लेख साहित्य

समीक्षा

चार्वाक दर्शन काफी तर्क युक्त समझने योग्य अनुभव गम्य और संसार को थोड़ी सी बुद्धि लगाकर समझने वालों को समझ में आने वाला दर्शन है।

वहीं पर गजेंद्र मोक्ष अति आध्यात्मिकता भक्तियुक्त, आस्थाओं से परिपूर्ण दर्शन युक्त और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित सृजन है।

कुछ भी हो अभी वर्तमान में अति आस्था और विश्वास के साथ साथ प्राकृतिक दृष्टि के साथ जीने वाले लोग समाज में मिल जाएंगे।

व्यक्तिगत मैं अपनी बात रखूं तो मुझे भी प्रकृति के तत्व के संघात से जीव उत्पत्ति की बात समझ में आती है।
क्योंकि ऐसा न हो तो जल धूप पृथ्वी और वायु के संयोग को प्राप्त करके अनेकों सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति न हो।
कल ही एक जलाशय में एक कुत्ते का मृतक शरीर सड़ता हुआ नजर आया और उसके शरीर से अनगिनत कीड़े बिलबिलाते नजर आए । यदि यह प्राकृतिक नहीं है तो इनको उत्पन्न करने वाला कौन है फिर???!!!!!!!
इसके अलावा प्राकृतिक तौर पर देखता हूं तो पाता हूं कि शुद्ध किया हुआ जल जब तक वायु के प्रभाव में नहीं है तब तक उसमें कीड़े नहीं पड़ते वायु का प्रभाव होते ही उसमें कीड़े पड़ जाते हैं अर्थात वायु ही जीव है। पंच तत्वों का आपसी संघात ही जीवन का कारण है।
सूखी हुई भूमि में कोई केंचुए या बरसाती जीव पैदा नहीं होते परंतु भूमि से जलका संघात होने पर (वर्षा ऋतु के आने से) जीव पैदा हो जाते हैं। इनको पैदा करने वाला कोई ईश्वरीय सत्ता है या प्रकृति, यह विचार का विषय है।
और अभी तक मुझे समझ में आता है कि प्रकृति ही जीवों को पैदा करती है।

क्योंकि वेदांत भी कहता है कि ईश्वर अनीह है, वह न किसी का हितैषी है न किसी का शत्रु। वह अव्यक्त है , वह बिना प्रकृति के संयोग से कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं है।( यदि ऐसा न हो तो कोई व्यक्ति तकलीफ में न पड़े, किसी मां का बच्चा मृत्यु को प्राप्त न हो, किसी पत्नी का पति मृत्यु को प्राप्त न हो, किसी प्रिय का प्रिय से बिछड़ना न हो कोई कष्ट में न हो सभी को वे दयालु ईश्वर बचा लें, इस संसार में किसी की अप्रत्याशित मृत्यु न हो) परंतु ऐसा होता नहीं है
अर्थात प्रकृति ही मुख्य है।
आज के वैज्ञानिक और डॉक्टर भी यही कहते हैं कि यह जो संसार है यह रसायन युक्त है। चूने और कत्थे के सहयोग से लाल रंग की उत्पत्ति जैसे होती है वैसे ही प्राकृतिक तत्वों के संघात से शरीर (प्रकृति) की उत्पत्ति होती है।

परंतु वर्तमान में देखा जाए तो इस मान्यता को इस सच्चाई को मानने वाले लोग कम है क्योंकि बचपन से हमें जो कहानी जो संस्कार जो आस्था और विश्वास लेकर बढ़ें हैं, हम उसी के अनुसार सोच पाते हैं।

परंतु इसी के साथ एक बात और भी मेरे ही अनुभव में है कि मनुष्य का मन जब इस संसार से अति व्याकुल होता है, उस समय ईश्वर का नाम और ईश्वर विग्रह का साकार साथ , ईश्वर सब संभाल लेंगे, ईश्वर हमको देख रहे हैं, यह विश्वास रामबाण औषधि के रूप में काम करती है और व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ हो जाता है। इसीलिए ईश्वर को भवसागर से पार उतारने वाला भी कहते हैं।

मैं समझता हूं सारे संसार के सभी ग्रंथ इसी मनोवैज्ञानिक धारणा पर आधारित है और मानव मन उथल-पुथल से बच जाए शांत होकर जीवन जीएं सही मार्ग पर चलकर जीवन जीएं, नियमों में बँध कर जीवन जीएं ,सब की मर्यादा कायम रहे इसीलिए सारे ग्रंथों की रचना हुई है (चाहे वे किसी भी भाषा में लिखे गए हों) और इन ग्रंथों की रचना करने वाले मनीषिगण बहुत ही बड़े मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अनुचिंतक थे।

वैसे यह सब कुछ समझने का विषय है, गहन अध्ययन का विषय है, अपनी उच्च चेतना में कुछ नया अनुभव करने का विषय है।
मैं स्वयं एक सामान्य जीव हूं बस मन में आया तो मन की बात अभिव्यक्त कर दिया, कभी-कभी अप्रत्याशित आकस्मिक घटनाएं जब घटती हैं तो मुझे अति व्यग्र कर देती हैं और तब मुझे इस प्रकार के चिंतन के लिए विवश होना पड़ता है।

नारायण नारायण नारायण पंडित रामजस त्रिपाठी नारायण
भुआलपुर सीखड़ चुनारगढ़ उ प्र

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