लेख साहित्य

गाँव की यादें

याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।
गर्मियों में बैठते थे बरगदों छाँव।

याद आती हैं मल्हारे भजन संध्या गीत।
याद आता बालपन है और प्यारे मीत।
खों, कबड्डी खूब खेले रोज पड़ते दाँव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

नहर कुआँ पाठशाला बारीयों के खेत।
चक्रवाती पवन से उड़ते गगन में रेत।
तीतरों की तित्तरी, कौआ की काँव- काँव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

दादुरों की टर्हाटें झींगुरों की तान।
कमरखों के झुरमुटों में कोयलों के गान।
पोखरों में नित चलाते कागजों की नाव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

घोंटते थे पट्टिका को मदरसे में मित्र।
ईश की नित प्रार्थना का वह सुहाना चित्र।
सुबह उठ पितु-मातु के नित्य छूते पाँव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

कहानियाँ दादा सुनाते बैठकर चौपाल।
मोहल्ले में सब जनों का पूछते थे हाल।
खानदानों में कहीं दिखते नहीं टकराव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

सहानुभूति संस्कारों से भरे परिवार।
खूब होती भाईयों में नित्य ही तकरार।
हट्ट मेला देखने का था बड़ा ही चाव।
याद फिर आने लगे अमराइयों के गाँव।

प्रेमसिंह राजावत ‘प्रेम’
(धिमिश्री)
१३ बी रश्मि विहार कालोनी शमशाबाद रोड आगरा।

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