लेख साहित्य

जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।

नारी शक्ति की जय हो

गीत

नव दुर्ग

देवी घर की पूजे, हर नारी का सम्मान।
नव दुर्गों को ढूँढे, यह तन में है पहचान।

प्रथम दुर्ग मुख द्वार कहाये।
जिव्हा रसो का स्वाद बढ़ाये।
सम्यक बोलें थोड़ा खाएँ ।
भूखे को भोजन करवाएँ ।
मीठी वाणी बोले अच्छा खाओ श्रीमान।
नव दुर्गों को ढूंढे,यह तन में हैं पहचान।

घ्राण इंद्रियाँ दो दरवाजे।
प्राणवायु रग- रग में साजे।
प्रेम की जग खुशबू फैलाएँ।
चमन में सुंदर फूल खिलाएँ।
तन मन को महकाएँ, जीवन का कल्याण।
नव दुर्गों को ढूँढे, यह तन में है पहचान।

नयनानंद नजर हो प्यारी।
सही नियत प्रभु बने हमारी।
नारी का सम्मान बढ़ाएँ ।
मातृशक्ति के ही गुण गाएँ ।
शुभ शुभ देखें भैया, समदर्शी हो इंसान।
नव दुर्गों को ढूँढे, यह तन में है पहचान।

कानों से प्रिय सुनो सुनाओ।
प्रसादनीय प्रभु वाणी गाओ।
सत्संग में प्रिय प्रतदिन जाएँ।
माँ बहनों के ही गुण गाएँ।
सरल प्रसुत्वा जीवन, हो देवी का गुणगान।
नव दुर्गो को ढूँढे, यह तन में है पहचान।

तन को नित्य निरोग बनाएँ।
ब्रह्म प्रहर में ध्यान लगाएँ।
मातु पिता के चरण दबाएँ।
यज्ञ हवन का नियम बनाएँ।
नवा द्वार कहलाता ब्रह्मरंध्र यह जान।
नव दुर्गो को ढूँढे, यह तन में है पहचान।

स्वरचित एवं मौलिक रचना
प्रेम सिंह राजावत प्रेम

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