लेख साहित्य

आधार छंद – वाचिक स्रग्विणी

आधार छंद – वाचिक स्रग्विणी
मापनी 212, 212, 212, 212
पदांत- नहीं <> समांत- अरते

मातु आशीष बिन हम सँवरते नहीं ।
ज्ञान के बिन कभी हम उभरते नहीं ।

कामना है यही सार दो माँ मुझे,
सत चिरंतन रहे भाव मरते नहीं ।

साक्ष्य होते नहीं झूठ के कथ्य में,
न्याय संगत वही बात करते नहीं ।

छल प्रमादों भरा जीव आगे बढे़,
खुद गिरे गर्त में वे उबरते नहीं ।

पीर सब की हरें है यही आरजू,
राह होगी कठिन प्राण डरते नहीं ।

चाहतों में जिया तो नया क्या किया,
त्याग अर्पण बिना हम निखरते नहीं ।

प्रेम विश्वास संवेदना मानवी,
प्रीति संबल बिना स्नेह झरते नहीं ।

डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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