल्पना के साथ एक अंतर्विरोध प्रस्तुत करता है।
अखंड, समृद्ध, सशक्त, विकसित एवं जाति-मुक्त भारत का स्वप्न तभी साकार हो सकता है जब सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। भविष्य की नीतियों का लक्ष्य ऐसा समाज होना चाहिए जहाँ किसी व्यक्ति की प्रगति उसकी जाति से नहीं बल्कि उसकी क्षमता, शिक्षा, परिश्रम और अवसरों से निर्धारित हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी समुदाय ऐतिहासिक या वर्तमान वंचनाओं के कारण पीछे न रह जाए। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को एक ऐसे राष्ट्र की ओर अग्रसर कर सकता है जहाँ सामाजिक न्याय, मानवीय एकता, राष्ट्रीय समरसता और मानव प्रगति एक-दूसरे के पूरक बन सकें, न कि परस्पर विरोधी। इसलिए मानव केंद्रित राष्ट्रवादी अखण्ड समृद्ध सशक्त विकसित भारत का स्वप्न सिर्फ स्वप्न न रहकर हकीकत में बदल सके और भारत पुनः अपने विश्व गुरु ग़ौरव एवं सोने की चिड़िया वाली छवि को प्राप्त कर सके।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



