लेख साहित्य

कभी तुम भी सुनो, अपनी आत्मा के मन की बात – गिरि

विश्वगुरु शंकराचार्य दसनाम गोस्वामी समाज (पंजीकृत 751) के संस्थापक, संरक्षक राम निवास गिरि गोस्वामी ने बताया कि बुद्धि से पैदल होकर इंसान मानवता, सामाजिकता एवं राष्ट्रीयता के विपरीत अमानवीय एवं ग़द्दारी से उतपन्न पशुत्व को ही सफलता समझने की भूल करते हुए आगे बढ़ रहा है, यही कलयुग की विचारधारा विनाश का सूचक है।

धर्मी विधर्मी बनने से नहीं झिझक रहे, इंसान हैवान बनने से नहीं झिझक रहे, सामाजिक राजनैतिक होने से नहीं झिझक रहे, पर्दे की आबरू वेपर्दा होकर से नहीं झिझक रहे, न्याय करने बाले अन्याय करने से नहीं झिझक रहे, शिक्षा के प्रेरणास्रोत अपराध के प्रेरणाश्रोत होने से नहीं झिझक रहे, पूज्य एवं आदरणीय को अनाथालय एवम वृद्धाश्रम भेजने से नहीं झिझक रहे, प्रकृति एवम मानव का जीवन भर संरक्षण करने बाले जीव जंतुओं की हत्या से भी कलयुगी मनुष्य नहीं झिझक रहे, शासक जनता एवं राष्ट्र की भलाई से पहले खुद की तिजोरी भरने से नहीं झिझक रहे, यही तो कलयुग है, राम राज्य लाने के लिए तो स्वयं मर्यादित होकर प्रभु श्री राम के मार्ग का अनुगमन करना होगा ।

आओ इंसानियत की ओर लौटने के लिए प्रयास करें, अपने भले के लिए दूसरों के साथ गलत व्यवहार करना बंद करने के प्रयास करें।

पशु और हैवानों की श्रेणी में नहीं होना चाहते तो इंसान को इंसानियत युक्त व्यवहार करना ही होगा, अन्यथा तो समझते रहो खुद को इंसान लेकिन हो नहीं सकते इंसान ।

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