लेख साहित्य

सागर से मिलने चली इक नदी

लो सागर से मिलने
चली इक नदी,
तोड़ तटबन्ध सारे तुम्हारे लिए ….!!

नैन मिलने लगे,
फूल खिलने लगे,
मन में खुशियों के
झरते शरारे लिए।
तोड़ तटबन्ध सारे तुम्हारे लिए।

हो उठी फिर मुखर
वेग द्रुत है डगर,
गीत गाती लहर,
सुन बहारें लिए ,
तोड़ तटबन्ध सारे तुम्हारे लिए।

है सजल हर गज़ल,
खिलखिलाती बहर,
प्रीत पावन नवल ,
नव नजारे लिए ,
तोड़ तटबन्ध सारे तुम्हारे लिए।

माँग तारों भरी ,
चाँद से बतकही
किरणें सूरज की ,
चमकी सितारे लिए
तोड़ तटबन्ध सारे तुम्हारे लिए।

डाॅ.किरण मिश्रा ‘स्वयंसिद्वा’
नोयडा

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