लेख साहित्य

दो जून की रोटी

रहम-ए-ख़ुदा दिल मे ख़ौफ़ सा क्यों रहता है।
ज़ख्म इतना मिला आँखों से दरिया बहता है।

दर दर की ठोकरें मिली हो जिनको ता-उम्र,
उस बुरे वक़्त की मार से आदमी डरता है।

हाड़ मास का बना शरीर टूट सा जाता है,
ईंट पत्थर से बनी इमारत सम ढ़हता है।

भूख की तलब इंसान को बना देती शैतान,
पेट की भूख मिटाने को कुछ भी करता है।

रोटी की कीमत क्या होती पूछिए गरीब से,
एक निवाले की ख़ातिर कितने दुख सहता है।

मत पूछों उनसे उसकी अंतर्मन की घुटन,
इधर उधर करवट बदले रात भर जगता है।

मुफलिसी का मारा भागता फिरे इधर उधर,
चंद कमाई से परिवार का पेट भरता है।

दो जून रोटी की खातिर पढ़ना खेलना छोड़ दिया,
ढावे पर रोटी सेकें चेहरा खुशी से खिलता है।

सुमन अग्रवाल “सागरिका”
आगरा

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