लेख साहित्य

मैं किसान हाँ, मैं किसान

रवि मेघों में छुप जायेगा,
बहता सागर रूक जायेगा।
मेरी कर्मठता के आगे,
आसमान भी झुक जायेगा
खड़ा निडर हूँ सीना तान ..
मैं किसान हाँ, मैं किसान।।…

बहती हवा का एक झोका है।
मुझको कब किसने रोका है।
तूफानों का जोश है मुझमें।
मेघों जैसा रोष है मुझमें।।
बंजर भू पर हाथ लगा दूं।
मधुवन को लाकर महका दूं !
चमके सरसों, महके धान।।…
मैं किसान हाँ, मैं किसान।।…

बनकर वृष हल खींचे मैंने।
बीज लहू से सींचे मैंने।।
इस श्रम का उपहार कहाँ?
कब पाया उपकार यहाँ?
बड़े दलालों ने लूटा है।
सारा शासन ही झूठा है।
कब पाया मैंने सम्मान ?..
मैं किसान हाँ, मैं किसान।।…

बल विवेक पाया अन्नों से।
मृदु व्यवहार मीठे गन्नों से।
दारा से बलवान बनाये।
रामानुज से ज्ञानी पाये।।
श्रम का कैसे मोल करोगे?
हक को गोल मटोल करोगे?
राजा हम तेरी पहिचान।
हमीं से सैनिक और विज्ञान।।…
मैं किसान हाँ, मैं किसान।।…

– कवि विनोद सिंह गुर्जर

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