लेख साहित्य

बेटी नहीं बहू हूं मैं आपकी

कलमकार। एक दिन पास बैठाकर बड़े प्यार से, सासू माँ ने बहू से कहा, आज से तुम बहू नहीं बेटी हो हमारी, देंगे बेटी सा प्यार, देंगे बेटी सा मान और सम्मान देंगे, यह वायदा रहा हमारा…. सकुचाते हुए बहू बोली, मत जानो मुझे बेटी के नाम से, बहू बन के आयी हूँ, तो यही मेरी पहचान है, बेटी में आपका अंश है, तो बढ़ाया मैंने आपका वंश है, बेटी घर की चहल पहल, तो मैं आपके घर का खिलता कमल, बेटी आपकी चाँद सी शीतल, तो मैं गुनगुनाती धूप, बहू हूँ आपकी ये खासियत है मेरी, बहू के जैसी काबिलियत है मेरी, फिर क्यूँ सिर्फ बेटी जैसे होने की हैसियत है मेरी, पूछती हूं मैं आपसे और इस समाज से, क्या बहू होना इतना बुरा है ? अगर नहीं, तो क्यूँ बेटी सा प्यार देते हो, शायद इसलिए कि इस समाज में, कभी बहू जैसा प्यार नहीं होता, और होता तो कभी देने लायक नहीं होता, अगर देना ही है तो आज एक वादा दो मुझे, इस समाज में “बहू” शब्द को प्यार और सम्मान दोगे, माँ बेटी के रिश्ते से भी बढ़ कर, सास बहू के रिश्ते को नया आयाम दोगे !!

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